चालबाज चीन को सबक सिखाने में देर उचित नहीं

निशिकांत ठाकुर

क्या चीन ने परोक्ष तौर पर विश्वयुद्ध-3 की रूपरेखा खींचकर बता दिया है कि ज्योतिषियों की यह भविष्यवाणी सत्य साबित होगी कि तीसरा महायुद्ध ईंट-पत्थरों से लड़ा जाएगा। इसकी वजह यह है कि जिस निर्दयता से चीन ने हमारे देशभक्त कर्नल संतोष बाबू और 20 अन्य सैनिकों को लाठी -डंडे, ईंट-पत्थरों से हत्या कर अघोषित रूप से युद्ध का बिगुल बजा़ दिया है, उससे यही प्रतीत होता है कि चीन ने अपना आपा खो दिया है और उसका लोभ भारतीय भू-भाग पर कब्जा करके विश्व को यह दिखाना है कि वह कितना ताकतवर हो चुका है। मैंने अपने पिछले लेख में लिखा था कि वह भूल चुका है कि भारतवर्ष एक शांतिप्रिय देश है, जो अपनी शक्ति का बेवजह प्रदर्शन करने में यकीन नहीं रखता है। इसी वजह से वह चुपचाप, शांत बैठकर चीन के अति उत्साह को भांप रहा है, लेकिन जिस दिन ऐसा महसूस होने लगेगा कि पानी अब नाक के ऊपर से बहने वाला है तो उसी दिन बता सकता है कि भारत की सामरिक ताकत क्या है और उससे उलझना कितना महंगा पड़ सकता है।
दरअसल, चीन 1962 की अपनी जीत को भूला नहीं है और उसी अतिरेक में वह बार-बार भारत पर परोक्ष रूप से छद्म आक्रमण जैसी ओछी हरकत करके यह बताना चाहता है कि वह जब चाहे भारतीय भूभाग पर कब्ज़ा कर सकता है। साल 1959 और 1962 का युद्ध आजादी और देश बंटवारे के बाद भारत के लिए पहला और दूसरा युद्ध था। वह सैकड़ों वर्षों की गुलामी का बर्बर दंश झेल कर अभी-अभी बाहर निकला ही था। उसके पास युद्ध का अनुभव और कौशल, बिल्कुल नया था और इन्हीं कारणों से उन युद्धों में भारत को चीन से पराजय का मुंह देखना पड़ा था। तो क्या चीन अब भी उसी भ्रम में जी रहा है और भारत के जांबाज़ सैनिकों के खून से सरहदों को रंग रहा है!
आइए अब थोड़ा-बहुत चीन की उन करतूतों को देखें जिन्हें भारत ने अब तक झेला है और हर बार उसे यह अवसर दिया कि वह संभल जाए। 1967 में दोनों देशों के बीच गोलीबारी हुई थी, 1975 में भारत-चीन सीमा पर कुछ सैनिक शहीद भी हुए थे, चीन सिक्किम पर अपनी दावेदारी दिखाकर भारतीय सेनाओं की वापसी की मांग करता रहा है। ऐसे छद्म युद्धों में काफी सैनिक शहीद हुए। 1975 घने कोहरे में हिंसक झड़पें हुईं, जिसमें काफी सैनिक शहीद हुए। चीन द्वारा किए गए ये सारे आक्रमण उसकी विस्तारवादी नीति की पुष्टि करते हैं। दरअसल, वह चाहता है कि पूर्वोत्तर के कई राज्यों, जिनमें सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश विशेष महत्वपूर्ण हैं, उनपर उसका कब्जा हो, क्योंकि चीन इन राज्यों को अपने देश का हिस्सा मान रहा है। 1962 के युद्ध पर चर्चा हम पहले ही कर चुके हैं कि भारत की सहनशीलता की पराकाष्ठा है जब वह भारत में ही घुसकर भारतीय भूभाग को अपना कहता है और भारतीय रक्षा पंक्ति को बार-बार भेदकर भारत को नुकसान पहुंचाता है। आखिर सहनशीलता की भी एक सीमा होती है। भारत कब तक अपने जांबाजों को शहीद करके विश्व को यह दिखाता रहेगा कि वह चीन की ज्यादतियों को बर्दास्त कर रहा है। अब उसे कड़ा रुख अपनाना ही होगा। वैसे भारत गांधी का देश है जहां हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है। हमारे वही राष्ट्रपिता ने हजारों मील दूर साउथ अफ्रीका में भी जाकर यह सिद्ध कर दिया कि अहिंसक व्यक्ति के सामने हिंसक समाज या व्यक्ति ठहर नहीं सकता। हालांकि, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अपनी इस अहिंसक प्रवृत्ति के कारण भारी नुकसान उठाना पड़ा, अपमानित होना पड़ा, मार खानी पड़ी, लेकिन उस शक्तिशाली अंग्रेज शासक को औकात में लाकर उसे सार्वजनिक रूप से विश्व के सामने खड़ा कर दिया, जिसके राज्य में कभी सूर्यास्त नहीं होता था। उन्होंने साउथ अफ्रीका ही नहीं, अखंड भारत से भी अंग्रेजों को भागने पर मजबूर कर दिया।
सच तो यह है कि जहां इतना कुछ हो गया है, जहां हमारे इतने जांबाज जवान शहीद हो गए, वह क्षेत्र इतना दुरूह है कि इस भीषण गर्मी में भी वहां शून्य पर तापमान होता है। सरकार के हवाले से जो कहा गया है वह यह कि शाम ढलते ही लाठी-डंडों व ईंट-पत्थरों से आक्रमण किया गया और हमारे जवान शहीद हो गए। कहा यह भी गया है कि गोली एक भी नहीं चली और हमारे 20 जवान शहीद हो गए। सरकारी हवाले से आए इस सूचना के हवाले से कहा तो यह भी जा रहा है कि चीन के भी 44 जवान मारे गए, लेकिन यह बात गले के नीचे नहीं उतरती, क्योंकि यह चीन का पूर्व नियोजित कार्यक्रम था। अब जांच का विषय यह भी बनता है कि जब दोनों देशों के बीच इतना माहौल गर्म था फिर कर्नल सहित जवानों को निहत्था विरोधी शिविर में जाने और आने के लिए किसने और क्यों कहा था तथा यह आदेश ऊपर से किसके द्वारा और क्यों दिया गया था! साजिश तो यहीं से शुरू हो जाती है जब दुश्मनों से मिलने निहत्थे जवान गए और योजनाबद्ध तरीके से मौत के घाट उतार दिए गए। हमारे जवान संभाल भी नहीं पाए और चीनी सैनिकों ने लाठी-डंडों और पत्थरों से ताबड़तोड़ हमला शुरू कर दिया। यह बात समझ में नहीं आती कि चीन ने ऐसा क्यों किया, क्योंकि एक दिन पहले तो वह मिल-बैठकर समस्या को सुलझाने की बात कर रहा था। फिर दूसरे ही दिन अचानक इतना आक्रामक क्यों हो गया! सच में यही हाल 1962 में भी चीन ने किया था जब पंडित जवाहर लाल नेहरू और चा एन लॉ में तथा कथित घनिष्ठ मित्रता थी और हम भारतीय ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के नारे लगा रहे थे, लेकिन चीन ने पीठ पीछे भारत पर आक्रमण कर दिया और हमे हार का सामना करना पड़ा। इस बार भी लगभग वही हुआ। हमारे प्रधानमंत्री चीन गए, उनका भव्य स्वागत हुआ। फिर उनके राष्ट्रपति आए, उनका भी भव्य स्वागत हुआ। हमारे प्रधानमंत्री और चीन के राष्ट्रपति ने मिलकर दोनों के बीच खुलकर बातें हुईं। दोनों नेताओं ने एक साथ झूले झूले, जिससे यह लगने लगा कि हमारे संबंध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन से ठीक हो गए हैं। लेकिन, चीन तो हमें झांसा दे रहा था। यह उसकी चालबाजी थी। उसके मन में चोर था। उसे तो तथाकथित दोस्ती का बहाना बनाकर अपना सड़ा-गला माल भारत में खपाना था। जब उसने देख लिया कि अब उसका माल भारत में धड़ल्ले से बिक रहा है, उसके माल की आदत भारतीयों को लग गई है तो उसने बताना शुरू कर दिया कि असल में वह वैसा है नहीं, जैसा दिखता और दुनिया को दिखाता है। चीन किसी-न-किसी प्रकार हमारे पूर्वोत्तर के भाग को हथियाना चाहता है और अब तो वह बहाना बनाकर नेपाल को भी अपने साथ कर लिया है, जबकि पाकिस्तान तो पहले से ही उसका पिछलग्गू है। अब इस तिकड़ी से भारत कैसे निपटे, इसके लिए निश्चित रूप से हमारे उच्च पदस्थ राजनेता विचार कर ही रहे होंगे, लेकिन यदि हमें इस तिकड़ी पर घातक प्रहार करना ही है तो सबसे पहले चीन को पटरी पर लाना होगा, क्योंकि नेपाल और पाकिस्तान की कोई हैसियत नहीं कि वह अपने बल पर भारत से पंगा ले सके। अब देखना यह है कि चीन ने विश्वयुद्ध-3 की शुरुआत तो कर ही दी है, भारत उसे उसकी हैसियत कब और कैसे बताता है।

(लेखक वरिष्ठ विश्लेषक हैं। इस विचार से चिरौरी न्यूज का पूर्णतः सहमत होना जरूरी नहीं है।)

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