भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते पर भड़का अमेरिका, यूक्रेन युद्ध को लेकर यूरोप पर लगाया दोहरे रवैये का आरोप

The US reacted angrily to the India-EU free trade agreement, accusing Europe of double standards regarding the war in Ukraine.चिरौरी न्यूज

नई दिल्ली: अमेरिका के ट्रेज़री सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच हाल ही में हुए मुक्त व्यापार समझौते की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने आरोप लगाया कि यूरोपीय नेता यूक्रेन युद्ध के मुद्दे पर अपनी ही घोषित नीति को कमजोर कर रहे हैं और भू-राजनीति व ऊर्जा सुरक्षा के बजाय आर्थिक हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं।

अमेरिकी मीडिया को दिए गए एक विस्तृत इंटरव्यू में बेसेंट ने इस भारत-ईयू व्यापार समझौते को लेकर कहा कि भले ही हर देश को अपने आर्थिक हित साधने का अधिकार है, लेकिन यूरोप का यह कदम यूक्रेन नीति में एक “गहरे विरोधाभास” को उजागर करता है।

बेसेंट ने कहा, “यूरोप और भारत का यह बड़ा व्यापार समझौता—क्या इससे अमेरिका को खतरा है? नहीं। उन्हें वही करना चाहिए जो उनके लिए सबसे अच्छा हो। लेकिन यूरोपीय रवैया मुझे बेहद निराशाजनक लगता है, क्योंकि वे यूक्रेन-रूस युद्ध की अग्रिम पंक्ति में हैं।”

उन्होंने यूरोपीय देशों पर आरोप लगाया कि वे अप्रत्यक्ष रूप से उसी युद्ध को वित्तपोषित कर रहे हैं, जिसकी वे सार्वजनिक रूप से निंदा करते हैं। रूस द्वारा यूक्रेन पर हमला करने और पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद भारत ने रियायती रूसी कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई। बेसेंट के अनुसार, इसी तेल से बने रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों का बड़ा खरीदार यूरोप बन गया।

उन्होंने कहा, “भारत ने प्रतिबंधित रूसी तेल खरीदा और फिर उससे बने उत्पाद किसने खरीदे? यूरोप ने। यानी यूरोप खुद अपने खिलाफ चल रहे युद्ध को फंड कर रहा है—यह किसी कल्पना से कम नहीं।”

अमेरिकी ट्रेज़री सेक्रेटरी ने बताया कि रूस से तेल खरीदने के चलते अमेरिका ने भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया, लेकिन यूरोप ने इस तरह के किसी कदम में वॉशिंगटन का साथ नहीं दिया। बेसेंट का दावा है कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि यूरोप भारत के साथ व्यापार वार्ताओं को प्रभावित नहीं करना चाहता था।

उन्होंने कहा, “यूरोप हमारे साथ नहीं आया और बाद में साफ हुआ कि इसकी वजह यही व्यापार समझौता था। जब भी आप किसी यूरोपीय नेता को यूक्रेन के लोगों की अहमियत पर बात करते सुनें, तो याद रखिए कि उन्होंने व्यापार को यूक्रेन से ऊपर रखा।”

बेसेंट ने यह भी स्वीकार किया कि यूरोप की ऊर्जा आयात पर भारी निर्भरता उसके फैसलों को प्रभावित करती है। हालांकि, उन्होंने इसे नैतिक और रणनीतिक समझौते के तौर पर पेश किया।

“उन्हें ऊर्जा चाहिए, और वे सस्ती ऊर्जा चाहते हैं। अगर अमेरिका भी प्रतिबंधित रूसी तेल खरीदने को तैयार होता, तो हमें भी सस्ती ऊर्जा मिल सकती थी,” उन्होंने कहा।

ये बयान पश्चिमी देशों के भीतर बढ़ते मतभेदों को उजागर करते हैं, खासकर इस सवाल पर कि रूस पर आर्थिक दबाव कितनी सख्ती से लागू किया जाए और घरेलू आर्थिक-राजनीतिक चुनौतियों को कैसे संभाला जाए। वहीं, यूरोपीय अधिकारी लगातार यह तर्क देते रहे हैं कि ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता भी उतनी ही ज़रूरी हैं, जितना कि यूक्रेन को समर्थन देना।

बेसेंट ने बातचीत के दौरान कनाडा के साथ संबंधों पर भी संक्षेप में टिप्पणी की और हालिया “तनाव” का ज़िक्र किया, हालांकि उन्होंने इस पर विस्तार से कुछ नहीं कहा।

गौरतलब है कि भारत-ईयू व्यापार समझौता हाल के वर्षों के सबसे बड़े समझौतों में से एक माना जा रहा है, जिससे दोनों पक्षों के आर्थिक रिश्ते और मज़बूत होने की उम्मीद है। लेकिन स्कॉट बेसेंट की टिप्पणियां बताती हैं कि वॉशिंगटन में इस समझौते को यूरोप के जटिल और विवादास्पद संतुलन—भू-राजनीति, व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा—का प्रतीक भी माना जा रहा है।

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