उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले अखिलेश यादव का नया दांव, PDA में ‘पंडित’ जोड़कर ब्राह्मण वोटों पर नजर

Akhilesh Yadav's new move ahead of the Uttar Pradesh elections: eyeing Brahmin votes by adding 'Pandit' to the PDA.
(File Photo/Twitter)

चिरौरी न्यूज

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी (SP) ने चुनाव से पहले अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करने के संकेत दिए हैं। पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने अपने चर्चित PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले में अब ‘P’ का एक नया अर्थ बताते हुए इसे ‘पंडित’ से भी जोड़ दिया है।

लखनऊ में आयोजित ब्राह्मण सम्मेलन में अखिलेश यादव ने कहा कि लोग PDA की नई-नई परिभाषाएं बना रहे हैं, लेकिन वे भूल गए हैं कि इसमें ‘P’ का मतलब पंडित भी है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार ब्राह्मणों को निशाना बना रही है।

अखिलेश का यह बयान यूपी विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले आया है और इसे समाजवादी पार्टी की बदली हुई राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। कभी मुस्लिम-यादव (M-Y) समीकरण के लिए पहचानी जाने वाली सपा अब ब्राह्मणों समेत व्यापक हिंदू वोट बैंक तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है।

मंदिर और हिंदुत्व के मुद्दों पर सपा की नई रणनीति

अखिलेश यादव पिछले कुछ समय से धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर ज्यादा सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने सनातन धर्म का जिक्र किया, साधु-संतों से मुलाकात की, हनुमान चालीसा का पाठ किया और अयोध्या राम मंदिर चंदा विवाद को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने इटावा में यादव परिवार के गढ़ में केदारेश्वर महादेव मंदिर निर्माण की पहल भी की है। राजनीतिक विशेषज्ञ इसे सपा की “सॉफ्ट हिंदुत्व” रणनीति के रूप में देख रहे हैं।

अखिलेश अब भाजपा के हिंदुत्व एजेंडे को छोड़ने के बजाय उसी राजनीतिक मैदान में मुकाबला करने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं।

PDA से ‘PDA + पंडित’ तक

समाजवादी पार्टी की राजनीति लंबे समय तक यादव और मुस्लिम समुदाय के गठजोड़ पर आधारित रही है। मुलायम सिंह यादव के दौर में इसे M-Y फॉर्मूले के नाम से जाना जाता था। बाद में अखिलेश यादव ने इसका विस्तार करते हुए PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का नारा दिया। अब उन्होंने इसमें पंडित समुदाय को भी जोड़ने की कोशिश की है।

ब्राह्मण सम्मेलन में अखिलेश ने कहा कि भाजपा के PDA से हारने के बाद उसकी परिभाषा बदलने की कोशिश की जा रही है, लेकिन लोग भूल गए हैं कि PDA में पंडित भी शामिल हैं। उन्होंने भाजपा सरकार पर ब्राह्मणों, विपक्षी नेताओं और धार्मिक नेताओं के साथ भेदभाव करने का आरोप लगाया।

ब्राह्मण वोट क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समुदाय संख्या के लिहाज से भले ही बहुत बड़ा वोट बैंक नहीं है, लेकिन कई विधानसभा सीटों पर उसका प्रभाव माना जाता है। अनुमान के मुताबिक राज्य के मतदाताओं में ब्राह्मणों की हिस्सेदारी करीब 8 से 12 प्रतिशत तक मानी जाती है।

403 विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में करीब 100 सीटों पर ब्राह्मण मतदाता चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में किसी भी पार्टी के लिए यह समुदाय महत्वपूर्ण हो जाता है।

BSP के कमजोर होने से बदला समीकरण

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण हमेशा से केवल भाजपा के साथ नहीं रहे हैं। 2007 में मायावती की बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने दलित-ब्राह्मण सामाजिक समीकरण बनाकर बड़ी सफलता हासिल की थी।

उस समय BSP ने “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” का नारा दिया था और ब्राह्मण नेता सतीश चंद्र मिश्रा को पार्टी में अहम जिम्मेदारी दी थी। इसी सामाजिक गठजोड़ के सहारे बसपा ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। हालांकि 2012 के बाद BSP का राजनीतिक प्रभाव लगातार कम हुआ और उसका ब्राह्मण समर्थन आधार भी बिखर गया। इसका बड़ा हिस्सा भाजपा की ओर गया, जबकि कुछ वर्ग कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की ओर भी बढ़े।

आरक्षण विवाद के बीच सपा को दिख रही संभावना

हाल के दिनों में आरक्षण को लेकर चल रही बहस और कुछ सवर्ण संगठनों के आंदोलनों के बीच सपा को ब्राह्मणों तक पहुंच बनाने का अवसर नजर आ रहा है। हालांकि अखिलेश यादव पहले भी 2022 विधानसभा चुनाव से पहले मंदिरों की यात्रा और धार्मिक मुद्दों के जरिए हिंदू मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन इसका चुनावी फायदा सीमित रहा था।

अब सवाल यह है कि क्या 2027 के विधानसभा चुनाव में सपा की नई रणनीति ब्राह्मण वोटों को अपने पक्ष में मोड़ पाएगी या नहीं। उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में PDA का यह नया रूप आने वाले महीनों में बड़ा मुद्दा बन सकता है।

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