राज्यसभा में विपक्ष और सरकार के बीच तीखी बहस, कार्यवाही बाधित
चिरौरी न्यूज
नई दिल्ली: संसद में बुधवार को तनावपूर्ण माहौल बन गया, जब सरकार और विपक्ष के बीच चल रही तीखी बहस ने राज्यसभा की कार्यवाही को बाधित कर दिया। इस दौरान संसदीय आचरण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर दोनों पक्षों के बीच गहरी दरारें उजागर हुईं।
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने राज्यसभा में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के व्यवहार पर सवाल उठाए और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से इस मामले में हस्तक्षेप करने का आग्रह किया। रिजिजू ने कहा कि संसदीय नियमों की अनदेखी की जा रही है और सदस्यों को याद दिलाया कि राज्यसभा का इस्तेमाल केवल लोकसभा से संबंधित मामलों के लिए नहीं किया जा सकता।
रिजिजू ने ‘प्रक्रियात्मक उल्लंघनों’ पर जताई आपत्ति
सभापति को संबोधित करते हुए रिजिजू ने कहा कि लगातार होने वाले व्यवधान संसद के कामकाज को कमजोर कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “सभी सदस्य प्रधानमंत्री का भाषण सुनने का इंतजार कर रहे हैं। अगर कांग्रेस सांसद सुनना नहीं चाहते, तो यह उनका निर्णय है।” उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी संसदीय आचार और नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं।
मंत्री की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई जब सरकार यह सुनिश्चित करना चाह रही थी कि निर्धारित कार्यवाही और महत्वपूर्ण बयान बिना व्यवधान के पूरी हो सकें।
खड़गे ने लोकसभा के फैसले की कड़ी आलोचना की
राज्यसभा के सभापति ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को इस मामले पर बोलने की विशेष अनुमति दी। खड़गे ने कहा कि राहुल गांधी को सदन को संबोधित करने से रोकना अनुचित और अलोकतांत्रिक है। उनका कहना था कि विपक्ष की आवाज़ को जानबूझकर दबाया जा रहा है।
खड़गे के हस्तक्षेप के बाद राज्यसभा में हंगामा शुरू हो गया। विपक्षी सांसदों ने नारे लगाए और सरकार पर असहमति की आवाज़ को दबाने का आरोप लगाया।
विपक्ष और सरकार का रुख
विपक्षी नेताओं का कहना था कि उनका विरोध प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत उचित था। वहीं, सरकारी सदस्य इसे संसदीय नियमों का उल्लंघन बताते हुए कह रहे थे कि ऐसे व्यवधान सदन को प्रभावी ढंग से काम करने से रोकते हैं। राज्यसभा के सभापति को बार-बार व्यवस्था बनाए रखने की अपील करनी पड़ी, लेकिन विपक्ष और सरकार के बीच मतभेद और स्पष्ट हो गए।
संसद में इस हंगामे ने एक बार फिर यह सवाल उठाया है कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और संसदीय आचार के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जाए।
