गोरक्षपीठ का सदियों का संघर्ष  ही राम मंदिर की नींव है

The centuries long struggle of Gorakshpeeth is the foundation of Ram temple.रीना सिंह, अधिवक्ता सुप्रीम कोर्ट

ईश्वर चित्र में नहीं चरित्र में बसते हैं, इन शब्दो को चरितार्थ करते हुए मर्यादा पुर्षोत्तम भगवान श्री राम के भक्त अजय सिंह बिष्ट नामक शर्मिला  नौजवान अध्यात्म और समाज सेवा से आभामंडित  हो कर अयोध्या में राम मंदिर निर्माण आंदोलन के प्रभाव में आकर सन्यासी बन गया तथा हिंदुत्व की सबसे  सम्मानित पीठ गोरक्षपीठ के गोरखनाथ मंदिर से जुड़ा।

1991 में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण आंदोलन की अगुवाई  महंत श्री अवैद्यनाथ जी  कर रहे थे, जिन्होंने अजय सिंह बिष्ट को गोरक्षपीठ का उत्तराधिकारी नियुक्त  कर, योगी आदित्यनाथ का नाम दिया। 1949 में  गोरक्षपीठ के महंत श्री दिग्विजयनाथ जी ने  राम जन्म भूमि मुद्दे  को पुनर्जीवित किया जिसने भारत की राजनीति को सदा के लिए परिवर्तित कर दिया।

गोरखनाथ मठ की तीन पीढ़ियां राम मंदिर आंदोलन से जुड़ी रही हैं, महंत श्री दिग्विजयनाथ जी ने राम मंदिर के आंदोलन को शुरू किया जिसे महंत अवैद्यनाथ जी ने आगे बढ़ाया और आज उनके शिष्ये योगी आदित्यनाथ प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में राम मंदिर का निर्माण करा रहे हैं शायद योगी आदित्यनाथ जी का संन्यासी बनने का कारण राम मंदिर का निर्माण ही तो नहीं था? यह हमारे हिन्दू समाज की विडम्बना ही थी की भगवान राम के प्रदेश में भगवान स्वम ही अपने स्थान के लिए न्यायालय में याचिकाकर्ता थे, यह इस तथ्य को प्रमाणित करता है की वास्तव में हिन्दू  बहुत सहनशील और धर्म का अनुयायी है, दुनिया के किसी भी धर्म या जाति में ऐसी सहनशीलता मिलना असंभव है।

मुग़ल काल से कैसे राम की नगरी अयोध्या फैज़ाबाद हो गयी,  मुग़ल शासन खत्म हुए सदियां बीत गयी थी, तब भी योगी आदित्यनाथ के  सिवा किसी भी  शासक या मुख्यमंत्री ने लोगों की भावनाओं को समझने का प्रयास नहीं किया, सीएम योगी आदित्यनाथ ने  फैजाबाद जिले  का नाम बदलकर अयोध्या किया  और साथ ही नारा दिया की  “अयोध्या हमारी ‘आन, बान और शान का प्रतीक है”  श्री राम मंदिर के निर्माण के लिये सर्वोच्च न्यायालय   के आदेश के बाद ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ नाम से ट्रस्ट का गठन किया गया है, ट्रस्ट के गठन का मुख्य उद्देश्य मंदिर निर्माण एवं निर्माण के पश्चात् मंदिर की देखरेख करना है।

भगवान राम का जन्म 5114 ईस्वी पूर्व को उत्तरप्रदेश के अयोध्या नगर में हुआ था। विदेशी आक्रांता बाबर के आदेश पर सन् 1527-28 में अयोध्या में राम जन्मभूमि पर बने भव्य राम मंदिर को तोड़कर एक मस्जिद का निर्माण किया गया। कालांतर में बाबर के नाम पर ही इस मस्जिद का नाम बाबरी मस्जिद रखा। जब मंदिर तोड़ा जा रहा था तब जन्मभूमि मंदिर पर सिद्ध महात्मा श्यामनंदजी महाराज का अधिकार था। उस समय भीटी के राजा महताब सिंह बद्रीनारायण ने मंदिर को बचाने के लिए बाबर की सेना से युद्ध लड़ा। कई दिनों तक युद्ध चला और अंत में हजारों वीर सैनिक शहीद हो गए।

कहा जाता है की 1,74,000 हिन्दुओं के वीरगति को प्राप्त होने के बाद  ही मीर बांकी मंदिर को ध्वस्त कर पाया था, यह हिन्दू समाज के लिए एक काला अध्याय था जिसकी कालिमा शायद अब राम मंदिर के निर्माण के बाद  छटेगी, राम मंदिर की रक्षा के लिए सिर्फ पुरुषों ने ही शहादत नहीं दी बल्कि वीर  स्त्रियों का बलिदान भी अमर गाथा सुनाता है, स्व. महाराज रणविजय सिंह की पत्नी रानी जयराज कुमारी हंसवर ने अपने पति की वीरगति के बाद खुद जन्मभूमि की रक्षा के कार्य को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया और 3,000 नारियों की सेना लेकर उन्होंने जन्मभूमि पर हमला बोल दिया था और हुमायूं के समय तक उन्होंने छापामार युद्ध जारी रखा, रानी जयराज कुमारी हंसवर के नेतृत्व में यह युद्ध चलता रहा। ले

किन हुमायूं की शाही सेना से इस युद्ध में  रानी जयराज कुमारी लड़ते हुए अपनी बची हुई सेना के साथ शहीद हो गई और जन्मभूमि पर पुन: मुगलों का अधिकार हो गया। अपने आराध्य श्री राम के मंदिर के लिए शहादत यहीं खत्म नहीं हुई, सदियों बाद फिर  2 नवंबर 1990 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने हिन्दू कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया जिसमें सैकड़ों रामभक्तों ने अपने जीवन को अपने आराध्य  श्री राम के लिए समर्पित  कर दिया।

सरयू तट रामभक्तों की लाशों से भर गया था, इस हत्याकांड के बाद अप्रैल 1991 को उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायमसिंह यादव को इस्तीफा देना पड़ा, मुलायम सिंह यादव सत्ता के लोभ में इतने वशीभूत थे की स्वम हिन्दू होते हुए भी राम मंदिर समर्थक हिंदुयों पर गोलियां चलवाने में कोई संकोच नहीं हुआ, सत्ता के   इस  लोभ  ने ही बरसों तक  राम जन्मभूमि को विवादित रखा, अब जब राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो गया है तो ये अवसर प्रसन्नता का पूरक है, राम मंदिर निर्माण की मशाल गोरक्षपीठ ने ही उठा रखी थी जो अब पीठ के पीठाधीश्वर के नेतृत्व में 22 जनवरी 2024 को पूरी होगी।

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