भारत-चीन संबंधों में नई गर्मजोशी: वांग यी की यात्रा के बीच जयशंकर ने की ‘तीन पारस्परिक मूल्यों’ की वकालत

New warmth in India-China relations: Jaishankar advocates 'three mutual values' amid Wang Yi's visitचिरौरी न्यूज

नई दिल्ली: पांच साल पहले गलवान में आमने-सामने भिड़े भारत और चीन अब रिश्तों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं, ऐसे समय में जब अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन भारत के खिलाफ टैरिफ युद्ध तेज कर रहा है। इसी कड़ी में चीन के विदेश मंत्री वांग यी भारत के दौरे पर हैं और उन्होंने कल विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर से मुलाकात की। यह दौरा दोनों एशियाई शक्तियों के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जो वैश्विक अस्थिरता और अमेरिकी दबाव के बीच अपने संबंधों को नए सिरे से आकार देने की दिशा में एक प्रयास माना जा रहा है।

बैठक के दौरान डॉ जयशंकर ने कहा कि वांग यी की यह यात्रा द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा का एक अवसर प्रदान करती है। उन्होंने कहा, “हमारे संबंधों ने एक कठिन दौर देखा है, महामहिम, अब हमारे दोनों देशों को आगे बढ़ने की जरूरत है। इसके लिए दोनों पक्षों की तरफ से ईमानदार और रचनात्मक रवैये की आवश्यकता है।”

उन्होंने यह भी कहा कि इस दिशा में हमें तीन ‘म्यूचुअल्स’ – पारस्परिक सम्मान, पारस्परिक संवेदनशीलता और पारस्परिक हितों द्वारा मार्गदर्शित होना चाहिए। “विविधताओं को विवाद नहीं बनने देना चाहिए और प्रतिस्पर्धा को संघर्ष में नहीं बदलना चाहिए,” उन्होंने जोड़ा।

दोनों देशों के बीच बातचीत में आर्थिक और व्यापारिक मुद्दों के साथ-साथ तीर्थ यात्राएं, जनता के बीच संपर्क, नदी डेटा साझा करना, सीमा व्यापार, कनेक्टिविटी और द्विपक्षीय आदान-प्रदान जैसे विषयों पर चर्चा हुई। आज वांग यी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से सीमा विवाद पर बातचीत करेंगे। डॉ जयशंकर ने कहा कि यह बातचीत बेहद अहम है क्योंकि किसी भी सकारात्मक प्रगति की बुनियाद सीमावर्ती इलाकों में शांति और स्थिरता बनाए रखने की क्षमता पर टिकी है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि डी-एस्केलेशन प्रक्रिया को आगे बढ़ाना अनिवार्य है।

डॉ जयशंकर ने कहा कि जब दुनिया के दो सबसे बड़े राष्ट्र मिलते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय स्थिति पर चर्चा होना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा, “हम एक निष्पक्ष, संतुलित और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की आकांक्षा रखते हैं, जिसमें बहुध्रुवीय एशिया भी शामिल है। वर्तमान माहौल में वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्थिरता बनाए रखना और उसे आगे बढ़ाना एक प्रमुख आवश्यकता बन गई है।” उन्होंने यह भी उम्मीद जताई कि यह संवाद भारत-चीन संबंधों को एक स्थिर, सहयोगात्मक और दूरदर्शी दिशा देगा, जो दोनों देशों के हितों की पूर्ति करेगा और आपसी चिंताओं का समाधान करेगा।

सूत्रों के अनुसार, चीन ने भारत की तीन मुख्य चिंताओं – उर्वरक, रेयर अर्थ एलिमेंट्स और टनल बोरिंग मशीनों – को संबोधित करने का आश्वासन दिया है। इनमें से रेयर अर्थ एलिमेंट्स का उपयोग हाई-टेक उत्पादों जैसे स्मार्टफोन और उन्नत सैन्य उपकरणों के निर्माण में होता है, और इनका अधिकांश उत्पादन चीन में होता है, जिससे इनका रणनीतिक महत्व और भी बढ़ जाता है।

बैठक के बाद जारी चीनी बयान में वांग यी ने कहा कि दुनिया “सदी में एक बार आने वाले परिवर्तन” से गुजर रही है और वह भी तेजी से। उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका की ओर इशारा करते हुए कहा कि “एकतरफा दबाव और धमकियों” का बोलबाला है और मुक्त व्यापार एवं अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि चीन और भारत को, दुनिया के दो सबसे बड़े विकासशील देशों के तौर पर, वैश्विक चिंता और ज़िम्मेदारी की भावना दिखानी चाहिए, विकासशील देशों के लिए एक मिसाल कायम करनी चाहिए और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लोकतंत्रीकरण को बढ़ावा देना चाहिए।

वांग यी ने यह भी कहा कि कज़ान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बैठक के बाद से भारत-चीन संबंधों में “पुनरारंभ” हुआ है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों ने अपने नेताओं द्वारा प्राप्त सहमति को ईमानदारी से लागू किया है, विभिन्न स्तरों पर संवाद फिर से शुरू हुआ है, सीमावर्ती इलाकों में शांति बनी हुई है और भारतीय तीर्थयात्री एक बार फिर तिब्बत के पवित्र पर्वतों और झीलों की तीर्थयात्रा पर जा रहे हैं, जो भारत-चीन संबंधों के सहयोग की मुख्यधारा में लौटने का सकारात्मक संकेत है।

उन्होंने कहा कि भारत और चीन को आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ना चाहिए, एक-दूसरे को आधे रास्ते तक मिलना चाहिए, हस्तक्षेपों को समाप्त करना चाहिए, सहयोग का विस्तार करना चाहिए और संबंधों में सुधार की गति को और मज़बूत करना चाहिए।

भारत और चीन के बीच यह नया मेल-मिलाप ऐसे समय हो रहा है जब अमेरिका ने भारत के खिलाफ अपने टैरिफ हमले को तेज कर दिया है। वॉशिंगटन डीसी ने भारत के रूसी तेल खरीद को लेकर नाखुशी जताते हुए उसके निर्यात पर 50 प्रतिशत शुल्क लगा दिया है, जिससे कई क्षेत्रों पर असर पड़ सकता है। भारत ने इस पर कहा है कि रूसी तेल की उसकी खरीद बाजार आधारित है और 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है।

दिलचस्प बात यह है कि जहां अमेरिका ने भारत को टैरिफ से दंडित किया है, वहीं उसने चीन पर कोई द्वितीयक प्रतिबंध नहीं लगाया है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इसका कारण बताते हुए कहा कि चीन जो भी रूसी तेल खरीदता है, उसे रिफाइन करके वैश्विक बाजार में बेच देता है। “अगर आप चीन पर सेकेंडरी सैंक्शन लगा देंगे, तो उस रिफाइन्ड तेल की वैश्विक उपलब्धता कम हो जाएगी और कीमतें बढ़ जाएंगी या विकल्प ढूंढना पड़ेगा,” उन्होंने कहा।

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