भारत और यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते से पीएम नरेंद्र मोदी ने बदला वैश्विक नैरेटिव

PM Narendra Modi has changed the global narrative with the India-European Union free trade agreementचिरौरी न्यूज

नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय व्यापार की शतरंज में भारत ने एक बार फिर साबित कर दिया कि हर चाल जल्दबाज़ी में नहीं चली जाती। जनवरी के पहले पखवाड़े तक जिस भारत को अमेरिका के साथ ट्रेड डील में “पीछे छूटता हुआ खिलाड़ी” बताया जा रहा था, वही भारत अब एक के बाद एक बड़ी आर्थिक साझेदारियों के साथ वैश्विक मंच पर मज़बूती से खड़ा दिख रहा है।

भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) का संपन्न होना इस बदले हुए परिदृश्य की सबसे बड़ी मिसाल है। इसे यूँ ही “मदर ऑफ ऑल डील्स” नहीं कहा जा रहा—यह समझौता वैश्विक GDP के करीब 25 प्रतिशत और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के एक-तिहाई हिस्से को कवर करता है।

अमेरिकी दबाव बनाम भारतीय धैर्य

कुछ ही समय पहले अमेरिका के वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लटनिक ने सार्वजनिक तौर पर भारत पर निशाना साधते हुए कहा था कि भारत ने अमेरिका के साथ ट्रेड डील का मौका गंवा दिया। विपक्षी दल कांग्रेस ने भी इस बयान को हथियार बनाकर सरकार पर तंज कसे।

लेकिन भारत की रणनीति हमेशा से स्पष्ट रही है—“बंदूक की नोक पर” समझौते नहीं। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल पहले ही साफ कर चुके थे कि भारत अपने किसानों, डेयरी सेक्टर और घरेलू उद्योगों के हितों से समझौता नहीं करेगा।

तेज़ नहीं, सही साझेदारों के साथ सौदे

भारत की हालिया ट्रेड डील्स इस सोच को रेखांकित करती हैं।

  • भारत–न्यूज़ीलैंड FTA: मार्च 2025 में दोबारा शुरू हुई बातचीत दिसंबर तक पूरी—रिकॉर्ड समय।
  • भारत–यूके समझौता: तीन साल की बातचीत के बाद 2025 में हस्ताक्षर, जिससे 99% भारतीय निर्यात को ड्यूटी-फ्री एक्सेस मिला।
  • भारत–EFTA समझौता: 15 साल में 100 अरब डॉलर निवेश और 10 लाख नौकरियों का वादा।
  • भारत–ओमान CEPA: भारतीय कृषि और औद्योगिक उत्पादों को लगभग पूरी तरह ज़ीरो ड्यूटी एक्सेस।

इन सबके बीच, EU के साथ 20 साल लंबी बातचीत के बाद डील का फाइनल होना इस बात का संकेत है कि भारत ने जल्दबाज़ी नहीं, बल्कि स्थायित्व को चुना।

ट्रंप फैक्टर या रणनीतिक मजबूरी?

कुछ अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति और यूरोप के साथ उनके टकराव ने EU को भारत के करीब आने पर मजबूर किया। हालांकि भारत इस क्रेडिट को किसी और को देने के मूड में नहीं दिखता।

EU आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने नई दिल्ली में कहा,
“हमने दो अरब लोगों के लिए एक साझा मुक्त व्यापार क्षेत्र बनाया है। यह सिर्फ शुरुआत है।”

निष्कर्ष: भारत की शर्तों पर वैश्वीकरण

जहाँ एक ओर अमेरिका के साथ बातचीत अब भी अधर में है, वहीं भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह दबाव में नहीं, बल्कि संतुलन में फैसले करता है। क्रिकेट की भाषा में कहें तो भारत ने आख़िरी ओवर तक इंतज़ार किया—और मैच पलट दिया।

वैश्विक व्यापार में भारत अब सिर्फ़ बाज़ार नहीं, बल्कि शर्तें तय करने वाला खिलाड़ी बनता दिख रहा है।

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