‘राष्ट्रपति को भी नहीं…’: चुनाव अधिकारियों को आजीवन छूट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका
चिरौरी न्यूज
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की, जो मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को मुकदमों से आजीवन सुरक्षा प्रदान करता है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि भारत के राष्ट्रपति को भी इतनी व्यापक कानूनी छूट नहीं दी जाती।
याचिका एनजीओ लोक प्रहरी द्वारा दायर की गई है। इसमें कहा गया है कि संसद में इस कानून पर चर्चा के दौरान एक मंत्री ने स्पष्ट किया था कि यह बिल केवल सेवा शर्तों से संबंधित है। ऐसे में आपराधिक मुकदमे से छूट को सेवा शर्त के तहत नहीं माना जा सकता। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि यह कानून स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को प्रभावित कर सकता है, और सुप्रीम कोर्ट से इस प्रावधान पर तत्काल रोक लगाने का अनुरोध किया गया।
हालांकि, शीर्ष अदालत ने फिलहाल इस प्रावधान पर रोक लगाने की आवश्यकता नहीं मानते हुए कहा कि यह मामला गंभीर और महत्वपूर्ण है, जिसे आगे जांचा जाएगा।
भारत के मुख्य न्यायाधीश एन.वी. सूर्यकांत ने कहा, “यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। हम यह देखेंगे कि क्या यह प्रावधान लोकतंत्र या संविधान के सिद्धांतों के खिलाफ कोई नुकसान पहुंचा रहा है और क्या ऐसा कानून संविधान के तहत मान्य हो सकता है।”
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर उनके जवाब मांगे हैं।
जानकारी के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के दौरान मुकदमों से सुरक्षा देने वाले इस कानून में 2023 में संशोधन किया गया था, जिसके तहत उन्हें आजीवन कानूनी सुरक्षा दी गई है। यह संशोधन देश के चुनाव तंत्र और अधिकारियों की स्वतंत्रता को लेकर विवादों का विषय बना हुआ है।
