काशी में विक्रमोत्सव: संस्कृति के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना का पुनर्जागरण
कृष्णमोहन झा
भारत की सांस्कृतिक चेतना का केंद्र यदि किसी नगर को कहा जाए तो वह निस्संदेह काशी है। ऐसी पवित्र और ऐतिहासिक नगरी में जब सम्राट विक्रमादित्य की परंपरा को पुनर्जीवित करने वाला विक्रमोत्सव आयोजित होता है, तो वह मात्र एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं रह जाता, बल्कि राष्ट्रीय आत्मा के पुनर्जागरण का सशक्त माध्यम बन जाता है।
हाल ही में काशी में आयोजित विक्रमोत्सव ने इसी भावना को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया। इस आयोजन ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत की सांस्कृतिक धारा केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य को दिशा देने वाली जीवंत शक्ति है। इस भव्य आयोजन में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव की सक्रिय भूमिका और पहल ने इसे विशेष महत्व प्रदान किया।
विक्रमोत्सव के माध्यम से सम्राट विक्रमादित्य के शासन, न्याय व्यवस्था और सांस्कृतिक योगदान को जिस भव्यता के साथ प्रस्तुत किया गया, उसने यह संदेश दिया कि भारत के इतिहास में निहित आदर्श आज भी प्रासंगिक हैं। इस आयोजन में प्रस्तुत महानाट्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने हजारों दर्शकों को भारतीय परंपरा और गौरव से जोड़ने का कार्य किया।
इस अवसर पर उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उपस्थिति और उनके वक्तव्य ने इस आयोजन के महत्व को और बढ़ा दिया। उन्होंने जिस प्रकार डॉ. मोहन यादव के प्रयासों की सराहना की, वह केवल औपचारिकता नहीं थी, बल्कि यह उस विचारधारा की स्वीकृति थी, जिसमें संस्कृति को शासन और समाज के केंद्र में स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। योगी आदित्यनाथ ने स्पष्ट कहा कि भारत को अपने नायकों, अपनी परंपराओं और अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करना चाहिए, और उन्हें जन-जन तक पहुंचाने के लिए ऐसे आयोजनों की आवश्यकता है।
काशी में विक्रमोत्सव का आयोजन वास्तव में “एक भारत–श्रेष्ठ भारत” की अवधारणा को साकार करने का उदाहरण भी बना। मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक परंपरा और उत्तरप्रदेश की आध्यात्मिक धारा का यह संगम एक व्यापक राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बनकर सामने आया। उज्जैन और काशी—दोनों ही भारत की प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर के प्रमुख केंद्र रहे हैं, और इन दोनों के बीच स्थापित यह सांस्कृतिक सेतु भविष्य में और भी सशक्त हो सकता है।
इस आयोजन की एक और महत्वपूर्ण विशेषता रही काशी विश्वनाथ धाम में वैदिक घड़ी की स्थापना। यह केवल एक तकनीकी उपकरण नहीं, बल्कि भारतीय कालगणना और ज्ञान परंपरा के पुनर्स्मरण का प्रतीक है। यह प्रयास इस बात का संकेत देता है कि आधुनिकता के साथ-साथ अपनी परंपराओं को भी समान महत्व दिया जा सकता है।
विक्रमोत्सव के माध्यम से यह संदेश भी दिया गया कि भारत का इतिहास केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे जीवंत अनुभव के रूप में समाज के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए। सम्राट विक्रमादित्य जैसे महान शासकों के आदर्शों को पुनर्स्थापित कर आज की पीढ़ी को प्रेरित किया जा सकता है।
निस्संदेह, काशी में आयोजित यह विक्रमोत्सव भारतीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसने यह सिद्ध किया है कि यदि सांस्कृतिक कार्यक्रमों को व्यापक दृष्टि और प्रभावी नेतृत्व के साथ आयोजित किया जाए, तो वे समाज में सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बन सकते हैं।
अंततः यह कहा जा सकता है कि काशी में हुआ यह आयोजन केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि एक संदेश है—एक ऐसा संदेश जो भारत को अपनी जड़ों से जोड़ते हुए उसे भविष्य की ओर अग्रसर करता है। यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि भारत की शक्ति उसकी संस्कृति में निहित है, और जब यह संस्कृति जागृत होती है, तो राष्ट्र की चेतना भी नई ऊर्जा से भर उठती है।
(लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)
