डॉलर की बादशाहत को भारत से चुनौती?
रीना एन सिंह
- क्या भारत डॉलर की बादशाहत को चुनौती देगा? तेल, सोना और विदेशी प्रीमियम उत्पादों पर निर्भरता घटने से क्या बदल सकता है वैश्विक आर्थिक खेल?
दुनिया की अर्थव्यवस्था दशकों से अमेरिकी डॉलर के इर्द-गिर्द घूमती रही है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, विशेषकर कच्चे तेल, सोने और हाई-टेक प्रीमियम उत्पादों की खरीद मुख्यतः डॉलर में होती है। इसी व्यवस्था ने अमेरिका को वह आर्थिक शक्ति दी, जिसकी वजह से डॉलर केवल एक मुद्रा नहीं बल्कि वैश्विक व्यापार की धुरी बन गया। लेकिन अब धीरे-धीरे परिस्थितियाँ बदल रही हैं।
यदि भारत तेल, सोना और विदेशी प्रीमियम उत्पादों जैसे iPhone, Tesla कारें और अन्य अमेरिकी ब्रांड्स पर निर्भरता कम करता है तो इसका असर केवल भारतीय बाजार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अमेरिकी डॉलर और अमेरिका की उपभोक्ता-आधारित अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। भारत आज दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता बाजारों में शामिल है। लगभग 150 करोड़ की आबादी वाला भारत केवल एक देश नहीं बल्कि एक विशाल आर्थिक शक्ति बनता जा रहा है। दूसरी ओर अमेरिका की आबादी लगभग 35 करोड़ है। ऐसे में यदि भारत अपने आयात पैटर्न और उपभोग मॉडल में बड़ा बदलाव करता है तो वैश्विक कंपनियों और डॉलर आधारित व्यापार प्रणाली पर उसका असर स्वाभाविक है। भारत हर वर्ष अरबों डॉलर का कच्चा तेल और सोना आयात करता है।
इसके अलावा विदेशी इलेक्ट्रॉनिक और लग्जरी उत्पादों पर भी भारी विदेशी मुद्रा खर्च होती है। Apple के iPhone, अमेरिकी टेक्नोलॉजी उत्पाद, लग्जरी इलेक्ट्रिक वाहन और विदेशी ब्रांडेड गैजेट्स भारत के बड़े शहरी बाजार में तेजी से लोकप्रिय हुए हैं। इन उत्पादों की खरीद डॉलर की मांग बढ़ाती है, क्योंकि इनका भुगतान वैश्विक स्तर पर डॉलर आधारित सप्लाई चेन के माध्यम से होता है। यदि भारत रणनीतिक रूप से इन उत्पादों पर निर्भरता कम करने का निर्णय लेता है तो सबसे पहला असर डॉलर की मांग पर पड़ेगा। कम आयात का अर्थ होगा कम डॉलर भुगतान। इससे भारत का व्यापार घाटा नियंत्रित हो सकता है और रुपया अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में आ सकता है।
यही कारण है कि “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” जैसे अभियान केवल राजनीतिक नारे नहीं बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति माने जा रहे हैं। आज भारत केवल तेल और सोने में ही नहीं बल्कि इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण में भी आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सरकार मोबाइल निर्माण, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन और रक्षा उत्पादन में घरेलू कंपनियों को प्रोत्साहन दे रही है। यदि भविष्य में भारत विदेशी प्रीमियम उत्पादों पर अधिक आयात शुल्क, सीमित प्रोत्साहन या घरेलू विकल्पों को प्राथमिकता देने जैसी नीति अपनाता है, तो इसका प्रभाव अमेरिकी कंपनियों पर भी दिखाई दे सकता है। उदाहरण के लिए Apple का भारत बाजार लगातार बढ़ रहा है। भारत दुनिया के सबसे बड़े स्मार्टफोन बाजारों में से एक है।
यदि भारत में iPhone जैसे उत्पादों की खरीद कम होती है या सरकार घरेलू ब्रांड्स और लोकल मैन्युफैक्चरिंग को अधिक बढ़ावा देती है, तो इससे Apple जैसी कंपनियों की भविष्य की विकास रणनीति प्रभावित हो सकती है। यही स्थिति Tesla जैसी कंपनियों पर भी लागू हो सकती है। भारत यदि विदेशी इलेक्ट्रिक वाहनों की बजाय घरेलू EV कंपनियों को प्राथमिकता देता है, तो यह अमेरिकी ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए एक संकेत होगा कि आने वाले समय में केवल ब्रांड वैल्यू के आधार पर भारतीय बाजार पर कब्जा आसान नहीं रहेगा। हालांकि यह समझना जरूरी है कि भारत का उद्देश्य किसी विशेष देश के खिलाफ “प्रतिबंध” लगाना नहीं बल्कि आर्थिक संतुलन और आत्मनिर्भरता बढ़ाना हो सकता है। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल बाजार है।
दुनिया की लगभग हर बड़ी कंपनी भारत में प्रवेश करना चाहती है, क्योंकि 150 करोड़ लोगों का बाजार भविष्य की सबसे बड़ी आर्थिक संभावना माना जाता है। लेकिन इतनी बड़ी आबादी का सफल प्रबंधन तभी संभव है जब देश अपनी विदेशी निर्भरता को नियंत्रित करे और घरेलू उत्पादन को मजबूत बनाए। यहीं पर “मैनेजमेंट” की भूमिका सामने आती है। अमेरिका कम आबादी के बावजूद आर्थिक महाशक्ति इसलिए बना क्योंकि उसने वैश्विक व्यापार, तकनीक और वित्तीय प्रणाली को संगठित तरीके से नियंत्रित किया।
अब भारत भी अपनी विशाल जनसंख्या को उपभोक्ता शक्ति से उत्पादन शक्ति में बदलने की कोशिश कर रहा है। यदि भारत ऊर्जा बचत, स्थानीय निर्माण, डिजिटल भुगतान, वैकल्पिक ईंधन और नियंत्रित आयात नीति को प्रभावी ढंग से लागू करता है, तो वह आने वाले दशकों में वैश्विक आर्थिक समीकरण बदल सकता है। यह बदलाव केवल भारत तक सीमित नहीं है। BRICS जैसे समूह पहले ही डॉलर आधारित व्यापार व्यवस्था के विकल्प तलाश रहे हैं।
रूस, चीन और कुछ खाड़ी देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं। यदि भारत भी धीरे-धीरे तेल, सोना और विदेशी प्रीमियम उत्पादों की खरीद को रणनीतिक रूप से नियंत्रित करता है, तो “पेट्रोडॉलर” और डॉलर आधारित उपभोक्ता अर्थव्यवस्था दोनों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि यह भी सच है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था अभी भी दुनिया की सबसे मजबूत अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। तकनीक, रक्षा, निवेश बाजार और वैश्विक वित्तीय संस्थानों पर उसकी पकड़ मजबूत बनी हुई है।
इसलिए केवल भारत के कदम से डॉलर कमजोर नहीं होगा। लेकिन यदि दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ इसी दिशा में आगे बढ़ती हैं, तो आने वाले वर्षों में डॉलर की वैश्विक बादशाहत को वास्तविक चुनौती मिल सकती है। भविष्य की लड़ाई केवल सैन्य शक्ति की नहीं बल्कि आर्थिक प्रबंधन, संसाधन नियंत्रण और बाजार रणनीति की होगी और इस बदलते दौर में भारत जैसे विशाल उपभोक्ता देश का हर बड़ा आर्थिक निर्णय पूरी दुनिया की नजर में बेहद महत्वपूर्ण बन चुका है।
