रूस के राष्ट्रपति की भारत यात्रा: परमाणु ऊर्जा, Su-57और यूक्रेन युद्ध तक कई अहम मुद्दों पर होगी मोदी-पुतिन वार्ता
चिरौरी न्यूज
नई दिल्ली: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 11 सितंबर को भारत दौरे पर पहुंचेंगे और उसी दिन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक करेंगे। यह बैठक 11 से 13 सितंबर तक नई दिल्ली के भारत मंडपम में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से इतर होगी। पुतिन की यात्रा ऐसे समय हो रही है जब भारत-रूस संबंध पारंपरिक रक्षा सहयोग से आगे बढ़कर परमाणु ऊर्जा, व्यापार, तकनीक और बदलती वैश्विक भू-राजनीति के व्यापक आयामों तक पहुंच चुके हैं।
क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव के अनुसार, मोदी-पुतिन वार्ता में भारत में नए परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने में सहयोग और रूस के Su-57 लड़ाकू विमानों की संभावित आपूर्ति प्रमुख मुद्दों में शामिल होंगे। इसके अलावा रूस के कच्चे तेल की खरीद करने वाले देशों पर अमेरिका द्वारा 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने के प्रस्ताव, यूक्रेन संघर्ष और दोनों देशों के व्यापक आर्थिक संबंधों पर भी चर्चा हो सकती है।
परमाणु ऊर्जा और Su-57: रणनीतिक साझेदारी का अगला चरण
भारत और रूस के संबंधों में परमाणु ऊर्जा लंबे समय से महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। अब नए परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को लेकर संभावित सहयोग इस साझेदारी को ऊर्जा सुरक्षा और दीर्घकालिक रणनीतिक सहयोग के नए स्तर तक ले जा सकता है।
दूसरी ओर, Su-57 लड़ाकू विमानों की संभावित आपूर्ति का मुद्दा भारत-रूस रक्षा संबंधों की दिशा को लेकर महत्वपूर्ण संकेत देगा। भारत अपनी सैन्य क्षमताओं के आधुनिकीकरण और आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन पर जोर दे रहा है। ऐसे में रूस के साथ अत्याधुनिक सैन्य तकनीक पर बातचीत का महत्व केवल किसी एक रक्षा सौदे तक सीमित नहीं होगा, बल्कि यह भारत की दीर्घकालिक सुरक्षा आवश्यकताओं और रणनीतिक विकल्पों से भी जुड़ा होगा।
100प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ का प्रस्ताव: भारत के लिए भी महत्वपूर्ण मुद्दा
मोदी-पुतिन बैठक में रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका द्वारा 100प्रतिशत टैरिफ लगाने के प्रस्ताव का मुद्दा भी उठ सकता है। पेस्कोव ने इस प्रस्ताव को अवैध और अस्वीकार्य बताया है।
यह विषय भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि रूस भारत के प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण आधार अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए व्यावहारिक और राष्ट्रीय हित आधारित निर्णय लेना रहा है। इसलिए रूस से ऊर्जा आयात का प्रश्न केवल भारत-रूस संबंधों का मुद्दा नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा,मुद्रास्फीति नियंत्रण और रणनीतिक स्वायत्तता से भी जुड़ जाता है।
यही वह क्षेत्र है जहां भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका दिखाई देती है। नई दिल्ली एक ओर अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को मजबूत कर रही है,वहीं रूस के साथ अपने पुराने संबंधों को भी अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप आगे बढ़ा रही है। यह संतुलन भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
यूक्रेन युद्ध पर भारत की भूमिका पर भी होगी नजर
यूक्रेन संघर्ष भी मोदी-पुतिन वार्ता के महत्वपूर्ण विषयों में शामिल हो सकता है। पेस्कोव ने शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में भारत के योगदान की इच्छा का स्वागत किया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी हाल में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के दौरान पुतिन से मिले थे और उस दौरान उन्होंने युद्ध समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर दिया था।
भारत ने लगातार यह रुख अपनाया है कि संघर्षों का समाधान बातचीत और कूटनीति के माध्यम से होना चाहिए। इस दृष्टिकोण से भारत की भूमिका रूस और पश्चिम के बीच किसी एक पक्ष के समर्थन से अलग दिखाई देती है। नई दिल्ली का प्रयास रहा है कि वह संवाद के लिए सभी पक्षों के साथ संपर्क बनाए रखे।
यही स्थिति भारत को बदलती विश्व व्यवस्था में एक संभावित सेतु और संवादकर्ता की भूमिका प्रदान करती है।
पेस्कोव ने मोदी-पुतिन संबंधों को बताया करीबी
क्रेमलिन ने भारत को रूस का रणनीतिक साझेदार बताते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के बीच करीबी संबंधों को रेखांकित किया है। पेस्कोव के अनुसार, दोनों नेता नियमित रूप से प्रमुख वैश्विक मुद्दों पर चर्चा करते हैं और उनके बीच व्यक्तिगत स्तर पर भी मजबूत संबंध विकसित हुए हैं, जिसके कारण वे संवेदनशील मुद्दों पर भी खुलकर बातचीत कर सकते हैं।
यह व्यक्तिगत संवाद भारत-रूस संबंधों की एक महत्वपूर्ण ताकत है। वैश्विक स्तर पर तेजी से बदलते गठबंधनों के बीच नेताओं के बीच सीधा और निरंतर संवाद संकट के समय रणनीतिक विकल्पों को बनाए रखने में मदद करता है।
रूसी सेना में भारतीय नागरिकों की भर्ती का मुद्दा भी महत्वपूर्ण
रूसी सेना में भारतीय नागरिकों की कथित जबरन भर्ती के सवाल पर पेस्कोव ने कहा कि युद्ध क्षेत्र में मौजूद भारतीय नागरिकों की सूची तैयार की जा रही है। उन्होंने कहा कि उनकी पहचान करने और उन्हें भारत वापस लाने के प्रयास जारी हैं।
यह मुद्दा भारत के लिए मानवीय और कूटनीतिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। भारत-रूस के व्यापक रणनीतिक संबंधों के बीच नई दिल्ली अपने नागरिकों की सुरक्षा और उनकी शीघ्र वापसी को लेकर स्पष्ट अपेक्षा रखती है। ऐसे मामलों का समाधान दोनों देशों के बीच विश्वास को और मजबूत करने की दृष्टि से भी अहम होगा।
ब्रिक्स में राष्ट्रीय मुद्राओं का बढ़ता इस्तेमाल
पेस्कोव ने कहा कि ब्रिक्स देश अब लगभग 90 प्रतिशत लेन-देन अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में करते हैं। उन्होंने ब्रिक्स की अध्यक्षता के लिए भारत की सराहना करते हुए आगामी शिखर सम्मेलन के सकारात्मक परिणामों का विश्वास भी व्यक्त किया।
यह आंकड़ा ब्रिक्स के बदलते आर्थिक चरित्र की ओर संकेत करता है। समूह अब केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं का संवाद मंच नहीं रह गया है, बल्कि वैश्विक वित्तीय और आर्थिक व्यवस्था में वैकल्पिक सहयोग के नए रास्तों पर भी चर्चा कर रहा है।
भारत के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नई दिल्ली वैश्विक व्यापार में अपनी भूमिका बढ़ाने के साथ-साथ ऐसी वित्तीय व्यवस्था का समर्थन करती रही है जिसमें विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के हितों को अधिक प्रतिनिधित्व मिले।
पुतिन की यात्रा और ब्रिक्स: भारत के बढ़ते वैश्विक कद का दोहरा संदेश
पुतिन की भारत यात्रा को केवल द्विपक्षीय संबंधों के नजरिये से देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह यात्रा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की पृष्ठभूमि में हो रही है, जहां दुनिया की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं और वैश्विक शक्तियों के नेता नई दिल्ली में मौजूद होंगे।
रूस, चीन और ईरान जैसे देशों के शीर्ष नेताओं के साथ भारत का एक ही मंच पर संवाद यह दर्शाता है कि नई दिल्ली आज वैश्विक शक्ति-संतुलन के केंद्र में तेजी से महत्वपूर्ण स्थान बना रही है। भारत के लिए चुनौती भी यही है कि वह अलग-अलग शक्ति समूहों के बीच अपने हितों का संतुलन बनाए रखते हुए वैश्विक मुद्दों पर अपनी स्वतंत्र आवाज को और प्रभावशाली बनाए।
भारत की वर्तमान कूटनीति की सबसे बड़ी विशेषता यही दिखाई देती है, साझेदारी किसी एक ध्रुव तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित के आधार पर अनेक शक्ति केंद्रों के साथ समानांतर संबंध।
मोदी-पुतिन वार्ता से आगे की दिशा तय होने की उम्मीद
11 सितंबर की मोदी-पुतिन बैठक में परमाणु ऊर्जा, Su-57, रूसी तेल, यूक्रेन संकट और आर्थिक सहयोग जैसे मुद्दे एक साथ सामने आएंगे। इसलिए यह वार्ता केवल भारत-रूस द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा नहीं होगी, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की रणनीतिक प्राथमिकताओं का भी संकेत दे सकती है।
यदि भारत परमाणु ऊर्जा और उच्च तकनीक वाले रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाता है, रूस के साथ आर्थिक संबंधों को मजबूत करता है और साथ ही यूक्रेन जैसे जटिल अंतरराष्ट्रीय संकटों पर संवाद और शांति की अपनी नीति को जारी रखता है, तो इससे उसकी रणनीतिक स्वायत्तता और वैश्विक कूटनीतिक प्रभाव दोनों मजबूत होंगे।
ब्रिक्स की मेजबानी के बीच पुतिन का भारत दौरा इसलिए भी अहम है क्योंकि यह नई दिल्ली को दुनिया के प्रमुख शक्ति केंद्रों के साथ सीधे संवाद का अवसर दे रहा है। यही भारत के बढ़ते वैश्विक कद की सबसे महत्वपूर्ण तस्वीर है, भारत अब वैश्विक व्यवस्था का केवल दर्शक या अनुयायी नहीं, बल्कि बदलते शक्ति-संतुलन में अपनी भूमिका और एजेंडा तय करने वाला प्रमुख देश बनकर उभर रहा है।
