चेतेश्वर पुजारा: भारतीय टेस्ट क्रिकेट का ‘दीवार-ए-नया दौर’ अब मैदान पर नहीं दिखाई देगा

Cheteshwar Pujara: Indian Test cricket's 'wall of new era' will no longer be seen on the fieldचिरौरी न्यूज

नई दिल्ली: जब क्रिकेट की बात होती है, तो अक्सर शोर, चमक और चौकों-छक्कों की बात होती है। पर इस तेज़ रफ्तार युग में एक नाम ऐसा था, जो हर गेंद पर जवाब देने की जल्दबाज़ी में नहीं था, बल्कि वो गेंद को देखने, परखने और फिर सधे हुए अंदाज़ में खेलने में यकीन रखता था। वह नाम था: चेतेश्वर पुजारा।

शांति, संयम और संकल्प का प्रतीक

राजकोट की गलियों से निकला यह सरल और सौम्य चेहरा भारतीय टेस्ट क्रिकेट की पहचान बन गया। पुजारा ने साबित किया कि “कभी-कभी सबसे ऊंची आवाज़ वो होती है जो चुपचाप बोलती है।” उन्होंने बल्ले से शोर नहीं मचाया, बल्कि विपक्षी टीमों की नींदें उड़ाईं — अपनी ठहराव भरी बल्लेबाज़ी से।

ड्राइव्स नहीं, धैर्य से जीते दिल

जब दुनिया के बल्लेबाज़ T20 के रंग में ढलते गए, पुजारा ने टेस्ट की किताब को फिर से खोलकर पढ़ाया कि कैसे विकेट पर टिकना ही असली कला है। उनके स्ट्रोक्स भले ही आक्रामक न हों, लेकिन हर डिफेंस में आत्मविश्वास और हर एक रन में मूल्य था।

2018-19 की ऑस्ट्रेलिया टेस्ट सीरीज़ में उनका योगदान भारतीय क्रिकेट इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। 521 रन, 1258 गेंदों का सामना — यह सिर्फ आँकड़ा नहीं, यह उनकी धैर्य-शक्ति और क्रिकेट के प्रति भक्ति का प्रमाण था।

“ड्रविड़ के बाद पुजारा” – एक विरासत का उत्तराधिकारी

कई लोगों ने उन्हें ‘नए युग का राहुल द्रविड़’ कहा — और वह उपमा गलत नहीं थी। जब टीम को एक स्थिर कंधे की ज़रूरत होती थी, पुजारा मौजूद होते थे। जब विकेट गिरते थे, वह दीवार बन जाते थे। और जब सब थकते थे, तब भी वह खड़े रहते थे — गेंद दर गेंद।

चेतेश्वर ने कभी सुर्खियों की तलाश नहीं की। न सोशल मीडिया पर सक्रियता, न विज्ञापनों की भीड़ — उनका ध्यान केवल क्रिकेट पर रहा। मैदान पर उनका धैर्य और मैदान के बाहर उनका विनम्र स्वभाव उन्हें एक ‘सच्चा क्रिकेटर’ बनाता है।

उनका संन्यास — एक युग का अंत

जब उन्होंने सोशल मीडिया पर यह लिखा कि “हर अच्छी चीज़ का अंत होता है”, तो हर भारतीय क्रिकेट प्रेमी की आंखें नम हो गईं। उनके संन्यास ने उस दौर को अलविदा कह दिया जहाँ तकनीक, आत्म-नियंत्रण और क्लासिक टेस्ट क्रिकेट का बोलबाला था।

आगे की राह

अब पुजारा क्रिकेट कमेंट्री में नज़र आते हैं। उनकी भाषा, समझ और अनुभव सुनने लायक होते हैं। शायद वे कोचिंग में भी हाथ आज़माएं — क्योंकि भारतीय टीम को आज भी “पुजारा जैसी ठहराव वाली आत्मा” की ज़रूरत है।

चेतेश्वर पुजारा, आपने हमें सिखाया कि क्रिकेट सिर्फ खेल नहीं, साधना है। आपने दिखाया कि गेंदबाज़ को थकाकर भी रन बनाए जा सकते हैं। आपने हमें विश्वास दिलाया कि टेस्ट क्रिकेट ज़िंदा है — और तब तक रहेगा जब तक पुजारा जैसे बल्लेबाज़ इस खेल को जीते रहेंगे।

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