…तो क्या बेरोज़गार खिलाड़ी बनाएँगे भारत को खेल महाशक्ति?

राजेंद्र सजवान

कोविड 19 ने भारत में बेरोज़गारों की संख्या करोड़ों में बढ़ा दी है।  ज़ाहिर है, शिक्षित बेरोज़गारों की कतार भी लंबी हुई है। और यदि खिलाड़ियों की बात करें तो उनको राहत देने वाला कोई भी काम हमारी सरकारों ने ना तो पहले किया और कोरोना महामारी के चलते विस्फोटक हालात पैदा होने की आशंका भी बढ़ गई है। यदि यूँ कहें कि इस मोर्चे पर केंद्र और राज्यों की सरकारों ने सिर्फ़ वादाखिलाफी की है तो ग़लत नहीं होगा।

हैरानी वाली बात यह है कि एक तरफ तो सरकार भारत को खेल महाशक्ति बनाने का दम भर रही है और खेल मंत्रालय एवम् साई में बैठे खेलों के प्रकांड पंडित आगामी ओलंपिक खेलों में पदकों का अंबार लगाने की बातें कर रहे हैं तो दूसरी तरफ आलम यह है कि नौकरी नहीं मिलने के कारण खिलाड़ी और उनकी भावी पीढ़ियाँ खेल विमुख हो रही हैं। अफ़सोस इस बात का भी है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र आज़ादी के 73 साल बाद भी कोई खेल नीति नहीं बना पाया है। नतीजन खेलों का कारोबार भ्रष्ट अफ़सरशाहों, खेल संघों के अवसरवादियों और ओलंपिक संघ के गुटबाजों के भरोसे चल रहा है।

ऐसे में एक अच्छी खबर यह है कि झारखंड सरकार ने कोरोना काल के चलते प्रदेश की खेल नीति का प्रारूप तैयार कर लिया है और यदि कैबिनेट में यह नीति पास हो जाती है तो केंद्र और अन्य राज्य सरकारों के लिए इस दिशा में कदम बढ़ाना आसान हो सकता है। हालाँकि झारखंड ने कुछ राज्यों की नीतियों का अनुसरण किया है और ऐसी व्यवस्था का प्रयास किया है जिसके चलते राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों, खेल आयोजकों और खेल में रूचि रखने वालों को लाभान्वित किया जा सके।

झारखंड की प्रस्तावित खेल नीति के अनुसार जिस किसी खिलाड़ी नें तीन साल किसी खेल में प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया है उसे ग्रुप सी की नौकरी का पात्र माना जाएगा।  राष्ट्रीय स्कूली खेलों, अंतर विश्वविद्यालय और खेलो इंडिया में पदक जीतने वालों को भी प्रोत्साहन राशि देने का प्रावधान है।  इसी प्रकार के नियम कुछ अन्य राज्य सरकारों द्वारा भी बनाए गए हैं लेकिन दुर्भाग्य भारतीय खिलाड़ियों का, जिन्हें सरकारें सिर्फ़ चकमा देती हैं और नौकरी दी जाती हैं, अपने कुछ परिचितों और जेबें भरने वालों को।

1982 के दिल्ली एशियाड नें जहाँ एक ओर देश की राजधानी को अनेक अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम दिए तो सरकार ने पाँच फीसदी खेल कोटे की घोषणा कर खिलाड़ियों के सुरक्षित भविष्य पर मोहर लगाई। यही वह समय था जब माँ-बाप की सोच में बदलाव आया और उन्हें लगा कि खेलने कूदने से बच्चे खराब नहीं होते, बल्कि स्वस्थ बनते हैं और नौकरी भी पाते हैं।  सरकारी और गैर सरकारी विभागों, फौज, पुलिस, रेलवे, बैंकों, बीमा कंपनियों और तमाम बड़ी-छोटी कंपनियों में खिलाड़ियों की भर्ती की जैसे होड़ सी लग गई।  राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के हज़ारों खिलाड़ी रोज़गार पाने में सफल रहे।

लेकिन इक्कीसवीं सदी खिलाड़ियों के लिए ठीक नहीं रही। हालाँकि 2010 के कामनवेल्थ खेलों के आयोजन से उम्मीद बँधी और लगा कि फिर से खिलाड़ियों के लिए नौकरियों के दरवाजे खुलेंगे पर एसा कुछ नहीं हुआ। कामनवेल्थ खेल घोटाले नें सरकार और खेल संघों की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया। सरकारी नीतियों की विफलता के चलते देश में बेरोज़गारी बढ़ती गई।  करोड़ों शिक्षित बेरोज़गार दर दर भटक रहे हैं। केवल उन्हीं खिलाड़ियों को नौकरी मिल पा रही है जोकि एशियाड, ओलंपिक या अन्य अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के पदक विजेता हैं।  राष्ट्रीय और राज्य स्तर के खिलाड़ियों की कहीं कोई पूछ नहीं बची। अर्थात उनका खेलना बेकार गया। जीवन के दस बीस साल बर्बाद करने वाले ऐसे  खिलाड़ियों को यदि राज्य सरकारें रोज़गार प्रदान करती हैं तो खेलों के लिए माहौल बनाने में मदद मिलेगी और खेलों पर आम नागरिक और खिलाड़ी का विश्वास फिरसे कायम हो पाएगा।

(लेखक वरिष्ठ खेल पत्रकार और विश्लेषक हैं। ये उनका निजी विचार हैचिरौरी न्यूज का इससे सहमत होना आवश्यक नहीं है।आप राजेंद्र सजवान जी के लेखों को  www.sajwansports.com पर  पढ़ सकते हैं।)

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