बजट से पहले करदाताओं की धड़कनें तेज: क्या बढ़ेगा जीरो टैक्स दायरा या आम जनता की हाथ थामे रखेगी सरकार?

Taxpayers' hearts race ahead of the budget: Will the zero-tax bracket expand, or will the government hold the public's hand?
(File Photo/Twitter)

चिरौरी न्यूज

नई दिल्ली: बजट की सुबह हर करदाता के मन में एक ही सवाल है—क्या इस बार मध्यम वर्ग को बड़ा जीरो टैक्स विंडो मिलेगा या फिर सरकार पिछले साल के महंगे टैक्स सुधारों के बाद कदम पीछे खींचेगी?

इस पूरी बहस के केंद्र में है आयकर अधिनियम की धारा 87A, जो नए टैक्स रिजीम में 12 लाख रुपये तक की आय को टैक्स फ्री बनाती है। यह केवल टैक्स स्लैब का सवाल नहीं है। 87A की रिबेट टैक्स कैलकुलेशन के बाद लागू होती है और मार्जिनल रिलीफ यह सुनिश्चित करती है कि कुछ सौ रुपये ज्यादा कमाने पर टैक्स का बोझ अचानक न बढ़े। इसमें ज़रा-सा बदलाव भी यह तय कर सकता है कि कौन टैक्स देगा और कौन नहीं।

टैक्स सिस्टम की रीढ़ है स्लैब स्ट्रक्चर

पुराने रिजीम में 5 लाख और 10 लाख पर पारंपरिक स्लैब बने हुए हैं।

नए रिजीम में जीरो टैक्स सीमा 4 लाख रुपये तक है, जिसके बाद टैक्स दरें धीरे-धीरे बढ़ते हुए 24 लाख से ऊपर 30 प्रतिशत तक पहुंचती हैं। इन स्लैब्स में किसी भी तरह का बदलाव करोड़ों लोगों की टेक-होम सैलरी को सीधे प्रभावित करता है, यही वजह है कि बजट का असर पेरोल टीमों से लेकर छोटे कारोबारियों तक हर जगह चर्चा का विषय बना रहता है।

सबसे आसान राहत मानी जाती है स्टैंडर्ड डिडक्शन। इसमें न तो कोई फॉर्म भरना पड़ता है और न ही सबूत देने होते हैं।

फिलहाल नए रिजीम में यह 75 हजार रुपये, जबकि पुराने में 50 हजार रुपये है। यदि इसे बढ़ाकर 1 लाख रुपये किया जाता है, तो बिना किसी जटिल नीति बदलाव के लोगों की जेब में सीधा पैसा आएगा।

अटकलें यह भी हैं कि क्या सरकार धारा 87A को इतना बढ़ाएगी कि 15 लाख रुपये तक की आय टैक्स फ्री हो जाए। हालांकि कई विश्लेषकों का मानना है कि इसकी संभावना कम है। पिछले साल स्लैब और रिबेट में किए गए बदलावों से सरकार को लगभग एक लाख करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान आंका गया था। ऐसे में जब सरकार फिस्कल कंसोलिडेशन पर जोर दे रही है और नए रिजीम को मुख्यधारा में लाना चाहती है, तो एक और बड़ा टैक्स गिवअवे मुश्किल माना जा रहा है।

एक तरफ ज्यादा रिबेट देने से नए रिजीम की ‘साफ-सुथरी’ संरचना धुंधली हो सकती है, वहीं दूसरी तरफ सख्ती बरतने से महंगाई और बढ़ते घरेलू खर्च से जूझ रहे मध्यम वर्ग की नाराजगी बढ़ने का खतरा है।

इसी बीच बाजारों में बुलियन तूफान भी सुर्खियों में है। वैश्विक बाजार में दो दिनों की ऐतिहासिक गिरावट के बाद सोना-चांदी में तेज बिकवाली देखी गई है।

एमसीएक्स पर सोना 13,711 रुपये गिरकर 1,38,634 रुपये प्रति 10 ग्राम और चांदी 26,273 रुपये टूटकर 2,65,652 रुपये प्रति किलो पर आ गई है। कारोबारियों का कहना है कि बजट में इंपोर्ट ड्यूटी को लेकर अटकलों ने इस गिरावट को और तेज कर दिया है।

फिलहाल सोने-चांदी पर 6 प्रतिशत बेसिक कस्टम ड्यूटी और 3 प्रतिशत जीएसटी लगता है। यदि ड्यूटी घटाकर 4 प्रतिशत की जाती है, तो घरेलू कीमतों में बड़ी राहत मिल सकती है और खरीदारी की लहर लौट सकती है। वहीं ड्यूटी बढ़ाने से ज्वेलरी की मांग पर असर पड़ेगा, लेकिन रुपये और करंट अकाउंट पर दबाव कम हो सकता है।

बुलियन फंड्स का कहना है कि आज का बजट तय करेगा कि मौजूदा गिरावट खरीद का मौका बनेगी या चेतावनी का संकेत। वहीं टैक्स विशेषज्ञों के अनुसार, धारा 87A पर लिया गया फैसला यह तय करेगा कि मध्यम वर्ग के हाथ में ज्यादा पैसा आएगा या फिर यथास्थिति बनी रहेगी।

नए टैक्स रिजीम के मौजूदा स्लैब

  • 0–4 लाख: 0%
  • 4–8 लाख: 5%
  • 8–12 लाख: 10%
  • 12–16 लाख: 15%
  • 16–20 लाख: 20%
  • 20–24 लाख: 25%
  • 24 लाख से ऊपर: 30%

स्टैंडर्ड डिडक्शन

  • नया रिजीम: 75,000 रुपये
  • पुराना रिजीम: 50,000 रुपये
  • (यदि 1 लाख किया गया तो सीधी आय बढ़ेगी)

बजट में संभावित बदलाव

  • धारा 87A की सीमा बढ़ाना
  • नया जीरो टैक्स बैंड
  • स्टैंडर्ड डिडक्शन में बढ़ोतरी
  • स्लैब्स को और स्मूद बनाना

अब सबकी निगाहें बजट भाषण पर टिकी हैं—क्योंकि आज का फैसला न सिर्फ टैक्स स्लैब, बल्कि मध्यम वर्ग की आर्थिक राहत और बाजार की दिशा भी तय करेगा।

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