यूँ ही नहीं मिलती किसी को रियासत यहाँ, ये तो हुनर की बात है जो हमारे खून में मौजूद है !!

रीना सिंह, अधिवक्ता

उच्चतम न्यायालय

हम तो हिन्दू हैं,  हमारी कहानियां नहीं, इतिहास लिखा जाता है, हमारी मान मर्यादा, वीरता और अनुशाशन, यही हमारी पहचान है। पिछला कुछ समय हमारे लिए बहुत चुनौतीपूर्ण रहा यहाँ, मै ये बात कहना चाहूंगी की एकता से  ही हमारा अस्तित्व कायम है और विभाजन से हमारा पतन निश्चित है।

हम एकता से ही फूस के तिनकों से बनी रस्सी में प्रबल हाथी को भी बांध सकते हैं। हज़ारों वर्षों तक हमने भारत माता की सीमाओं की रक्षा की है, जब तक हम संगठित  थे, तब तक इस विश्व में चारों ओर केसरिया ध्वज पताका ही लहराती थी, जैसे ही हम अपने निजी स्वार्थों के लिए बटते चले गए हमारी पहचान और हमारा देश, दोनों ही सिमटते चले गए और विदेशी आक्रांताओं ने हमारे धर्म, हमारी संस्कृति को बहुत नुक्सान पहुँचाया। अगर मैं आज के इस आधुनिक युग की बात करूँ तो शायद आज हम विध्वंस के ऐसे मोड़ पर खड़े हैं की अगर हम अब नहीं संभले तो आने वाले समय में हमारा अस्तित्व ही खतरे में आ जायेगा।

आज के इस इंस्टेंट कम्युनिकेशन और सोशल मीडिया के समय में क्या हम अपने परिवारों के साथ अपने घरों में सुरक्षित हैं? हमारे समाज के एक बड़े वर्ग ने तो इस भौतिकवादी समय से समझौता कर अपनी परम्परों ही को तलांजलि दे दी है, हम सिर्फ नाम के ही हिन्दू रह गए हैं। ऐसा समय आ गया है की हमें अपने पूर्वजों की पहचान को बचाने के लिए सड़कों पर उतरना पड़ रहा है, तो फिर जरा सोचिये क्या आज हम अपने परिवारों को  सुरक्षित रखने का हौसल रखते हैं? हमारे पूर्वजों ने अन्याय के खिलाफ लड़ कर,  अपने देश की रक्षा की, आज हम में से ऐसे कितने लोग हैं जो अपनी संतान को ये सिखाते हैं की  हमें गलत के खिलाफ आवाज़ उठानी है? अपने हक़ और अपनी पहचान के लिए लड़ना हमने छोड़ दिया है। संगठित होकर अपने हितों के लिए लड़ना हम भूल चुके हैं, जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम अपनी अयोध्या , अपने माता पिता और अपने राज महल का त्याग कर एक वनवासी के रूप में वन को गए उस समय में भी भगवान् राम ने अपने शस्त्रों का त्याग नहीं किया ,फिर हम सब ने अपनी वृद्धि और समृद्धि के लिए लड़ना क्यों छोड़ दिया है ?

क्या बिना अपनी बुलंद आवाज़ उठाये हम हिन्दुओं के मध्यम होते प्रकाश को पुनः उज्वल बना सकते हैं ? हमारे हक़ को धीरे धीरे दबी आवाज में वोट बैंक की राजनीती के लिए छिना जा रहा है और हम आवाज भी नहीं उठा पा रहे ?हमें किस चीज़ का डर है, क्या पिछले कुछ सालों में हम कमजोर हो गए हैं।

नहीं हम कमजोर नहीं हुए हम इतना बिखर गए हैं कि हमारी आवाज सुनने वाला कोई नहीं है। क्यूंकि हम संगठित नहीं हैं, इस वोट बैंक की राजनीती और राजनीतीक पार्टी में अपने पदों को बचाने के लिए हमारे  जन प्रतिनिधि इतने बेबस हैं की अपने ही समाज के लिए बोल नहीं पाते, जो समाज इन्हे वोट दे कर सत्ता के शीर्ष तक पहुंचता है, वही नेता समय पड़ने पर अपने समाज के साथ भी खड़े नहीं हो सकते।

भूल गया राणा प्रताप को, दुजा वीर चौहान !!गौरा और बादल को भुला, याद नहीं पन्ना का बलिदान !!

क्षत्रिय लहू से सिंचित धरा, का कण कण बड़ा महान! भूल गयी इतिहास कौम का, सिंहों की संतान!

आईये हम सब ये प्रतिज्ञा करें कि हम अपने पूर्वजों के लहू से सिंचित अपने इस गौरवशाली इतिहास के परचम को पुनः लहराएयेंगे और कभी भी इसकी किरणों को धुंधली नहीं होने देंगें , हमारा जूनून और हौंसला आज भी वही है,हमने सिर्फ जीने का तरीका बदला है तेवर नहीं, हम सब संगठित हो एक ऐसे हवन कुंड की अग्नि को प्रज्वलित करें , जिससे हम हिन्दुओं के मान और सम्मान के दुश्मनों को इस युद्धघोष की ध्वनि साफ़ साफ़ सुनाई दे।

(लेखिका सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता हैं)

 

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