“क्या फिजियो चयन बैठक में बैठेंगे?”: पूर्व बीसीसीआई मुख्य चयनकर्ता ने बुमराह के कार्यभार नाटक की आलोचना की

"Will the physio sit in the selection meeting?": Former BCCI chief selector criticises Jasprit Bumrah's workload drama

चिरौरी न्यूज

नई दिल्ली: भारतीय टीम के स्टार तेज़ गेंदबाज़ जसप्रीत बुमराह की सीमित उपलब्धता को लेकर क्रिकेट प्रेमियों के बीच नाराज़गी बढ़ती जा रही है। चोटों और ‘वर्कलोड मैनेजमेंट’ के कारण बुमराह कई अहम मुकाबलों से बाहर रहे हैं।

उन्होंने न केवल आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी के लिए भारतीय टीम में जगह नहीं बनाई, बल्कि इंग्लैंड दौरे पर खेले गए दो टेस्ट मैचों में भी हिस्सा नहीं लिया। भले ही भारत ने इन मुकाबलों में संतोषजनक प्रदर्शन किया, लेकिन माना जा रहा है कि बुमराह के रहते नतीजे और बेहतर हो सकते थे।

हालांकि बुमराह की अनुपस्थिति केवल चोटों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें ‘वर्कलोड मैनेजमेंट’ के तहत भी बार-बार आराम दिया जा रहा है। इसी मुद्दे को लेकर भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) के पूर्व चयन समिति प्रमुख संदीप पाटिल ने तीखी प्रतिक्रिया दी है और इसे ‘नाटक’ करार दिया है। उन्होंने मिड-डे से बात करते हुए सवाल उठाया, “मुझे हैरानी है कि बीसीसीआई इस सबके लिए कैसे राज़ी हो रही है? क्या फिजियो अब कप्तान और कोच से भी ज़्यादा अहम हो गया है? चयनकर्ता कहां हैं? क्या अब फिजियो चयन समिति की बैठकों में भी बैठेगा और वही तय करेगा कि कौन खेलेगा और कौन नहीं?”

पाटिल ने पुराने दौर के खिलाड़ियों का उदाहरण देते हुए कहा कि जब आप देश के लिए चुने जाते हैं तो आपको अपनी जान भी देश के लिए झोंक देनी होती है। उन्होंने कहा, “मैंने सुनील गावस्कर को मैच के सभी पांच दिन बल्लेबाज़ी करते देखा है। कपिल देव को हर दिन गेंदबाज़ी करते देखा है, यहां तक कि नेट्स में भी वे हमें गेंद फेंकते थे। उन्होंने कभी आराम नहीं मांगा, कभी शिकायत नहीं की, और उनके करियर 16 साल से भी लंबे चले। 1981 में ऑस्ट्रेलिया में मुझे सिर में चोट लगी थी, लेकिन मैंने अगला टेस्ट नहीं छोड़ा।”

संदीप पाटिल का मानना है कि आज के खिलाड़ियों के पास जिस तरह की मेडिकल और रिहैब सुविधाएं उपलब्ध हैं, उनकी तुलना में उनके दौर के खिलाड़ियों के पास कुछ भी नहीं था। बावजूद इसके वे लगातार खेलते थे, चाहे चोट हो या थकान। उन्होंने कहा, “आज के खिलाड़ियों को हमसे कहीं ज़्यादा खेलने के काबिल होना चाहिए क्योंकि उनके पास हर तरह की सुविधा है। हमारे समय में रिहैब जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी। कई बार हम चोटिल होकर भी खेलते थे। हम बस देश के लिए खेलना चाहते थे, न कोई बहाना था, न कोई नाटक।”

उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि आज के बल्लेबाज़ जिस तरह के शॉट्स खेलते हैं, वह काबिले तारीफ है। लेकिन खिलाड़ियों का बार-बार मैचों से गायब रहना उन्हें हज़म नहीं होता। उन्होंने कहा, “मैं आज के बल्लेबाज़ों की शॉट मेकिंग देखकर हैरान होता हूं। हमारे ज़माने में अगर कोई खिलाड़ी फैंसी शॉट खेलता था तो सुनील गावस्कर डांटते थे। वक़्त बदल गया है, हम इसे स्वीकार करते हैं, लेकिन यह नहीं समझ आता कि खिलाड़ी मैच क्यों छोड़ रहे हैं।”

संदीप पाटिल की यह टिप्पणी न केवल बुमराह के मामले पर तीखा सवाल खड़ा करती है, बल्कि आधुनिक क्रिकेट में ‘वर्कलोड मैनेजमेंट’ की अवधारणा को लेकर भी एक बड़ी बहस को जन्म देती है।

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