‘तेज़ी से सुनवाई का अधिकार निस्संदेह एक बहुमूल्य संवैधानिक अधिकार है’: सुप्रीम कोर्ट
चिरौरी न्यूज
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को ‘सुखविंदर सिंह मामले’ में दो जजों की एक अन्य बेंच द्वारा 2026 में दिए गए उस फैसले पर सवाल उठाया, जिसमें कहा गया था कि अनुच्छेद 21 के तहत ‘जल्द सुनवाई’ (speedy trial) का अधिकार, NDPS एक्ट, 1987 की धारा 37 के तहत तय की गई सख्त जमानत शर्तों से ऊपर नहीं हो सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर संवैधानिक प्रावधानों और NDPS एक्ट, UAPA या PMLA जैसे विशेष कानूनों के बीच कोई टकराव होता है, तो वैधानिक प्रावधानों (statutory provisions) के मुकाबले संविधान को ही प्राथमिकता दी जाएगी।
‘सुजीत दास बनाम भारत संघ’ (UOI) मामले की सुनवाई के दौरान, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने कहा कि ‘स्टेट ऑफ पंजाब बनाम सुखविंदर सिंह उर्फ गोरा’ मामले में 2026 का फैसला “पर इनकुरियम” (per incuriam – यानी कानून की अनदेखी करके दिया गया फैसला) हो गया है। ‘लाइव लॉ’ की रिपोर्ट के अनुसार, बेंच ने यह टिप्पणी की।
वेबसाइट के अनुसार, बेंच ने कहा, “सुखविंदर सिंह उर्फ गोरा मामले में, इस कोर्ट ने माना था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जल्द सुनवाई का अधिकार निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार है। हालांकि, बेंच ने आगे कहा कि NDPS एक्ट जैसे विशेष कानूनों के तहत आने वाले मामलों में – खासकर जहां बरामदगी ‘व्यावसायिक मात्रा’ (commercial quantity) में हुई हो – अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले इस अधिकार का इस्तेमाल धारा 37 के दायरे में रहकर ही किया जाना चाहिए। केवल देरी के आधार पर धारा 37 की शर्तों को दरकिनार करने के लिए इस अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।”
यह फैसला गुरुवार देर रात अपलोड किया गया। इससे पहले के फैसले में कहा गया था कि NDPS एक्ट जैसे विशेष कानूनों के तहत आने वाले मामलों में, आरोपी के ‘जल्द सुनवाई’ के अधिकार (अनुच्छेद 21) का इस्तेमाल धारा 37 द्वारा तय की गई सीमाओं के भीतर ही किया जाना चाहिए, जो जमानत के लिए बहुत सख्त शर्तें रखती हैं। इसमें आगे कहा गया कि केवल लंबी देरी के आधार पर इन शर्तों को बायपास करने के लिए इस अधिकार का सहारा नहीं लिया जा सकता।
बेंच ने ‘भारत संघ बनाम के.ए. नजीब’ (2021) मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला दिया। उस मामले में तीन जजों की बेंच ने माना था कि संवैधानिक अदालतें, सुनवाई में लंबी देरी के आधार पर जमानत दे सकती हैं – भले ही मामला ऐसे विशेष कानूनों के तहत आता हो जिनमें जमानत के लिए बहुत सख्त शर्तें तय की गई हों। इसमें फिर से दोहराया गया कि त्वरित सुनवाई (speedy trial) का अधिकार एक मौलिक अधिकार है और इसका उल्लंघन जमानत देने का आधार बन सकता है।
पीठ ने कहा, “सबसे पहली बात, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले अधिकार केवल संवैधानिक अधिकार नहीं हैं, बल्कि ये मौलिक अधिकार हैं। अनुच्छेद 21 में शामिल ‘जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार’ हमारे संवैधानिक न्यायशास्त्र के मूल में है। इन मौलिक अधिकारों के साथ इतनी आसानी से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती, यहाँ तक कि विशेष कानूनों (special statutes) के तहत भी नहीं।”
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने नवीनतम फैसले में कहा, “इस तरह की टिप्पणियां इस अदालत के कई उन फैसलों के विपरीत हैं, जिनमें यह दोहराया गया है कि जब संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होता है, तो नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) एक्ट की धारा 37 या विशेष कानूनों के ऐसे ही अन्य प्रावधानों की कठोरता को पीछे हटना पड़ता है (यानी उन पर अनुच्छेद 21 को प्राथमिकता दी जाएगी)।”
यह नवीनतम फैसला ऐसे समय में आया है जब सर्वोच्च न्यायालय के भीतर इस बात को लेकर अलग-अलग राय है कि क्या PMLA, NDPS एक्ट और UAPA जैसे सख्त कानूनों के तहत मामलों में सुनवाई में देरी होने पर जमानत दी जा सकती है। यह मुद्दा फिलहाल एक बड़ी पीठ के समक्ष विचाराधीन है।
