न्याय बनाम सत्ता: पुलिस सुधार ही लोकतंत्र की असली परीक्षा

Justice versus power: Police reform is the real test of democracy.रीना एन सिंह

अधिवक्ता सर्वोच्च न्यायालय

न्याय का भविष्य पुलिस की वास्तविक, संरचनात्मक और संस्थागत स्वतंत्रता से गहराई से जुड़ा हुआ है, क्योंकि जब तक पुलिस राजनीतिक हस्तक्षेप, सत्ता–अपराधी गठजोड़, भ्रष्टाचार और स्वार्थपूर्ण दबावों से मुक्त नहीं होगी, तब तक आम नागरिक के लिए सुरक्षा, समानता और न्याय केवल संविधान की पुस्तकों में दर्ज आदर्श बनकर रह जाएंगे।

पुलिस और राजनीति के बीच बना गठजोड़ कानून के शासन के सिद्धांत को गंभीर रूप से कमजोर करता है, क्योंकि जब पुलिस पर राजनीतिक दबाव हावी होता है तब न्याय निष्पक्ष नहीं रह पाता। सत्ता के संरक्षण में अपराधियों को खुली छूट मिलती है, जबकि ईमानदार पुलिस अधिकारियों को दंडित किया जाता है। इस व्यवस्था का सबसे बड़ा शिकार गरीब, असहाय और कमजोर वर्ग बनता है, जिनके पास न तो राजनीतिक पहुँच होती है और न ही प्रभावशाली समर्थन।

उनकी शिकायतें दर्ज नहीं होतीं, उन्हें डराया जाता है और न्याय पाने की उनकी उम्मीद टूट जाती है। परिणामस्वरूप कानून अमीर और ताकतवर का हथियार बन जाता है, जबकि गरीब के लिए वह केवल भय और असहायता का प्रतीक रह जाता है, जो लोकतंत्र और संविधान दोनों की आत्मा के विरुद्ध है। इस गठजोड़ के चलते समाज में भय और असुरक्षा का माहौल बन जाता है, अपराधी निर्भीक होकर अपने कुकर्म करते हैं और सामान्य नागरिक की सुरक्षा का कोई भरोसा नहीं रहता। ईमानदार पुलिस अधिकारी मनोवैज्ञानिक दबाव और धमकियों के कारण निष्क्रिय हो जाते हैं, जिससे जांच और कार्रवाई आधी-अधूरी रह जाती है। कमजोर और गरीब तबके के लोग न्याय के लिए दर-बदर भटकते हैं, लेकिन अक्सर उन्हें केवल निराशा और असंतोष ही मिलता है।

इस स्थिति में कानून की पवित्रता समाप्त हो जाती है और सामाजिक असमानता और सत्ता का दुरुपयोग बढ़ता है। लोकतंत्र केवल नाम मात्र का रह जाता है, क्योंकि जब कानून गरीब और असहाय के लिए निष्पक्ष नहीं रह सकता, तब न्याय केवल एक शून्य आदर्श बनकर रह जाता है। भारत जैसे लोकतांत्रिक गणराज्य में पुलिस की भूमिका किसी सत्तारूढ़ दल, सरकार या प्रभावशाली व्यक्ति की ढाल बनने की नहीं, बल्कि संविधान, विधि के शासन और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की प्रहरी बनने की है, किंतु दुर्भाग्यवश वर्तमान वास्तविकता यह है कि स्थानांतरण–पोस्टिंग, पदोन्नति, निलंबन, चार्जशीट, प्राथमिकी के पंजीकरण अथवा उसे दबाने तक के निर्णय राजनीतिक आकाओं के निर्देशों से संचालित होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप निष्पक्ष जांच प्रभावित होती है, अपराधी संरक्षण पाते हैं और पीड़ित न्याय से वंचित रह जाते हैं; यही कारण है कि पुलिस व्यवस्था पर से जनता का विश्वास लगातार क्षीण होता जा रहा है और कानून का भय अपराधियों के मन से समाप्त होता जा रहा है।

इसी गम्भीर संवैधानिक संकट को देखते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006) जैसे ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट शब्दों में कहा कि पुलिस सुधार केवल प्रशासनिक सुधार नहीं बल्कि लोकतंत्र को जीवित रखने की अनिवार्य शर्त है, और इसके लिए राज्य सुरक्षा आयोग की स्थापना, कानून-व्यवस्था और जांच शाखा का अलगाव ,पुलिस स्थापना बोर्ड का गठन तथा स्वतंत्र पुलिस शिकायत प्राधिकरण जैसे सुधारों को लागू करना आवश्यक है, ताकि पुलिस निर्भीक होकर केवल साक्ष्य, कानून, न्यायिक मानकों और अपनी अंतरात्मा के आधार पर कार्य कर सके।

जब राजनीतिक दबाव में प्राथमिकी दर्ज की जाती है या दबा दी जाती है, जब जांच सत्ता के इशारों पर मोड़ी जाती है, गवाहों को डराया जाता है और अभियोजन को कमजोर किया जाता है, तब केवल एक मुकदमे का परिणाम ही नहीं बिगड़ता बल्कि पूरी आपराधिक न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। एक स्वतंत्र, पेशेवर और जवाबदेह पुलिस न केवल अपराध नियंत्रण को प्रभावी बनाती है बल्कि वह महिला, बुज़ुर्ग, बच्चे, किसान, व्यापारी, श्रमिक और समाज के सबसे कमजोर वर्गों के लिए वास्तविक सुरक्षा कवच का कार्य करती है, वहीं दूसरी ओर सशक्त जवाबदेही तंत्र यह सुनिश्चित करता है कि पुलिस की स्वतंत्रता निरंकुशता या मनमानी में परिवर्तित न हो।

यह भी सत्य है कि जब पुलिस राजनीतिक संरक्षण में काम करती है तो वह स्वयं भ्रष्टाचार, अवैध वसूली और मानवाधिकार उल्लंघनों का उपकरण बन जाती है, जिससे कानून के शासन की अवधारणा खोखली हो जाती है। अतः आज समय की मांग है कि केंद्र और राज्य सरकारें सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों को केवल कागज़ी अनुपालन तक सीमित न रखें बल्कि उन्हें पूर्ण ईमानदारी, पारदर्शिता और संवैधानिक प्रतिबद्धता के साथ लागू करें और पुलिस को सत्ता–अपराधी–नौकरशाही गठजोड़ से मुक्त करें, क्योंकि जिस देश में पुलिस सत्ता की कठपुतली बन जाती है वहाँ लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया बनकर रह जाता है, और जिस दिन पुलिस वास्तव में स्वतंत्र, निष्पक्ष, संवेदनशील और उत्तरदायी बन जाएगी, उसी दिन न्याय निर्णयों की फाइलों से निकलकर समाज की ज़मीन पर उतरेगा और आम नागरिक के लिए न्याय एक आदेश नहीं बल्कि एक जीवंत, भरोसेमंद और सशक्त अनुभूति बन जाएगा।

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