समाज में गांधी के आलोचक

निशिकांत ठाकुर

कहा गया है की यदि आप स्वयं नहीं गिरना चाहते तो किसकी मजाल जो आपको गिरा दे। जरूरी है कि इसके लिए आप में आत्मबल हो और आपने अपने भविष्य का रास्ता चुन लिया हो। गांधीजी किसी से यह आग्रह नहीं करते थे कि वह उपवास पर बैठने जा रहे हैं , लेकिन पूरा देश उनके पीछे खड़ा रहता था और विश्व के समाचार पत्र और पत्रिकाएं उन्ही के बारे में समाचार प्रकाशित करतें थे फिर उसका प्रभाव अंग्रेज शासकों पर पूरी तरह पड़ता था। जिसके कारण ‘एकला चलो ‘के मार्ग पर वह निकल जाते थे। यह गांधी जी का आत्मबल ही था। आज हम उनका जिक्र करते गर्व का अनुभव करते हैं, लेकिन कुछ तथाकथित समाजसेवी आज उन पर भी कटाक्ष करते हैं और तरह तरह के आरोप लगाते हैं। क्या यही हमारा परिवेश रहा है? क्या हमारा संस्कार हमें यहीं सिखाता है?

इसीलिए कहा गया है की गांव/समाज किसी के उपकार को कभी नहीं मानता और शव श्रृंगार नही जानता। यदि ऐसा नहीं होता तो महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों के प्रति इस प्रकार के भाव को कोई प्रकट नहीं करता। यह इसलिए की आज आजादी के उस काल के कोई जीवित नहीं हैं जो ताल ठोक कर यंह कह सके की उन्होंने (गांधी जी ने) जो काम किया था निश्चित रूप से वह समयकाल और परिस्थितियों के अनुसार ही किया था । यदि ऐसा नही होता तो आजादी के बाद देश का कोई भी सर्वोच्च पद वह पा सकते थे, पर आजादी के आंदोलन से जुड़े बहुत से नेताओं को अच्छे पद सौंपे गए। लेकिन, महात्मा गांधी और जयप्रकाश नारायण ही ऐसे थे जिन्होंने कोई पद स्वीकार नहीं किया। जिसका परिणाम यह हुआ कि दिन दहाड़े दिल्ली जैसे सुरक्षित शहर के सार्वजनिक प्रार्थना सभा में गोली मारकर उनकी सरेआम हत्या कर दी गई।

क्या आज का समाज महात्मा गांधी के इस त्याग को आजादी के कुछ ही वर्षों बाद इस प्रकार भूल जाएगा और उनकी आलोचना करके देश के गरिमामय पद पर भी बैठेगा। पर, शायद देश का बुद्धिजीवी समाज इसे अधिक दिनों तक सह नहीं सकेगा स्वीकार नहीं कर पाएगा। गांधी विरोधियों की कट्टरता और हिंसक प्रवृत्ति का यहां एक संस्मरण आपको बताना चाहता हूं। बात काफी पहले की है दैनिक जागरण के कानपुर संस्करण में एक खबर छपी कि हत्यारे नाथूराम गोडसे की मूर्ति का अनावरण किया गया। खबर प्रकाशित करना तो समाचार पत्र का काम है। कुछ दिन बाद एक पोस्टकार्ड पर टाइप किया और हस्ताक्षरित फोन नंबर सहित पत्र कानपुर आया। चूंकि भेजने वाले का पता और फोन नंबर दिल्ली का था इसलिए वह पत्र मेरे पास दिल्ली ऑफिस भेज दिया गया। पत्र में कहा गया था कि गोडसे को हत्यारा क्यों लिखा गया। उन्हें हुतात्मा लिखा जाए। संपादक को ढेरों भद्दी भद्दी गलियों के साथ कहा गया था कि यदि भूल सुधार नहीं छापा गया तो संपादक की बोटी-बोटी कटकर चील कौओं को खिला दिया जाएगा। प्रथिमिक रिपोर्ट में यह कहा गया की इस तरह धमकी सरे आम तब देना जबकि कोर्ट ने हत्या का अपराधी मानकर उसे फांसी की सजा दी थी फिर हत्यारा लिखना कहां अनुचित है ? पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने में रपट दर्ज कराने के बाद उस सज्जन की गिरफ्तारी हुई। मामला कोर्ट में चला। फिर जो बयान उन्होंने दिया उसका यहां उल्लेख करना उचित नहीं है, लेकिन गांधी जी के प्रति जो जहर उन्होंने उगला उसकी कल्पना मुझ जैसा किसी को उम्मीद नहीं होगी। जहां तक मुझे याद आता है उनकी नजर में गांधी जी की जो हत्या की गई वह कोई गलत नहीं था और उन्हें राष्ट्रपिता के रूप में संबोधित करना भी उन्हे स्वीकार नही था। कुछ दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई और केस बंद हो गया।

यह संस्मरण यहाँ इसलिए क्योंकि मुझ सहित सारा समाज यह जानता हैं। महात्मा गांधी ने देश के लिए जो किया और जिस तरह से किया वह विश्व के लिए बिल्कुल नायब तरीका था। पिछले दिनों अपने एक लेख में महात्मा गांधी के नेतृत्व देने की बात की थी तो तरह तरह की प्रतिक्रिया आई जिसमे एक महत्वपूर्ण फोन था कि केवल गांधी जी को ही लीडर क्यों माना जाता हैं? और भी तो कई लीडर थे जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना नेतृत्व दिया। मुझे उसका प्रश्न अजीब लगा। फिर उन्हें बताया कि परिवार का मुखिया तो एक ही होता है और उनके ही कहने के अनुसार परिवार चलता है और गांधी जी ऐसे नेता थे जो सबकी सुनते थे और सही सलाह देते थे। सुभाष चंद्र बोस उनके प्रिय थे, लेकिन वह गरम दल के थे। गांधी जी कहा करते थे अंग्रेज से टकराकर आजादी हम नहीं ले सकते क्योंकि इसके पीछे अमेरिका की शक्ति है। परिणाम सबने देख लिया कि कोहिमा में आजाद हिंद फौज को किस प्रकार हार का सामना करना पड़ा। गांधी जी की आलोचना का एक और उदाहरण देना चाहूंगा। साउथ अफ्रीका के पीटर मेरिट्जबर्ग स्टेशन पर सन 1893 में गांधी जी को कड़कती ठंड में जो फर्स्ट क्लास के डब्बे से बाहर फेंका गया वह अंग्रेजो द्वारा गांधी जी की मार्केटिंग करने का एक ड्रामा मात्र था। आलोचक का कहना है की यह घटना भारतवर्ष में भारत कोकिला सरोजनी नायडू के पिता अघोरनाथ चट्टोपाध्याय के साथ घटी थी । उन्हे फर्स्ट क्लास का टिकट देने से मना कर दिया गया और कुछ सैनिकों ने जबरन उठाकर सेकेंड क्लास के डब्बे में ठूंस दिया , जहां उन्होंने डब्बे में उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए कहा था ” मैं स्वेक्षा से इस बोगी में नहीं आया हूं मुझे जबरदस्ती सेकंड क्लास के डब्बे में ठूंस दिया गया है “। आलोचक का यह भी कहना है की इस घटना को गांधीजी से जोड़कर उनकी मार्केटिंग की गई । वह समय था जब रंग भेद चरम पर था और गांधी जी को इसका सामना करना पड़ा। सच भी यह है कि इस अपमान से लड़ने के लिए उन्होंने जो आंदोलन खड़ा किया, वह इतिहास बन गया। अपने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब 8 जुलाई को साउथ अफ्रीका जाएंगे।

यह तो मात्र कुछ ही उदाहरण हैं वह इसलिए क्योंकि अभी मद्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने गांधी के प्रति ऐसे ही जहर उगलने वाले कट्टर विरोधी और आलोचक को कांग्रेस में शामिल करके उसकी डूबती नाव को और भी रसातल में पहुंचाने का पुरजोर प्रयास किया है । आज गांधी जी और उनके विचारों की आलोचना करने वाले सरेआम चाय – पान, बस – रेल की यात्रा के दौरान आपको मिल जाएंगे। मैं मानता हूं कि इस प्रकार की आलोचना करने वाले निश्चित रूप से इतिहास से अनभिज्ञ होते हैं, लेकिन अपने लोकतंत्र में बोलने लिखने का अधिकार हमारे संविधान ने सबको दिया है। इसलिए किसी के आलोचना से उन महापुरुषों की आत्माओं पर कोई फर्क नहीं पड़ता। जहां तक मेरी सोच है वह यह कि इन आलोचकों का जन्म उस काल में क्यों नहीं हुआ, जिस काल में आजादी के दीवाने अपने देश के नाम पर आजादी के नाम पर फांसी के फंदे पर हंसकर झूलने को तैयार रहते थे। अनशन करके अपने जीवन लीला को समाप्त कर देते थे।

बात कड़वी है , लेकिन सच यह है की आलोचना तो उनकी ही होती हैं जिनका कद बहुत ऊंचा होता है और आलोचक की पहुंच से बाहर होते हैं जो उस कद या पद पर पहुंचने का सपना भी नहीं देखते । गांधी जी देश में किसी संवैधानिक पद पर नहीं थे, लेकिन उनका कद इतना ऊंचा था की आलोचक आज भी उनके नाम की तथा काम से ईर्ष्या करते हैं । इसलिए वह अपनी कुंठा , अपनी ईर्ष्या को शांत करने के लिए गांधी जी की और दूसरों की कमियों को ढूंढते हैं। काश, ऐसे आलोचक अपनी ऊर्जा का सदुपयोग सकारात्मक विचार के लिए करते तो उनका भला तो होता ही होता समाज और देश का भी भला होता। रहीं राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी की बात – वह कल भी महान थे, आज भी सामयिक है और आगे भी उनकी महानता को कोई चुनौती नहीं दे सकेगा। आज जो उनके आलोचक हैं यदि गंभीरता से उनकी बात को पढ़ेंगे, उनके कृत्य को जानेंगे तो फिर कभी उनकी कमियों को ढूंढने के बजाय उनकी अच्छाइयों के नक्शे कदम पर चलने के लिए कटिबद्ध हो जाएंगे। वह महापुरुष स्वयं कहा करते थे मेरा राजनीतिक जीवन सभी के लिए है और इसलिए पारदर्शी हूं । ऐसे महा पुरुष को शत शत नमन बार बार नमन ।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)।

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