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ट्रंप का बड़ा फैसला: रूस पर प्रतिबंधों और टैरिफ से फिलहाल पीछे हटा अमेरिका, भारत को मिल सकती है बड़ी राहत

Trump’s major decision: US holds back on sanctions and tariffs against Russia for now; India could see significant relief.चिरौरी न्यूज

वॉशिंगटन/नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से जुड़े नए प्रतिबंधों और टैरिफ को लेकर बड़ा फैसला लिया है। उन्होंने अमेरिका के नए लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट, 2026 के तहत प्रस्तावित कई प्रतिबंधों, पाबंदियों और शुल्कों को फिलहाल लागू करने से छूट दे दी है। ट्रंप ने इस कदम को अमेरिका के राष्ट्रीय हित में बताया है। उनके इस फैसले से भारत और चीन जैसे रूसी तेल के बड़े खरीदारों को संभावित अतिरिक्त अमेरिकी टैरिफ से राहत मिलने की उम्मीद है।

ट्रंप ने शुक्रवार, 16 अक्टूबर को जारी कार्यकारी आदेश में कहा कि उन्होंने इस छूट के पक्ष में अमेरिकी कांग्रेस को आवश्यक प्रमाणपत्र सौंप दिया है। इस कानून का उद्देश्य रूस के तेल और गैस कारोबार पर दबाव बढ़ाना तथा यूक्रेन युद्ध के बीच मॉस्को से ऊर्जा खरीदने वाले देशों के खिलाफ भी कार्रवाई का रास्ता तैयार करना था।

यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब अमेरिका में ऊर्जा की कीमतें बढ़ रही हैं और नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले ईंधन की कीमतें ट्रंप प्रशासन के लिए एक अहम मुद्दा बनी हुई हैं। दूसरी ओर, भारत भी रूसी तेल की खरीद को अपनी ऊर्जा सुरक्षा और किफायती आपूर्ति से जोड़ता रहा है। ऐसे में अमेरिकी प्रशासन के इस कदम पर भारत की खास नजर रहेगी।

लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट, 2026 को ट्रंप ने 18 सितंबर को कानून का रूप दिया था। इसका उद्देश्य रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना और उसकी ऊर्जा से होने वाली कमाई को प्रभावित करना था। इसके तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर भी अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रावधान किया गया था।

कानून के तहत रूस से आने वाले सामान पर 500 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क बढ़ाने का प्रावधान था। इसके अलावा, रूस से कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के पांच सबसे बड़े आयातक देशों के सामान पर 100 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाने की व्यवस्था थी, यदि वे 18 अक्टूबर 2026 या उसके बाद रूस से नई खरीद करते। रूस पर लगे ऊर्जा प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले पांच प्रमुख देशों के सामान पर भी 100 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क का प्रावधान था।

हालांकि, ट्रंप के नए आदेश ने इन शुल्कों को फिलहाल लागू करने से छूट दे दी है। आदेश के मुताबिक, अमेरिकी अधिकारी रूसी तेल और गैस की खरीद तथा प्रतिबंधों से बचने में रूस की मदद करने वाली गतिविधियों पर नजर रखेंगे। यदि प्रशासन को लगेगा कि आगे कार्रवाई की जरूरत है, तो वह दोबारा कदम उठा सकता है।

इसका मतलब यह है कि फिलहाल प्रस्तावित नए शुल्कों से राहत मिली है, लेकिन अमेरिका ने रूस से संबंधित अपनी पूरी प्रतिबंध नीति समाप्त नहीं की है। पहले के कार्यकारी आदेशों के तहत लागू कुछ प्रतिबंध इस फैसले से प्रभावित नहीं होंगे।

भारत को क्यों मिल सकती है राहत?

भारत लंबे समय से रूस से कच्चे तेल का प्रमुख खरीदार रहा है। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्धता, कीमत और आपूर्ति की जरूरतों को देखते हुए भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी तेल की खरीद बढ़ाई थी।

भारत का कहना रहा है कि उसकी ऊर्जा खरीद का मुख्य उद्देश्य देश की जरूरतों के लिए सुरक्षित, स्थिर और किफायती आपूर्ति सुनिश्चित करना है। भारत के लिए कच्चे तेल की कीमतों में बड़ा उतार-चढ़ाव महंगाई, परिवहन लागत और उद्योगों के खर्च पर असर डाल सकता है।

यदि प्रस्तावित अमेरिकी टैरिफ लागू होते, तो भारत से अमेरिका भेजे जाने वाले सामान पर अतिरिक्त शुल्क लगने का जोखिम पैदा हो सकता था। इससे भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा और दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों पर दबाव पड़ने की आशंका थी।

ट्रंप के ताजा फैसले से इस विशेष कानून के तहत प्रस्तावित अतिरिक्त शुल्क फिलहाल टल गए हैं। इससे भारतीय कारोबारियों को संभावित नए टैरिफ के तत्काल खतरे से राहत मिल सकती है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत पर लागू सभी अमेरिकी शुल्क समाप्त हो गए हैं या भविष्य में कोई नया शुल्क नहीं लगाया जा सकता।

चीन भी रूसी ऊर्जा का बड़ा खरीदार है और उसने प्रस्तावित उपायों का विरोध किया था। ऐसे में अमेरिकी फैसले का असर भारत और चीन के साथ-साथ वैश्विक ऊर्जा व्यापार पर भी पड़ सकता है।

अमेरिका में बढ़ती ईंधन कीमतें भी फैसले की बड़ी वजह

ट्रंप प्रशासन का यह फैसला ऐसे समय आया है, जब अमेरिका को बढ़ती ऊर्जा लागत का सामना करना पड़ रहा है। ईरान को लेकर अमेरिका और इजरायल के बीच जारी युद्ध ने भी वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और कीमतों को लेकर अनिश्चितता बढ़ाई है।

यदि रूस से जुड़े नए प्रतिबंध और टैरिफ लागू होते, तो वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति पर दबाव बढ़ने और कीमतों में तेजी आने का जोखिम रहता। इसका असर अमेरिकी उपभोक्ताओं, परिवहन क्षेत्र और कारोबारियों पर पड़ सकता था।

नवंबर में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों से पहले पेट्रोल और डीजल की कीमतें राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण मुद्दा हैं। ईंधन महंगा होने से आम लोगों के खर्च बढ़ सकते हैं और सरकार पर कीमतों को नियंत्रित करने का दबाव बढ़ सकता है।

इसी पृष्ठभूमि में रूस से जुड़े नए प्रतिबंधों पर छूट देने के फैसले को ऊर्जा आपूर्ति और घरेलू कीमतों के लिहाज से देखा जा रहा है। हालांकि, कार्यकारी आदेश में छूट का औपचारिक आधार अमेरिका का राष्ट्रीय हित बताया गया है।

रूस से डीजल आपूर्ति को लेकर भी उठे सवाल

रूस से ऊर्जा आपूर्ति को लेकर ट्रंप प्रशासन के हालिया कदमों पर अमेरिका में आलोचना भी हुई है। रूस से डीजल की आपूर्ति दोबारा शुरू करने की अनुमति देने से जुड़े एक हालिया समझौते पर भी सवाल उठाए गए हैं।

आलोचकों का तर्क है कि रूस से पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद या आपूर्ति बढ़ने से मॉस्को को राजस्व मिल सकता है, जिसका इस्तेमाल वह यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रखने में कर सकता है।

अमेरिकी प्रतिनिधि डॉन बेयर ने ट्रंप के ताजा फैसले की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि इससे यूक्रेन के हितों को नुकसान पहुंचता है और रूस पर दबाव बनाने के लिए कांग्रेस की कोशिशें कमजोर होती हैं।

इस तरह ट्रंप प्रशासन के सामने दो चुनौतियां हैं—एक तरफ रूस पर आर्थिक दबाव बनाए रखना और दूसरी तरफ घरेलू बाजार में ऊर्जा की कीमतों को नियंत्रित करने की कोशिश करना। नए आदेश से फिलहाल ऊर्जा आपूर्ति और कीमतों को प्राथमिकता दिए जाने के संकेत मिलते हैं, लेकिन रूस के खिलाफ अमेरिकी नीति को लेकर बहस जारी है।

मार्को रुबियो के भारत दौरे पर भी ऊर्जा सहयोग रहेगा अहम मुद्दा

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का भारत दौरा भी इस घटनाक्रम के बीच महत्वपूर्ण हो गया है। उनके मुंबई और गुजरात के जामनगर जाने का कार्यक्रम है। जामनगर में रिलायंस इंडस्ट्रीज का विशाल रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स स्थित है, जिसे दुनिया के सबसे बड़े रिफाइनिंग परिसरों में गिना जाता है।

भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने रुबियो के दौरे को कारोबारी सहयोग पर अधिक केंद्रित बताया है। उनके अनुसार, रुबियो मुंबई में कई बैठकें करेंगे और इसके बाद जामनगर में रिलायंस इंडस्ट्रीज के अधिकारियों से मुलाकात करेंगे।

इस दौरे में ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग और निवेश की संभावनाओं पर चर्चा होने की उम्मीद है। रिलायंस की अमेरिका में नई रिफाइनरी स्थापित करने की योजनाओं को भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

रूस से तेल की खरीद, अमेरिकी ऊर्जा जरूरतें और भारत-अमेरिका व्यापारिक संबंध—ये सभी मुद्दे इस दौरे को खास बनाते हैं। हालांकि, किसी विशिष्ट समझौते या रूसी तेल की खरीद को लेकर छूट पर अंतिम नतीजे की पुष्टि संबंधित पक्षों की आधिकारिक घोषणा के बाद ही की जा सकेगी।

ट्रंप के कार्यकारी आदेश में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि को अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ मिलकर उन देशों की गतिविधियों पर नजर रखने का निर्देश दिया गया है, जो रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदते हैं। इसके साथ ही उन देशों की भूमिका की भी निगरानी की जाएगी, जो रूस को प्रतिबंधों से बचने में मदद कर सकते हैं।

अधिकारियों को इस संबंध में नियमित रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपनी होगी। यदि किसी स्थिति में आगे कार्रवाई जरूरी लगती है, तो प्रशासन को इसकी जानकारी दी जाएगी।

आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि मौजूदा छूट तब तक प्रभावी रहेगी, जब तक राष्ट्रपति या संबंधित प्रशासनिक अधिकारी यह तय नहीं कर लेते कि आगे कार्रवाई करना उचित है। यानी भविष्य में परिस्थितियों के आधार पर इन उपायों को दोबारा लागू करने का विकल्प बना रहेगा।

आगे क्या होगा?

ट्रंप के इस फैसले से भारत और चीन जैसे देशों को रूसी ऊर्जा खरीद के कारण प्रस्तावित नए अमेरिकी टैरिफ का तत्काल जोखिम कम होने की उम्मीद है। साथ ही, अमेरिका में ऊर्जा आपूर्ति और कीमतों को लेकर दबाव के बीच प्रशासन को कुछ राहत मिल सकती है।

हालांकि, इस कदम को रूस के साथ अमेरिकी संबंधों में व्यापक बदलाव या भारत पर लागू सभी व्यापारिक शुल्कों की समाप्ति के रूप में देखना सही नहीं होगा। पुराने प्रतिबंधों का एक हिस्सा अब भी लागू है और अमेरिकी प्रशासन ने आगे कार्रवाई का विकल्प खुला रखा है।

आने वाले दिनों में मार्को रुबियो के भारत दौरे, ऊर्जा सहयोग पर होने वाली चर्चाओं और अमेरिकी प्रशासन के अगले कदमों पर नजर रहेगी। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि ट्रंप ने रूस से जुड़े नए प्रतिबंधों और टैरिफ के महत्वपूर्ण प्रावधानों को राष्ट्रीय हित का हवाला देते हुए लागू करने से छूट दी है। भारत के लिए यह संभावित राहत है, लेकिन इसका दीर्घकालिक असर अमेरिका की आगे की व्यापार और ऊर्जा नीति पर निर्भर करेगा।

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