मिथिला के प्रसिद्ध गाँव सरिसब पाही ने कोविड से लड़ने के लिए शुरू किया ‘सेल्फ सफ़िशिएंट सेंटर’

ईश्वर नाथ झा

नई दिल्ली: कोरोना महामारी से लड़ने के लिए सरकार अपनी तरफ से कोशिश कर रही है, ज्यादातर जगहों पर ये नाकाफी है। खासकर बिहार जैसे राज्यों के दूर दराज वाले इलाकों में जहाँ स्वास्थ्य सुविधाओं का घोर आभाव है। ऐसे में मधुबनी जिले के पंडौल प्रखंड के सरिसब पाही गाँव के लोगों ने न सिर्फ सरकार के लिए बल्कि दूसरे गांवों के लिए भी एक तरफ से नजीर पेश किया है।

स्थानीय युवाओं ने अपने ही क्षेत्र के महानगरों में रहनेवाले लोगों के सहयोग से कोविड संक्रमित मरीजों की प्राथमिक इलाज के लिए “आत्मनिर्भर केंद” का गठन कर लिया है। इस नेक कार्य को बुद्धिजीवियों ने ‘गांव जागे तो देश जागे’ की अप्रतिम मिशाल बताया है।

दरअसल गाँव के लोगों ने कोरोना से लड़ने के लिए एक ‘सेल्फ सफ़िशिएंट सेंटर’ बनाया है जहाँ कोरोना संक्रमितों के इलाज़ की व्यवस्था की गई है। ग्राम पंचायत के “बाढ़ राहत भवन” में कोविड सुरक्षा सह तत्काल प्राथमिक सहायता केंद विकसित किया है। समाज के प्रबुद्ध लोगों की उपस्थिति में इस केंद्र विधिवत प्रारम्भ किया गया। स्थानीय अयाची युवा संगठन के द्वारा कोविड काल में ग्रामीण लोगों में फ़र्स्ट ऐंड सलाह के साथ साथ अन्य सेवा उपलब्ध कराना ही मुख्य उद्देश्य है।

इस पहल गाँव के मूल निवासी और दिल्ली में रहनेवाले सफल मैनेजमेंट एक्सपर्ट ए. एन. झा और पटना में रहनेवाले एजुकेशन स्पेशलिस्ट कमल नाथ झा और दिल्ली के पत्रकार मदन झा ने प्रारम्भिक समय से ही अमूल्य भागीदारी प्रदान किया। स्थानीय युवाओं के इस अनुपम पहल कीं जानकारी प्राप्त होने पर इसी इलाक़े के मूल निवासी संजय झा, जो मुंबई में कार्यरत है, ने मधुबनी स्थित पत्रकार उदय कुमार झा से सम्पर्क किया और यथा सम्भव मदद करने का भरोसा दिया। उजान गाँव के निवासी संजय से अपने आई.आई.टी. के मित्रों के सहयोग से मेडिकल इक्विप्मेंट का इंतज़ाम कर दिया। मुंबई स्थित संस्था “डॉक्टरस फ़ोर यू” के साथ साथ आई.आई.टी.  खरगपुर और INSEAD business school  के पूर्ववर्ती छात्रों ने 4 ऑक्सीजन कॉन्सेन्ट्रेटर ऑक्सीमीटर, पीपीई किट जल्दी उपलब्ध कराया है।

अभी इस संस्था के पास चार ऑक्सीजन सिलिंडर, कोरोना संक्रमण में काम आनेवाली दवाइयाँ, औक्सीमीटर, थर्मल थर्मामीटर, सैनिटाइजर, मास्क, पीपीई किट उपलब्ध है जिसे ग्रामीणों के आर्थिक सहयोग से लाया गया है। ग्रामीणों द्वारा इस तरह के सेंटर की स्थापना की सराहना सभी कर रहे हैं।

इस पहल के संयोजक और पंचायत के मुखिया रामबहादुर चौधरी ने बताया कि सरिसब पाही शिक्षा व आर्थिक दृष्टिकोण से सबल है। परन्तु स्वास्थ्य विभाग की कथित अकर्मण्यता के कारण पंचायत का एपीएचसी बंद है। इलाज के लिए 20 किमी मधुबनी मुख्यालय ही सहारा है। खासकर कोविड संक्रमण के समय यहां के 10 गांवों हाटी, बिठ्ठो रामपुर, इसहपुर, कल्याणपुर, लालगंज, लोहना, पाही,  भट्टपूरा, कोइलखाहा में कोई चिकित्सा सुविधा नही है। इसी कारण ग्रामीणों के साथ विमर्श कर कोविड संक्रमितों की फ़र्स्ट एड इलाज को युवाओं के सहयोग छोटा प्रयत्न किया गया है।

क्यों जरुरत पड़ी ‘सेल्फ सफ़िशिएंट सेंटर’ की

अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसे ‘सेल्फ सफ़िशिएंट सेंटर’ की जरुरत क्यों पड़ी? इस प्रश्न का जबाव इलाके में स्वास्थ्य सुविधाओं का घोर अभाव है। सरिसब में एक छोटा सा सरकारी अस्पताल है। कुछ दिनों तक ये खस्ता हाल में था, अभी भी है। कोई डॉक्टर यहाँ पदस्थापित नहीं थे। जाहिर सी बात है जब डॉक्टर ही नहीं रहेंगे तो इलाज़ कौन करेगा। ग्रामीणों के दवाब और बहुत ज्यादा भागदौर करने के बाद यहाँ एक डॉक्टर की पदस्थापन हुई। लेकिन कोरोना के समय में उनकी भी प्रतिनियुक्ति कभी जिला मुख्यालय में या कोविड केयर सेंटर पर होती रही, नतीजा तक़रीबन 10 किलोमीटर के आसपास में कोई सरकारी डॉक्टर का नहीं होना इस क्षेत्र की जनता की नियति बन गयी।

आस पास के गाँव हाटी, बिठ्ठो, इसहपुर, रामनगर, संकोर्थु, लोहना, पाही, लालगंज, भट्टपुरा, गंगौली, कोइलखाहा जैसे गाँव में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव हो गया। लोगों को इलाज के लिए या तो मधुबनी मुख्यालय या झंझारपुर और सकरी जाना पड़ता है। कोरोना के समय इतना दूर जाना गरीब ग्रामीणों के लिए संभव नहीं है। ऐसे ही आसपास के सभी सरकारी सेंटरों पर डॉक्टरों का अभाव क्षेत्र की जनता को सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि कोरोना जैसी आपात स्थिति से निपटने के लिए आखिर लोग कहाँ जायेंगे।

अभी इस सेंटर पर लोगों के सहयोग से सीमित संख्या में ही सही, एक शुरुआत हुई है जिसकी सराहना हो रही है। कोरोना से बचाव के लिए ‘सोशल डिस्टेंस’ को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। ‘सोशल डिस्टेंस’  का शाब्दिक अर्थ है सामाजिक दूरी, लेकिन सरिसब पाही के कुछ लोगों के द्वारा किया गया यह प्रयास समाज को और नज़दीक लाने में मददगार साबित होगा और इस से दूसरे गांवों को भी प्रेरणा मिलेगी।

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