बर्लिन में उभरा राजस्थान का ‘फिल्म फ्रेम’

Rajasthan's 'film frame' emerges in Berlin

  • – भारत–जर्मनी के ऐतिहासिक सिनेमाई रिश्तों की पृष्ठभूमि में राजस्थान ने नई फिल्म पर्यटन नीति के साथ अंतरराष्ट्रीय पर्यटन व फिल्म उद्योग को दिया नया निमंत्रण

चिरौरी न्यूज

जयपुर: बर्लिन के विशाल प्रदर्शनी परिसर में जब दुनिया भर के पर्यटन और रचनात्मक उद्योगों के प्रतिनिधि आईटीबी बर्लिन 2026 में जुटे थे, उसी समय राजस्थान पर्यटन आयुक्त रूकमणी रियाड़, अतिरिक्त निदेशक पवन जैन व संयुक्त निदेशक डॉ. पुनीता सिंह राजस्थान मंडप में एक दिलचस्प चर्चा भी चल रही थी। यहां पर्यटन के साथ-साथ सिनेमाई पर्यटन यानि फिल्म पर्यटन की संभावनाओं पर भी बात हो रही थी। राजस्थान पर्यटन विभाग ने अपने मंडप में हाल ही में घोषित राजस्थान फिल्म पर्यटन प्रोत्साहन नीति–2025 को आईटीबी बर्लिन में  वैश्विक पर्यटन स्टेकहोल्डर्स के सामने प्रस्तुत किया।

यह प्रस्तुति केवल एक सरकारी योजना का प्रचार नहीं थी, बल्कि भारत और जर्मनी के लगभग एक शताब्दी पुराने फिल्म संबंधों की पृष्ठभूमि में उभरती नई संभावनाओं की ओर भी संकेत कर रही थी। राजस्थान मंडप में मौजूद यूरोप, एशिया और अमेरिका से आए कई टूर ऑपरेटरों और लोकेशन स्काउट्स ने राज्य में फिल्मांकन की संभावनाओं को लेकर रुचि दिखाई।

राजस्थान लंबे समय से कैमरे के लिए एक स्वाभाविक आकर्षण रहा है। यहाँ के किले, महल, झीलें और मरुस्थलीय परिदृश्य फिल्मकारों को एक विशिष्ट दृश्यात्मक पृष्ठभूमि प्रदान करते हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय सिनेमा में भी राजस्थान की झलक समय-समय पर दिखाई देती रही है। जेम्स बॉन्ड श्रृंखला की प्रसिद्ध फिल्म “ऑक्टोपसी” (1983) की उदयपुर में हुई शूटिंग ने राज्य को वैश्विक सिनेमा के मानचित्र पर स्थापित किया। इसके बाद “द बेस्ट एक्सॉटिक मैरीगोल्ड होटल” (2011) और “द डार्क नाइट राइज़ेज” (2012) जैसी फिल्मों ने भी राजस्थान की ऐतिहासिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुँचाया।

यूरोपीय फिल्मकारों के साथ भी राजस्थान का संबंध पुराना है। जर्मन निर्देशक वर्नर हर्ज़ोग ने अपनी फिल्म “जग मंदिर” (1991) की शूटिंग उदयपुर के सिटी पैलेस और जग मंदिर में की थी। इसी तरह ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस के संयुक्त निर्माण की फिल्म “द वॉरियर” (2001) की कहानी मध्यकालीन राजस्थान की पृष्ठभूमि में रची गई थी और इसके कई दृश्य राज्य के रेगिस्तानी इलाकों में फिल्माए गए थे।

दरअसल भारत और जर्मनी के बीच फिल्म संबंधों का इतिहास इससे भी अधिक पुराना है। 1930 के दशक में भारतीय फिल्म निर्माता हिमांशु राय ने जर्मनी की प्रतिष्ठित फिल्म कंपनी यूएफए के साथ मिलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर की फिल्मों के निर्माण का प्रयास किया। इस सहयोग के तहत जर्मन निर्देशक फ्रांज ऑस्टेन और सिनेमैटोग्राफर जोसेफ विरशिंग भारत आए और उन्होंने भारतीय फिल्म निर्माण में आधुनिक तकनीक तथा पेशेवर स्टूडियो प्रणाली के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मुंबई में 1934 में स्थापित बॉम्बे टॉकीज़ इसी सहयोग का परिणाम था। हिमांशु राय और अभिनेत्री देविका रानी के नेतृत्व में यह स्टूडियो उस समय भारतीय सिनेमा का सबसे आधुनिक उत्पादन केंद्र बन गया। इसी दौर की फिल्म “अछूत कन्या” (1936) ने सामाजिक विषयों और तकनीकी गुणवत्ता के नए मानक स्थापित किए।

समय के साथ यह सहयोग और मजबूत होता गया। वर्ष 2005 में भारत और जर्मनी के बीच आधिकारिक फिल्म सह-निर्माण समझौता हुआ, जिससे दोनों देशों के फिल्म निर्माताओं को संयुक्त परियोजनाओं में निवेश और वितरण के अवसर मिलने लगे।

जर्मनी का प्रतिष्ठित बर्लिन अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव भी भारतीय फिल्मों के लिए एक महत्वपूर्ण मंच रहा है। पिछले सात दशकों में यहाँ भारतीय सिनेमा की विविध धाराओं—सत्यजीत रे के क्लासिक सिनेमा से लेकर समकालीन स्वतंत्र फिल्मों तक—की नियमित उपस्थिति रही है। इससे भारतीय सिनेमा को यूरोपीय दर्शकों तक पहुँचने का एक सशक्त मंच मिला।

ऐसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ में राजस्थान की नई फिल्म पर्यटन नीति को देखा जा रहा है। इस नीति में फिल्म निर्माताओं के लिए सब्सिडी, प्रोत्साहन और अनुमति प्रक्रियाओं को सरल बनाने जैसे प्रावधान शामिल किए गए हैं। पर्यटन और फिल्म उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो राजस्थान आने वाले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय फिल्म निर्माण का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है।

आईटीबी बर्लिन 2026 का पैमाना भी इस पहल को वैश्विक संदर्भ देता है। तीन से पाँच मार्च तक आयोजित इस मेले में 190 से अधिक देशों के पर्यटन बोर्ड, लगभग 5,500 प्रदर्शक और एक लाख से अधिक ट्रेड विज़िटर शामिल हुए। पर्यटन उद्योग के लिए यह आयोजन केवल व्यापारिक मंच नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संवाद और रचनात्मक सहयोग का भी अवसर माना जाता है।

राजस्थान मंडप में फिल्म पर्यटन नीति को लेकर हुई चर्चाओं से यह स्पष्ट संकेत मिला कि वैश्विक फिल्म उद्योग अब केवल लोकेशन की तलाश में नहीं है, बल्कि ऐसे स्थानों की तलाश में है जहाँ शूटिंग की सुविधाएँ, प्रशासनिक सहयोग और स्थानीय रचनात्मक संसाधन भी उपलब्ध हों। राजस्थान अपनी ऐतिहासिक विरासत, स्थापत्य वैभव और भौगोलिक विविधता के कारण इस दिशा में स्वाभाविक रूप से एक मजबूत उम्मीदवार बन सकता है।

यदि आने वाले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय फिल्म परियोजनाएँ यहाँ बढ़ती हैं, तो इसका प्रभाव केवल पर्यटन तक सीमित नहीं रहेगा। फिल्म निर्माण से जुड़े तकनीकी कार्यों, स्थानीय कलाकारों, शिल्पकारों और सेवा उद्योगों के लिए भी नए अवसर पैदा होंगे। इस तरह बर्लिन में प्रस्तुत की गई यह पहल केवल एक नीति नहीं, बल्कि राजस्थान के लिए एक नए रचनात्मक उद्योग के द्वार खोलने की संभावना भी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *