Indian Football on ventilator: आईएसएल का वायरस फुटबाल की जान लेकर रहेगा

राजेंद्र सजवान

यदि आप आईएसएल और आई लीग के चलते भारतीय फुटबाल में किसी क्रांतिकारी बदलाव की उम्मीदकर रहे हैं तो अपनी सोच में सुधार करें और यह मान लें कि हमारी फुटबाल को सुधरने में अभी दस -बीस नहीं पचास -सौ साल लग सकते हैं। कुछ पूर्व खिलाड़ियों का ऐसा मानना है।

लेकिन भारतीय फुटबाल महासंघ (एआईएफएफ) के अध्यक्ष प्रफुल पटेल पता नहीं क्यों इतने प्रफुलित हैं कि 2026 के फीफा विश्व कप में भारतीय भागीदारी का सपना देख रहे हैं और सब कुछ जानते हुए भी खोखले दावे कर रहे हैं।

पहले भारतीय फुटबाल की रीढ़ कही जा रही आईएसएल की हैसियत पर चर्चा कर ली जाए ।आयोजक और क्लब बुरा न माने, यह बात पक्की है कि देश की बड़ी फुटबाल लीग में बेहद कच्चे और कुछ पके हुए विदेशी खेल रहे हैं। उनमें ज्यादातर ऐसे हैं जोकि अन्तरराष्ट्रीय फुटबाल में किसी काम के नहीं रहे। लेकिन अपने देश में सब चल जाता है, खोटे सिक्के भी। इसलिए वेटरन और चले हुए कारतूस भी काम आ रहे हैं।

यह तय है कि आईएसएल हमारी फुटबाल को कोई फायदा नहीं होने वाला। वरना अफगानिस्तान और बांग्लादेश जैसे फिसड्डी हमें क्यों आँख दिखा रहे हैं? उनके सामने हमारे ब्लू टाइगर्स मेमने क्यों बन नाते हैं? क्यों हमारी फुटबाल को एशियाड में जगह नहीं मिल पाती? क्यों हम 1962 के बाद से अपने महाद्वीप के विजेता नहीं बन पा रहे?

तो फिर क्या सोच कर हमारी फेडरेशन के चौधरी बड़ी बड़ी हांक रहे हैं? पांच साल बाद वर्ल्ड कप खेलने का सपना देखने वाले जान लें कि यदि यही हाल रहा और ग्रासरूट फुटबाल पर ध्यान नहीं दिया गया तो 2026 तक हम एशिया के फुटबाल मानचित्र से भी गायब हो सकते हैं। हां, कोई चमत्कार हुआ और फुटबाल देव प्रसन्न हो जाएं तो कुछ भी हो सकता है।

देश के फुटबाल जानकर और पूर्व चैंपियन कहते हैं कि फेडरेशन नकारा है। उसने फुटबाल को बर्बाद करने की ठानी है। आईएसएल और विदेशी कोच फेडरेशन की कमजोरी बन गए हैं और यह कमजोरी भारतीय फुटबाल की कमर पूरी तरह तोड़ेगी।

अफसोस कि बात यह है कि पिछले चालीस सालों से भी अधिक समय से हमारी फुटबाल अवसरवादियों और लुटेरों की ठोकर पर है। उसकी हवा फुस्स है। अपने खिलाड़ियों के लिए मौके घट रहे हैं जबकि विदेशी मौज कर रहे हैं। एक सर्वे से पता चला है कि पिछले 70 सालों में जिस भारतीय खेल ने देश का नाम सबसे ज्यादा खराब किया है वह फुटबाल ही है।

1951 और 1962 में एशियाई खेलों में स्वर्ण जीतने वाले देश ने चार ओलंपिक खेलों में भाग लिया पर तत्पश्चात गिरावट का सिलसिला एक बार शुरू होने केबाद थमा नहीं है। ऊपर से आईएसएल की बीमारी ओढ़ ली है।

फुटबाल जानकर कह रहे हैं कि जल्दी ही आईएसएल की काट नहीं खोजी गई तो भारतीय फुटबाल वहां पहुंच जाएगी जहां वापसी के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं।

(लेखक वरिष्ठ खेल पत्रकार हैं.)

 

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