ट्रंप टैरिफ के असर से निपटने की तैयारी: मोदी सरकार का बजट ‘ढाल और संतुलन’ की रणनीति पर केंद्रित
चिरौरी न्यूज
नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक व्यापार नीतियों और भारी टैरिफ के बीच भारत की अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रणनीति अब साफ होती नजर आ रही है। रविवार को पेश किए गए केंद्रीय बजट 2026 ने यह संकेत दे दिया कि सरकार एक बदली हुई वैश्विक व्यवस्था में भारत को टिकाए रखने के लिए सतर्क लेकिन रणनीतिक रास्ता अपना रही है।
यह बजट अमेरिकी टैरिफ से प्रभावित निर्यातकों को राहत देने, साथ ही सेमीकंडक्टर, रेयर अर्थ मिनरल्स और क्रिटिकल मिनरल्स जैसे रणनीतिक क्षेत्रों को मजबूत करने पर केंद्रित रहा। प्रधानमंत्री मोदी ने बजट को “140 करोड़ भारतीयों की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब” बताते हुए कहा कि यह सुधारों की यात्रा को मजबूती देता है और विकसित भारत की ओर स्पष्ट रोडमैप पेश करता है।
इंफ्रास्ट्रक्चर और रक्षा पर जोर
मोदी सरकार के खर्च प्लान में इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए नए निवेश और रक्षा बजट में 18% की बढ़ोतरी का वादा किया गया है। इसे चीन और पाकिस्तान जैसे दोहरे रणनीतिक प्रतिद्वंद्वियों से निपटने के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच के तौर पर देखा जा रहा है।
हालांकि, इन प्रस्तावों के बावजूद सरकार ने वित्तीय अनुशासन बनाए रखा। कर्ज के लक्ष्यों से ज्यादा विचलन नहीं किया गया और कुल खर्च पर लगाम रखी गई। पिछले साल की तरह व्यापक टैक्स कटौती इस बार नहीं की गई और न ही कोई बड़ा लोकलुभावन खर्च किया गया, खासकर ऐसे साल में जब भाजपा को कई अहम राज्यों में कड़े चुनावी मुकाबलों का सामना करना है।
वैश्विक हालात पर सरकार की चिंता
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में अपने 90 मिनट के बजट भाषण में कहा कि भारत एक ऐसे बाहरी माहौल का सामना कर रहा है, जहां “व्यापार और बहुपक्षीय व्यवस्था खतरे में है और सप्लाई चेन व संसाधनों तक पहुंच बाधित हो रही है।”
उन्होंने जोर देकर कहा कि इन चुनौतियों के बीच भारत को वैश्विक बाजारों से गहराई से जुड़ा रहना होगा, ज्यादा निर्यात करना होगा और दीर्घकालिक, स्थिर निवेश आकर्षित करना होगा।
हालांकि बजट में अमेरिका का नाम सीधे नहीं लिया गया, लेकिन इसका फोकस साफ तौर पर ट्रंप प्रशासन की नीतियों से पैदा हुई चुनौतियों पर था। अगस्त से अमेरिका द्वारा लगाए गए 50% टैरिफ, खासकर रूस से तेल खरीदने को लेकर, भारत पर दबाव बना रहे हैं। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और इन टैरिफ का सबसे ज्यादा असर टेक्सटाइल और फर्नीचर जैसे श्रम-प्रधान उद्योगों पर पड़ा है।
इन झटकों से निपटने के लिए मोदी सरकार अर्थव्यवस्था को ‘क्राइसिस-प्रूफ’ बनाने की कोशिश में जुटी है। पिछले साल उपभोग करों में कटौती कर घरेलू मांग बढ़ाने, श्रम कानूनों में सुधार, और परमाणु व वित्तीय क्षेत्रों को निवेशकों के लिए खोलने जैसे कदम उठाए गए थे।
नए व्यापारिक रिश्तों पर जोर
अमेरिकी दबाव को संतुलित करने के लिए भारत ने अपने व्यापारिक संबंध भी मजबूत किए हैं। करीब दो दशकों की बातचीत के बाद भारत और यूरोपीय संघ ने हाल ही में मुक्त व्यापार समझौता (FTA) पूरा किया है। इसके अलावा, पिछले साल भारत ने ब्रिटेन और न्यूजीलैंड के साथ भी व्यापार समझौते किए थे।
बजट में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए सेमीकंडक्टर और फार्मास्यूटिकल मैन्युफैक्चरिंग को समर्थन दिया गया है। साथ ही, पूर्वी और दक्षिणी भारत के खनिज-समृद्ध राज्यों में रेयर अर्थ मिनरल्स के खनन, प्रोसेसिंग और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की पहल की गई है।
विकास दर और विपक्ष का हमला
सरकार ने अगले वित्त वर्ष के लिए 6.8% से 7.2% की विकास दर का अनुमान लगाया है, जबकि बाजार का अनुमान इससे कम, करीब 6.6%, है। विपक्ष ने बजट को फीका बताते हुए युवाओं में बेरोजगारी, मैन्युफैक्चरिंग में गिरावट, निवेशकों के पूंजी निकासी, घरेलू बचत में कमी और किसानों की बदहाली जैसे मुद्दों की अनदेखी का आरोप लगाया।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि यह बजट “वास्तविक आर्थिक संकटों से आंखें मूंदे हुए” है।
सरकार के लिए फिलहाल प्राथमिकता अनिश्चित वैश्विक हालात में अर्थव्यवस्था को संभालने की है, जहां वित्तीय लक्ष्यों से भटकने की गुंजाइश बेहद कम है।
कुल मिलाकर, बजट 2026 को मोदी सरकार की एक सतर्क लेकिन रणनीतिक कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है—जो न तो बड़े प्रयोग करता है और न ही वैश्विक तूफानों के बीच दिशा खोने देता है।
