बीएमसी चुनाव: मुंबई की सत्ता में बीजेपी-शिवसेना का दबदबा, ठाकरे परिवार की पकड़ कमजोर
चिरौरी न्यूज
नई दिल्ली: मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनावों में बीजेपी–शिवसेना (शिंदे गुट) गठबंधन की ऐतिहासिक जीत ने दशकों से चली आ रही ठाकरे परिवार की पकड़ को खत्म कर दिया है। एशिया की सबसे अमीर नगर निकाय मानी जाने वाली बीएमसी में यह नतीजा महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में बीजेपी ने 2017 के अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन (82 सीटें) को पीछे छोड़ते हुए 227 वार्डों में से 89 सीटें जीत लीं। वहीं, उसकी सहयोगी शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) को 29 सीटें मिलीं। इस तरह गठबंधन का कुल आंकड़ा 118 सीटों तक पहुंच गया, जो बहुमत के आंकड़े 114 से कहीं अधिक है।
बीजेपी का वर्चस्व
बीएमसी में बीजेपी का लगभग एकतरफा दबदबा यह भी दिखाता है कि उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे शिवसेना का पारंपरिक वोट बैंक बनाए रखने में संघर्ष करते नजर आए। 2017 में चुने गए अविभाजित शिवसेना के अधिकांश पार्षद शिंदे के साथ होने के बावजूद उनकी पार्टी सिर्फ 29 सीटों पर सिमट गई।
बीएमसी नतीजों पर प्रतिक्रिया देते हुए एकनाथ शिंदे ने मीडिया से कहा कि यह फैसला “विकास के पक्ष और भ्रष्टाचार के खिलाफ जनादेश” है। उन्होंने इसे पिछले साढ़े तीन वर्षों में महायुति सरकार के कामकाज पर जनता की मुहर बताया। हालांकि, मेयर पद को लेकर पूछे गए सवाल को उन्होंने टालते हुए कहा कि “मेयर महायुति से ही होगा।”
दूसरी ओर, उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने 65 सीटें जीतकर दूसरा स्थान हासिल किया। यह 2017 की तुलना में गिरावट जरूर है, लेकिन नतीजे बताते हैं कि चिन्ह और संगठन टूटने के बावजूद ठाकरे विरासत अभी खत्म नहीं हुई है।
हिंदुत्व बनाम मराठी अस्मिता
बीएमसी चुनाव में मुख्य मुकाबला बीजेपी के हिंदुत्व एजेंडे और ठाकरे खेमे की मराठी अस्मिता की राजनीति के बीच रहा। उद्धव ठाकरे ने अपने चचेरे भाई राज ठाकरे के साथ दो दशक बाद हाथ मिलाकर “इनसाइडर–आउटसाइडर” की राजनीति को फिर से जिंदा करने की कोशिश की।
राज ठाकरे ने अपने चाचा बाल ठाकरे की पुरानी “मराठी मानूस” की राजनीति को नए सिरे से आजमाया और इस दौरान हिंदी विरोध और दक्षिण भारतीयों को लेकर विवादित बयानों का सहारा लिया। हालांकि, यह रणनीति नाकाम रही। राज ठाकरे की पार्टी को 52 में से सिर्फ 6 सीटें मिलीं।
इस गठबंधन के तीसरे सहयोगी एनसीपी (शरद पवार गुट) को महज एक सीट से संतोष करना पड़ा।
बीजेपी का पलटवार: ‘हिंदुत्व और विकास साथ-साथ’
मुख्यमंत्री फडणवीस ने ठाकरे भाइयों के “मुंबई को खतरा” वाले नैरेटिव को खारिज करते हुए कहा कि मराठी मानूस का स्वाभिमान गैर-समझौता योग्य है। नतीजों के बाद उन्होंने साफ कहा कि हिंदुत्व और विकास को अलग नहीं किया जा सकता।
बीजेपी नेता और मंत्री नितेश राणे ने इसे हिंदुत्व के पक्ष में जनादेश बताते हुए कहा, “जो हिंदू की बात करेगा, वही महाराष्ट्र पर राज करेगा।”
कांग्रेस और AIMIM की स्थिति
कांग्रेस ने इस चुनाव में अकेले उतरने का फैसला किया, लेकिन यह दांव सफल नहीं रहा। कांग्रेस को 26 सीटें, जबकि उसकी सहयोगी वंचित बहुजन आघाड़ी को 8 सीटें मिलीं। वहीं, AIMIM ने चौंकाने वाला प्रदर्शन करते हुए 2017 की 2 सीटों से बढ़कर 8 सीटें जीत लीं।
कुल मिलाकर, बीएमसी चुनाव नतीजों ने मुंबई की शहरी राजनीति का नक्शा पूरी तरह बदल दिया है। बीजेपी का उभार, शिंदे गुट की सीमित सफलता और ठाकरे परिवार की कमजोर होती पकड़ — ये सभी संकेत देते हैं कि महाराष्ट्र की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है।
