भारत में अब तक 468 मजदूरों की गई जान, कौन है इसका ज़िम्मेदार?

शिवानी रजवारिया

नई दिल्ली: विश्व स्तर पर कोरोना वायरस से चल रही इस लड़ाई में अगर सबसे ज्यादा मार किसी पर पड़ रही है तो वह सिर्फ एक नाम है मजदूर! सभी जगह मजदूरों को ही कोरोना वायरस से बचने के लिए लगाए गए लॉकडाउन की वजह से अपनी ज़िंदगी को दांव पर लगाना पर रहा है।

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में गेहूं की तरह पिस रही मजदूरों की जिंदगी कई सवाल खड़े करती है। पर हालात ज्यों के त्यों बने रहते हैं। सरकार वादे तो कर रही है, संवेदना भी व्यक्त कर रही है पर जमीनी स्तर पर तो मजदूर मर रहा है उसका घर उज़ड़ रहा है। उसके बच्चे अनाथ हो रहे हैं ।दिन पर दिन एक के बाद एक हो रहे हादसे मजदूरों के मरने के आंकड़े को बढ़ाते जा रहे हैं, यह दर्दनाक हादसे दिल को दहला देने वाले हैं वजह बहुत सारी है पर शायद सुविधाएं बहुत कम।

दैनिक भास्कर के एक आंकड़े के अनुसार मजदूरों के मरने की संख्या 11 मई तक 418 पहुंच गई थी। इसमें कुछ मजदूरों ने सुसाइड किया तो कुछ पलायन के चलते अपनी जिंदगी गवा बैठे, कुछ भुखमरी का शिकार हुए तो कुछ आर्थिक तंगी के कारण चल बसे।कुछ तो समय पर मेडिकल सहायता न मिलने पर ही इस दुनिया से अलविदा कह गए, तो कुछ पैदल चलने और लाइन में खड़े रहने से ना झेलने वाली थकावट को खुद से मुक्त करके चले गए, तो वही कुछ मज़दूर लॉक डाउन से जुड़े नियमों को तोड़ने पर अपनी जिंदगी पर अंकुश लगा बैठे। कुछ का तो अज्ञात कारण ही नहीं पता चला। कुल मिलाकर 11 मई तक की रिपोर्ट यह बताती है कि 418 मजदूरों की जान चली गई।

इसके बावजूद मरने वाले मजदूरों का यह आंकड़ा रुकने की वजह बढ़ने की दिशा में है जिस दिन से देश में लॉकडाउन शुरू हुआ है उसी दिन से मजदूरों के सर पर मानो मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है। वह भी ऐसा पहाड़ जो सिर्फ उनकी बेबसी पर उन्हें रुला कर, मज़बूरी की मार से गिरा कर उन्हें सिर्फ बेइज्जत ही नहीं कर रहा बल्कि उनकी जिंदगी के साथ खेल रहा है।

इन आंकड़ों के बाद से मजदूरों के साथ हुए हादसों की जो खबरें सामने आई उन्होंने तो लोगों का कलेजा ही बाहर निकाल कर रख दिया अब तक जो लोग यह कह रहे थे की सरकार द्वारा सब कुछ मिलने के बाद भी मजदूर आत्मदाह करने पर उतारू है आज वह भी उनकी इस स्थिति को देखकर शोकमय हैं।

13 मई को गुजरात से मध्य प्रदेश के लिए निकली एक गर्भवती महिला मजदूर ने सवारियों की खचाखच और गर्मी की तपिश के कारण दम तोड़ दिया। वही यूपी के बुलंदशहर से गया के लिए अपने घर को साइकिल पर निकला मजदूर सड़क हादसे का शिकार हो गया। किसी अज्ञात वाहन ने घर पहुंचने की उसकी उम्मीद को उसकी साइकिल के साथ ही चकनाचूर कर दिया।

14 मई को 8 मजदूर उत्तर प्रदेश के गुना सड़क हादसे का शिकार हो गए तो वही मुजफ्फरनगर में 6 मजदूरों की जाने सड़क दुर्घटना की बलि चढ़ गई। हैदराबाद से उड़ीसा तक का सफर तय करने के लिए पैदल निकला मजदूर रास्ते में लू लगने के कारण मौत को मात नहीं दे पाया। वहीं 15 मई को मध्य प्रदेश के गुना सड़क हादसे में तीन मजदूरों ने दुनिया को अलविदा कह दिया।

कुछ बुद्धिजीवियों का यह कहना है कि मजदूर खुद अपनी जान से खेल रहे हैं लेकिन सवाल तो यह उठता है कि आखिर मजदूर अपनी जान पर क्यों खेल रहे है?

पूरे देश में सड़क हादसों के कारण हो रही मजदूरों की मौतें भी शक का घेरा बनाती है। मजदूरों की ऐसी तस्वीर जिसे देख सभी की आंखें भी नम हो गई। 16 मई को चूने की बोरियों से लदे ट्रक में बैठे 24 मजदूरों की मौत ने सभी को स्तब्ध कर दिया है वहीं मध्य प्रदेश के सागर जिला के बांद्रा इलाके में हुई सड़क दुर्घटना में 6 मजदूरों की जान चली गई। दिन पर दिन मरते मजदूर भारत में लगे लॉकडाउन के इतिहास को अपने खून से रंग रहे हैं। एक ही दिन में अलग-अलग राज्यों से मजदूरों के मरने की आने वाली खबरों ने सरकार और प्रशासन दोनों को सवालों के घेरे में खड़ा किया है।

11 मई से 16 मई के बीच लगभग 50 मजदूरों के मरने की पुष्टि हो चुकी है। अगर दैनिक भास्कर के कुल आंकड़े की संख्या और 11 मई के बाद से अब तक हुई मजदूरों की मौत की कुल संख्या 468 पहुंच चुकी है।

 

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