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योगी सरकार का सख्त नियम: यूपी में हिंसक तरीके से ‘सत्ता परिवर्तन’ की वकालत करने वालों को सरकारी नौकरी नहीं

Yogi government’s strict rule: Those in UP who advocate for ‘regime change’ through violent means will not be eligible for government jobs
(File photo/Twitter)

चिरौरी न्यूज

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरी पाने की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए चरित्र सत्यापन को लेकर नए दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार ने सरकारी सेवाओं में सीधी भर्ती के तहत चयनित उम्मीदवारों के चरित्र सत्यापन की प्रक्रिया को सख्त और स्पष्ट करने का फैसला किया है। नए आदेश के मुताबिक, हिंसक तरीकों से मौजूदा व्यवस्था को बदलने या ‘सत्ता परिवर्तन’ की वकालत करने वाली गतिविधियों में शामिल पाए जाने वाले व्यक्तियों को सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य माना जा सकता है।

हाल के विरोध-प्रदर्शनों के दौरान ‘व्यवस्था परिवर्तन’ और ‘सत्ता परिवर्तन’ से जुड़े नारों को लेकर जारी विवाद के बीच यह फैसला चर्चा में है। हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसी उम्मीदवार को केवल उसकी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर सरकारी नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता। इसी तरह, किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल एफआईआर दर्ज होना या जांच लंबित होना भी उसे अपने आप सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य नहीं बनाता।

नियुक्ति एवं कार्मिक विभाग के प्रमुख सचिव एम. देवराज की ओर से जारी दिशा-निर्देश इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में लाए गए हैं। ये नियम प्रदेश के विभिन्न सरकारी विभागों, निगमों, परिषदों और स्थानीय निकायों में सीधी भर्ती के माध्यम से नियुक्त होने वाले अभ्यर्थियों पर लागू होंगे।

सरकार के आदेश में कहा गया है कि ऐसे संगठनों के सदस्य, जिनका घोषित उद्देश्य हिंसक तरीकों से मौजूदा व्यवस्था को बदलना है, सरकारी नियुक्ति के लिए अयोग्य माने जा सकते हैं।

दिशा-निर्देशों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति 21 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद चरित्र सत्यापन की तारीख से पिछले तीन वर्षों के दौरान ऐसी गतिविधियों में शामिल पाया जाता है, तो इसे इस बात का संकेत माना जा सकता है कि वह अब भी ऐसी गतिविधियों में सक्रिय है।

हालांकि, यह निष्कर्ष अंतिम और अपरिवर्तनीय नहीं होगा। यदि संबंधित उम्मीदवार के व्यवहार में सकारात्मक बदलाव आने के ठोस प्रमाण मिलते हैं, तो उसके मामले पर दोबारा विचार किया जा सकता है। यानी केवल पुराने आचरण के आधार पर हर मामले में स्वतः अयोग्यता तय करने के बजाय उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जा सकेगा।

सरकार ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया है कि राजनीतिक विचारधारा अपने आप में सरकारी नौकरी से वंचित करने का आधार नहीं हो सकती। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी राजनीतिक दल, विचार या नीति का समर्थन करना और हिंसक गतिविधियों में शामिल होना अलग-अलग बातें हैं।

इसलिए उम्मीदवार के खिलाफ कार्रवाई का फैसला केवल उसकी राजनीतिक पसंद या विचारधारा के आधार पर नहीं किया जा सकता। चरित्र सत्यापन के दौरान संबंधित गतिविधियों, उपलब्ध साक्ष्यों और लागू दिशा-निर्देशों के आधार पर निर्णय लिया जाना होगा।

समाजवादी पार्टी ने बताया अंग्रेजों के शासन जैसा आदेश

सरकार के नए दिशा-निर्देशों को लेकर विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। समाजवादी पार्टी ने इस आदेश की तुलना ब्रिटिश शासनकाल की नीतियों से करते हुए सरकार पर विरोध की आवाज दबाने का आरोप लगाया है।

सपा प्रवक्ता उदयवीर ने कहा कि ब्रिटिश शासन के दौरान इस तरह के आदेश जारी किए जाते थे, लेकिन स्वतंत्र भारत में विरोध-प्रदर्शन करना संवैधानिक अधिकार है। उनके मुताबिक, सत्ता परिवर्तन लोकतांत्रिक और स्थापित प्रक्रियाओं के जरिए होता है तथा चुनाव के माध्यम से सरकारें बदलती रहती हैं।

उदयवीर ने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार डर पैदा करने वाली मानसिकता के साथ काम कर रही है, जिसके कारण औपनिवेशिक दौर की याद दिलाने वाले आदेश सामने आ रहे हैं।

कांग्रेस ने भी उठाए सवाल, Gen-Z प्रदर्शनों का किया जिक्र

कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने भी सरकार के फैसले की आलोचना की। उन्होंने आदेश को जरूरत से ज्यादा सख्त बताते हुए सवाल उठाया कि ऐसे मामलों में फैसला करने का अधिकार सरकार को क्यों होना चाहिए, जबकि देश में न्यायालय भी मौजूद हैं।

अल्वी ने आरोप लगाया कि सरकार Gen-Z के विरोध-प्रदर्शनों से चिंतित है और इसी वजह से इस तरह के कदम उठाए जा रहे हैं। हालांकि, ये विपक्षी नेताओं की राजनीतिक प्रतिक्रियाएं हैं; सरकार की ओर से जारी आदेश में चरित्र सत्यापन की प्रक्रिया को स्पष्ट करने और हिंसक गतिविधियों से जुड़े मामलों के लिए मानदंड निर्धारित करने की बात कही गई है।

नए दिशा-निर्देशों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि किसी उम्मीदवार के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने या जांच लंबित रहने मात्र से उसे सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य नहीं माना जाएगा।

इसके अलावा, निम्नलिखित परिस्थितियों में भी स्वतः अयोग्यता लागू नहीं होगी:

  • आरोपों से बरी होना: जिन उम्मीदवारों को संबंधित मामले में अदालत से बरी किया जा चुका है, उनके मामले में केवल पुराने मुकदमे के आधार पर स्वतः अयोग्यता नहीं होगी।
  • समझौते से निपटे मामले: जिन मामलों का निपटारा समझौते के जरिए हुआ है, उन्हें भी दिशा-निर्देशों के अनुसार स्वतः अयोग्यता का आधार नहीं बनाया जाएगा।
  • किशोर न्याय कानून के तहत आने वाले मामले: किशोर न्याय कानून के दायरे में आने वाले मामलों पर भी स्वतः अयोग्यता लागू नहीं होगी।

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर मामले में नियुक्ति की गारंटी होगी। अंतिम निर्णय संबंधित मामले की परिस्थितियों, लागू नियमों और चरित्र सत्यापन में सामने आए तथ्यों के आधार पर किया जाएगा।

सत्यापन लंबित होने पर भी जारी हो सकता है नियुक्ति पत्र

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि चरित्र सत्यापन की रिपोर्ट लंबित होने का मतलब यह नहीं है कि उम्मीदवार का नियुक्ति पत्र हर हाल में रोक दिया जाए।

यदि सत्यापन प्रक्रिया पूरी होने में समय लग रहा है, तो नियुक्ति प्राधिकारी उम्मीदवार से स्व-घोषणा पत्र और निर्धारित दस्तावेज प्राप्त करने के बाद अनंतिम नियुक्ति पत्र जारी करने पर विचार कर सकता है।

लेकिन बाद में सत्यापन के दौरान उम्मीदवार अयोग्य पाया जाता है या उसके द्वारा दी गई जानकारी गलत साबित होती है, तो उसकी नियुक्ति तत्काल रद्द की जा सकती है। ऐसे मामलों में आवश्यकतानुसार कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है।

इस प्रावधान का उद्देश्य यह है कि केवल प्रशासनिक देरी के कारण योग्य उम्मीदवारों की नियुक्ति अनिश्चितकाल तक लंबित न रहे। साथ ही, गलत जानकारी देने या पात्रता संबंधी तथ्यों को छिपाने वालों के खिलाफ कार्रवाई का रास्ता भी खुला रहेगा।

नए दिशा-निर्देशों के तहत पहले से सरकारी सेवा में कार्यरत कर्मचारियों को दोबारा चरित्र सत्यापन कराने की आवश्यकता नहीं होगी। हालांकि, नियुक्ति प्राधिकारी जरूरत पड़ने पर संबंधित कर्मचारी के पुराने विभाग से आवश्यक जानकारी प्राप्त कर सकता है। इससे पहले से सेवा में कार्यरत कर्मचारियों के लिए बार-बार सत्यापन कराने की प्रक्रिया से बचा जा सकेगा।

यह प्रावधान मुख्य रूप से मौजूदा सरकारी कर्मचारियों पर लागू होगा, जबकि सीधी भर्ती के तहत नई नियुक्तियों के लिए निर्धारित सत्यापन प्रक्रिया जारी रहेगी।

पुलिस को 30 दिन में देनी होगी चरित्र सत्यापन रिपोर्ट

सरकार ने चरित्र सत्यापन प्रक्रिया में समय-सीमा तय करने पर भी जोर दिया है। नए आदेश के अनुसार, जिला पुलिस और स्थानीय अभिसूचना इकाई (LIU) को सत्यापन का अनुरोध प्राप्त होने के 30 दिनों के भीतर संबंधित नियुक्ति प्राधिकारी को रिपोर्ट सौंपनी होगी।

रिपोर्ट देने में होने वाली देरी की निगरानी गृह विभाग करेगा। इससे सत्यापन प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब को कम करने और भर्ती की प्रक्रिया को समयबद्ध बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

दिशा-निर्देशों में यह भी कहा गया है कि चरित्र सत्यापन के लिए पुलिस या LIU के अधिकारियों को उम्मीदवार के घर जाकर जांच करना अनिवार्य नहीं होगा। इसी तरह, सत्यापन के दौरान उम्मीदवार की व्यक्तिगत उपस्थिति भी जरूरी नहीं होगी।

यदि किसी उम्मीदवार के चरित्र सत्यापन की रिपोर्ट प्रतिकूल आती है, तो जिला मजिस्ट्रेट को संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर देना होगा। उम्मीदवार को ऑनलाइन या व्यक्तिगत रूप से अपनी बात रखने का मौका दिया जा सकता है। इसके बाद ही जिला मजिस्ट्रेट अपनी संस्तुति आगे भेजेंगे। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी उम्मीदवार के खिलाफ प्रतिकूल रिपोर्ट आने पर उसका पक्ष सुने बिना आगे की कार्रवाई न की जाए।

नई व्यवस्था का भर्ती प्रक्रिया पर क्या पड़ेगा असर?

उत्तर प्रदेश सरकार के इन दिशा-निर्देशों से सरकारी नौकरियों में चरित्र सत्यापन के लिए कुछ महत्वपूर्ण मानदंड स्पष्ट हुए हैं। एक ओर हिंसक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी को गंभीरता से लेने की बात कही गई है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक विचारधारा, लंबित एफआईआर और सत्यापन में प्रशासनिक देरी को लेकर भी सीमाएं निर्धारित की गई हैं।

नई व्यवस्था के तहत पुलिस और LIU के लिए 30 दिन की समय-सीमा, अनंतिम नियुक्ति पत्र जारी करने की संभावना और प्रतिकूल रिपोर्ट पर उम्मीदवार को पक्ष रखने का अवसर जैसे प्रावधान भर्ती प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट बनाने के उद्देश्य से किए गए हैं।

हालांकि, आदेश को लेकर राजनीतिक विवाद जारी है। विपक्ष इसे विरोध-प्रदर्शनों पर अंकुश लगाने की कोशिश बता रहा है, जबकि इसके वास्तविक प्रभाव का आकलन भर्ती और चरित्र सत्यापन के दौरान इसके क्रियान्वयन से ही हो सकेगा।

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