गौतम गंभीर और ढहता हुआ किला: कैसे बिखर गई भारत की अजेय घरेलू टेस्ट बादशाहत

Gautam Gambhir and the crumbling fortress: How India's unassailable home Test reign crumbledचिरौरी न्यूज

नई दिल्ली: लंबे समय तक भारतीय सरज़मीं टेस्ट क्रिकेट का किला थी, एक ऐसा किला जिसे भेदना लगभग असंभव माना जाता था। स्पिनरों का जादू, विशेषज्ञ बल्लेबाज़ों की धैर्यपूर्ण कला, और घरेलू पिचों पर टीम की गहरी समझ ने भारत को दुनिया की सबसे मज़बूत घरेलू टीम बना दिया था। विरोधी टीमों का यहां आना अक्सर औपचारिकता भर रह जाता था, हार निश्चित, जीत की उम्मीद धुंधली।

लेकिन अब इस किले की दीवारों में दरारें नज़र आने लगी हैं। वहां, जहां कभी अजेयता की गूंज सुनाई देती थी, अब बेचैनी और अव्यवस्था का सन्नाटा पसरा है। और इस बदलाव के केंद्र में हैं गौतम गंभीर, भारतीय टेस्ट टीम के कोच, जिनके कार्यकाल ने एक साहसी प्रयोग की तरह शुरुआत की, मगर अब तीखे आलोचनाओं के घेरे में खड़ा है।

न्यूज़ीलैंड के खिलाफ 0–3 की घरेलू हार ने सबको चौंका दिया था। और उसके बाद दक्षिण अफ्रीका से लगातार दो हार ने साफ़ कर दिया कि भारत की गिरावट कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि गहरे संकट का संकेत है। और इस संकट के मूल में, कई विशेषज्ञ मानते हैं, गंभीर की बदलती सोच और नई क्रिकेट फिलॉसफी है।

एक ऐसा दांव, जिसने पूरी तस्वीर बदल दी

गंभीर भारतीय टेस्ट टीम को नई पहचान देना चाहते थे एक ऐसी टीम जो बहुमुखी हो, जहां हर खिलाड़ी बल्लेबाज़ी और गेंदबाज़ी दोनों में योगदान दे सके। लेकिन टेस्ट क्रिकेट की प्रकृति अलग है। यहां विशेषज्ञता की कीमत सबसे ऊँची होती है। यहां वार नहीं, शिल्प चलता है। यहां धैर्य, अनुशासन और सटीकता ही जीत की कुंजी होते हैं।

बहु-भूमिका वाले खिलाड़ियों का उनका विचार आधुनिक लग सकता है, लेकिन उसी विचार ने भारत के सबसे स्थिर क्षेत्रों को अस्थिर कर दिया। बैटिंग ऑर्डर एक प्रयोगशाला बन गया, गेंदबाज़ी छदम-समाधानों की पहेली, और पूरी टीम—अस्थिर और असुरक्षित।

अश्विन, एक भूकंप जिसने नींव हिला दी

भारत के दूसरे सबसे सफल टेस्ट गेंदबाज़ रविचंद्रन अश्विन का अचानक संन्यास लेना भारतीय क्रिकेट के लिए सिर्फ़ एक घटना नहीं, बल्कि एक झटका था। उन्होंने कहा कि निर्णय व्यक्तिगत था, लेकिन उसके आसपास की परिस्थितियों ने तमाम सवाल खड़े कर दिए।

बातें उठीं कि बहु-प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को बढ़ावा देने की गंभीर की रणनीति के चलते अश्विन खुद को किनारे होता महसूस कर रहे थे। क्या उन्हें लगने लगा था कि उनकी विशेषज्ञ भूमिका अब उतनी अहम नहीं रही?

चाहे गंभीर का ऐसा इरादा न रहा हो, लेकिन एक आधुनिक दिग्गज को उपेक्षित महसूस होने की धारणा ने टीम की आंतरिक सेहत पर गहरे प्रश्नचिह्न लगा दिए।

कोहली और रोहित: दो स्तंभों का अचानक ढह जाना

अगर अश्विन का संन्यास एक झटका था, तो विराट कोहली और रोहित शर्मा के टेस्ट संन्यासों ने पूरी इमारत को हिला कर रख दिया। दोनों ने इसे निजी निर्णय बताया, लेकिन लगातार रिपोर्ट्स कहती रहीं कि वे रेड-बॉल क्रिकेट जारी रखने को तैयार थे। आरोप यह भी है कि टीम के माहौल में ऐसा बदलाव आया जिससे वरिष्ठ खिलाड़ियों को लगा कि उनकी आवाज़ और अनुभव को महत्व नहीं दिया जा रहा।

इन दोनों दिग्गजों की विदाई ने टीम से न केवल रन छीने, बल्कि वह आत्मविश्वास, वह स्थिरता, और वह नेतृत्व भी जो संक्रमण के समय किसी टीम की रीढ़ होता है।

एक बल्लेबाज़ी क्रम जो दिशा भूल गया

भारतीय बल्लेबाज़ी क्रम में नंबर 3 एक पवित्र स्थान रहा है, जहां द्रविड़ और पुजारा जैसे चट्टान खड़े रहे। गंभीर के कार्यकाल में यह स्थान लगातार बदलता रहा, शुभमन गिल, साई सुदर्शन, करुण नायर, और यहाँ तक कि वॉशिंगटन सुंदर को भी इस जगह आज़माया गया।

किसी को स्थायित्व नहीं मिला। किसी को जमने का समय नहीं दिया गया। सबसे विवादास्पद फैसला सुंदर की प्रमोशन मानी गई, जिसने दर्शाया कि विशेषज्ञता की जगह बहु-भूमिका को वरीयता दी जा रही थी।

चयन की रेलमपेल

गंभीर के कार्यकाल की सबसे बड़ी आलोचना यह रही कि प्लेइंग इलेवन लगातार बदलती रही। हर मैच में नई रणनीति, नए चेहरे, नई भूमिकाएँ। नतीजा, खिलाड़ी आत्मविश्वास खो बैठे, युवा लगातार असुरक्षित महसूस करने लगे, और टीम की सामूहिक ताल टूट गई।

गंभीर पर आरोप है कि उन्होंने घरेलू मैचों में तेज़ी से टूटने वाली, अत्यधिक टर्न लेने वाली पिचों पर ज़ोर दिया। कोलकाता में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ खेले गए टेस्ट में यह रणनीति मुंह के बल गिरी, मैच तीन दिन में खत्म हो गया और भारत उन्हीं पिचों पर डूब गया जिन्हें विपक्ष को फँसाने के लिए तैयार किया गया था।

और इसके बावजूद गंभीर का बयान कि “यही पिच चाहिए थी”, आलोचकों के लिए आग में घी डालने जैसा साबित हुआ।

भारत की सबसे उलझी हुई टेस्ट टीम?

आज भारत की टेस्ट टीम प्रतिभा से भरी है, लेकिन पहचान से खाली। यह टीम क्या बनना चाहती है? बहु-भूमिका वाला एक्सपेरिमेंट? या खोई स्थिरता की तलाश में एक भ्रमित दल? एक समय जिस टीम को दुनिया की सबसे मजबूत घरेलू टीम माना जाता था, वह आज असहज, अस्थिर और दिशाहीन दिखाई देती है।

अब नज़रें गंभीर पर हैं, क्या वह इस तूफ़ान को थाम पाएंगे, या यह दौर भारतीय टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में एक ऐसे प्रयोग के रूप में दर्ज होगा जिसने बुनियाद हिला दी?

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