विपक्ष के बढ़ते विरोध के बीच विदेशी चंदे से जुड़े नियमों को सख्त बनाने वाले प्रस्तावित विधेयक टला
चिरौरी न्यूज
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने विदेशी चंदे से जुड़े नियमों को सख्त बनाने वाले प्रस्तावित विधेयक को फिलहाल टाल दिया है। विपक्ष के बढ़ते विरोध और राजनीतिक विवाद के बीच बुधवार को इसे लोकसभा में पेश नहीं किया गया।
‘विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026’ के जरिए सरकार एनजीओ, ट्रस्ट और अन्य संगठनों को मिलने वाले विदेशी फंड पर कड़ी निगरानी और स्पष्ट नियम लागू करना चाहती है। प्रस्तावित कानून में एक “नामित प्राधिकरण” (Designated Authority) बनाने का प्रावधान है, जो विशेष परिस्थितियों में विदेशी फंड और संपत्तियों का नियंत्रण संभालेगा।
विधेयक के अनुसार, यदि किसी संगठन का एफसीआरए पंजीकरण रद्द हो जाता है, सरेंडर किया जाता है, समाप्त हो जाता है या नवीनीकरण नहीं होता, तो उसकी विदेशी फंडिंग और उससे जुड़ी संपत्तियां इस प्राधिकरण के नियंत्रण में आ जाएंगी। आगे चलकर ये संपत्तियां सरकार के अधिकार में भी जा सकती हैं। सरकार को यह अधिकार भी होगा कि वह ऐसी संपत्तियों को किसी विभाग को सौंप दे या बेच दे, और उससे मिलने वाली राशि भारत की समेकित निधि में जमा की जाए।
विधेयक में यह भी प्रस्ताव है कि एफसीआरए पंजीकरण का नवीनीकरण न होने या आवेदन खारिज होने पर यह स्वतः समाप्त माना जाएगा। इसके बाद संबंधित संगठन विदेशी फंड प्राप्त या उपयोग नहीं कर पाएंगे। साथ ही, सरकार विदेशी चंदे के उपयोग और प्राप्ति के लिए समय-सीमा भी तय कर सकेगी, ताकि फंड को अनिश्चित काल तक रोका न जा सके।
पंजीकरण निलंबित रहने के दौरान संगठनों को विदेशी फंड से बनी संपत्तियों को बेचने, ट्रांसफर करने या गिरवी रखने के लिए पहले सरकार से अनुमति लेनी होगी। एक अन्य महत्वपूर्ण प्रावधान के तहत एफसीआरए उल्लंघन की जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति जरूरी होगी, जिससे जांच प्रक्रिया पर नियंत्रण और कड़ा हो जाएगा।
हालांकि, विधेयक में सजा को लेकर राहत भी दी गई है। उल्लंघन के मामलों में अधिकतम सजा को पांच साल से घटाकर एक साल या जुर्माना या दोनों कर दिया गया है।
इसके अलावा, संशोधन में जिम्मेदारी का दायरा बढ़ाते हुए निदेशकों, ट्रस्टियों, पदाधिकारियों और संचालन निकाय के सदस्यों को भी उल्लंघन के लिए जवाबदेह ठहराया गया है। यदि कोई संगठन बंद हो जाता है या निष्क्रिय हो जाता है, तो उसकी विदेशी फंड से बनी संपत्तियां स्थायी रूप से नामित प्राधिकरण को ट्रांसफर कर दी जाएंगी।
इन व्यापक और सख्त प्रावधानों के कारण विपक्षी दलों ने कड़ा विरोध जताया, जिसके चलते सरकार ने फिलहाल इस विधेयक को पेश करने से कदम पीछे खींच लिया है। अब यह स्पष्ट नहीं है कि इसे दोबारा कब संसद में लाया जाएगा या इसमें कोई संशोधन किए जाएंगे।
