रण में प्रदर्शित दुनिया का सबसे विशाल खादी तिरंगा: आत्मनिर्भर ‘नये भारत’ की गाथा

World Largest Khadi Tricolour Displayed at Rann: The Story of a Self-Reliant 'New India'मनोज कुमार, अध्यक्ष, खादी और ग्रामोद्योग आयोग, भारत सरकार

कच्छ का सफेद रण- जहाँ धरती और आकाश मानो एक-दूसरे में विलीन होते दिखाई देते हैं-आज केवल प्राकृतिक आश्चर्य का स्थल नहीं, बल्कि नये भारत के बदलते आत्मविश्वास का सजीव प्रतीक बन चुका है। इसी विराट विस्तार के बीच, हाल ही में गणतंत्र दिवस के अवसर पर, दुनिया के सबसे विशाल प्रतीकात्मक खादी तिरंगे (Iconic Khadi Tiranga) का भव्य एवं दिव्य प्रदर्शन किया गया। यह केवल एक आयोजन नहीं था, बल्कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में स्वदेशी परंपरा, राष्ट्रीय संकल्प और समकालीन भारत की विकास-दृष्टि की सशक्त सार्वजनिक अभिव्यक्ति थी।

इस अद्भुत, अविश्वसनीय, अकल्पनीय दृश्य के साक्षी देश के कारीगर, सुरक्षा बलों के जवान और अनेक नागरिक बने। ये भी अपने आप में नया कीर्तिमान बना कि देशभर के लाखों खादी कारीगरों ने वीडियो संदेश के माध्यम से राष्ट्रीय ध्वज को सलामी देखकर इतिहास रच दिया। यह क्षण इस बात को रेखांकित करता है कि राष्ट्र निर्माण किसी एक संस्था या वर्ग का कार्य नहीं, बल्कि सामूहिक प्रयास का परिणाम होता है। यह तिरंगा केवल कपड़े का विस्तार नहीं, बल्कि विचार का विस्तार है। खादी, जिसे कभी स्वतंत्रता आंदोलन की आत्मा कहा गया, आज आत्मनिर्भर भारत की ऊर्जा के रूप में पुनर्परिभाषित हो रही है। महात्मा गांधी का यह कथन-“खादी भारत की आर्थिक स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का प्रतीक है”- समकालीन भारत में एक नए अर्थ के साथ जीवंत दिखाई देता है।

इस राष्ट्रीय पुनर्जागरण को समझना हो तो भुज की ओर देखना पर्याप्त है। विनाशकारी भूकंप ने कभी इस शहर को गहरे घाव दिए थे, किंतु संकट के उसी क्षण में एक दीर्घदर्शी दृष्टि ने पुनर्निर्माण को केवल आवश्यकता नहीं, अवसर के रूप में देखा। तत्कालीन मुख्यमंत्री और आज के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भुज का पुनर्जन्म हुआ- योजनाबद्ध शहरीकरण, सुदृढ़ अधोसंरचना और सामुदायिक पुनर्स्थापन के माध्यम से।

पुनर्निर्माण के 25 वर्ष बाद, भुज केवल खड़ा नहीं है; वह आगे बढ़ रहा है। वह इस सत्य का प्रमाण है कि जब नेतृत्व में स्पष्टता और संकल्प हो, तो आपदा भी विकास की प्रस्तावना बन सकती है।

भौगोलिक रूप से सीमांत क्षेत्र में स्थित होने के कारण भुज का महत्व और भी बढ़ जाता है। यहाँ विकास और सुरक्षा परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। तैनात भारतीय सैनिकों की सतर्क उपस्थिति हमें याद दिलाती है कि राष्ट्र की आर्थिक प्रगति उसकी सामरिक स्थिरता पर ही टिकती है। “ऑपरेशन सिंदूर” की भावना से प्रेरित विश्व के सबसे विशाल प्रतीकात्मक खादी तिरंगे (Iconic Khadi Tiranga) को दी गई सलामी वस्तुतः उन अनगिनत वीरों के प्रति राष्ट्र की सामूहिक कृतज्ञता है, जिनके त्याग से विकास की धारा निर्बाध बहती है।

यदि तिरंगा राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है, तो खादी उस गौरव की आत्मा है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने खादी को अतीत की स्मृति से निकालकर भविष्य की रणनीति का हिस्सा बनाया है। उनके शब्दों में- “खादी केवल वस्त्र नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत का विचार और जन-आंदोलन है।”

इस जन-आंदोलन ने पूरे भारत को आंदोलित किया है। परिणाम सामने है। आज ग्राम स्वराज की अवधारणा व्यवहारिक अर्थशास्त्र में परिवर्तित होती दिखाई दे रही है। खादी और ग्रामोद्योग उत्पादों की बिक्री 1.70 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर चुकी है और शीघ्र ही 2 लाख करोड़ रुपये तक पहुँचने की ओर अग्रसर है। इससे भी अधिक उल्लेखनीय यह है कि इस क्षेत्र ने 2 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान किया है- एक ऐसा परिवर्तन जो ग्रामीण भारत को केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि उत्पादक शक्ति के रूप में स्थापित करता है।

सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रशिक्षण, टूल्स वितरण और स्थानीय कौशल को प्रोत्साहन देने वाली पहलों ने विकास का एक विकेंद्रीकृत मॉडल प्रस्तुत किया है। पिछले 11 वर्षों 2.88 लाख से अधिक मशीनों और टूलकिट्स के वितरण ने यह साफ संकेत दिया है कि भारत का विकास अब महानगरों तक सीमित नहीं; वह गाँवों, कुटीर उद्योगों और पारंपरिक कारीगरों के माध्यम से व्यापक सामाजिक आधार प्राप्त कर रहा है।

इस परिवर्तन के केंद्र में श्रम की गरिमा है। खादी कारीगरों की पारिश्रमिक 15 रुपये प्रति लच्छा तक पहुँच चुकी है और इसे 20 रुपये प्रति लच्छा से आगे ले जाने का संकल्प इस बात का द्योतक है कि आर्थिक विकास का वास्तविक अर्थ आय वृद्धि के साथ सम्मान की स्थापना भी है। यह परिघटना वस्तुतः एक उभरते “आर्टिजन युग” का संकेत देती है- एक ऐसा कालखंड, जिसमें परंपरा और प्रौद्योगिकी मिलकर नई समृद्धि का निर्माण कर रहे हैं।

डिजिटल युग में प्रतीकों की शक्ति और भी बढ़ जाती है। #IconicKhadiTiranga का सोशल मीडिया पर 20 मिलियन से अधिक व्यूज़ प्राप्त करना केवल लोकप्रियता का संकेत नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक परिवर्तन का द्योतक है। विशेषकर Gen-Z का इस प्रतीक से जुड़ना बताता है कि नई पीढ़ी वैश्विक आकांक्षाओं के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक पहचान को भी उतनी ही दृढ़ता से स्वीकार करना चाहती है।

कच्छ के सफेद रण में भव्य और दिव्य रूप में आलोकित होता यह तिरंगा अंततः हमें एक व्यापक सत्य की ओर ले जाता है- राष्ट्र निर्माण किसी एक नीति, एक परियोजना या एक समयखंड का परिणाम नहीं होता। वह दृष्टि, निरंतरता और सामूहिक विश्वास से निर्मित होता है। जब विरासत को सम्मान मिलता है, जब विकास समावेशी होता है, जब सीमाएँ सुरक्षित होती हैं और जब नेतृत्व भविष्य को देखने का साहस रखता है-तब परिवर्तन एक घटना नहीं, एक युग बन जाता है।

भुज का पुनर्जागरण, खादी का पुनरुत्थान और ग्राम स्वराज की नई ऊर्जा मिलकर जिस भारत की रचना कर रहे हैं, वह संभावनाओं का नहीं, उपलब्धियों का भारत है- आत्मविश्वासी, आत्मनिर्भर और निर्णायक।

सफेद रण में विराजमान प्रतीकात्मक खादी तिरंगा (Iconic Khadi Tiranga) इसी भारत का ध्वजवाहक है- एक ध्वज, जो केवल हवा में नहीं लहराता, बल्कि एक राष्ट्र की चेतना को वैश्विक पटल पर नयी पहचान देता है।

World's Largest Khadi Tricolour Displayed at Rann: The Story of a Self-Reliant 'New India'

(लेखक खादी और ग्रामोद्योग आयोग, भारत सरकार, के अध्यक्ष हैं। इस लेख में व्यक्त उनके निजी विचार हैं।) 

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