टोक्यो से थार: जब ‘मायूमी’ बनीं राजस्थानी मधु,जापान में कालबेलिया, घूमर और चरी नृत्य की धूम

From Tokyo to the Thar: When ‘Mayumi’ Became the Rajasthani ‘Madhu’—Kalbelia, Ghoomar, and Chari Dances Create a Sensation in Japanचिरौरी न्यूज

जयपुर: राजस्थान पर्यटन केवल किलों, महलों और रेगिस्तानी दृश्यों का आकर्षण नहीं है। यह उस जीवंत लोकसंस्कृति का वैश्विक प्रसार है, जो संगीत, नृत्य, वेशभूषा और उत्सवों के माध्यम से दुनिया भर के लोगों के हृदय तक पहुँचती है। यही सांस्कृतिक शक्ति है, जो सात समंदर पार किसी अनजान व्यक्ति के जीवन की दिशा बदल देती है। कभी यह प्रभाव इतना गहरा होता है कि व्यक्ति अपनी पहचान तक बदल ले सिर्फ इसलिए कि उसके भीतर मरुधरा की धड़कन बस चुकी होती है। इसे राजस्थान की लोकसंस्कृति का जादू कहें या भारतीय सिनेमा का प्रभाव , जापान की मायूमी, जिन्हें आज दुनिया राजस्थानी मधु के नाम से जानती है, इसकी जीवंत मिसाल हैं। उनके इस समर्पण को समय-समय पर राजस्थान पर्यटन विभाग भी अपने मेलों और उत्सवों में आमंत्रित कर सम्मानित करता रहा है।

जयपुर में गणगौर की सवारी के बीच, रंग-बिरंगे लहरियों और लोकधुनों के बीच खड़ी मधु की आँखों में वही चमक थी, जो वर्षों पहले टोक्यो के एक सिनेमा हॉल में पहली बार राजस्थान की झलक देखकर आई थी। वे बताती हैं कि एक बॉलीवुड फिल्म ने उनके भीतर ऐसा आकर्षण जगाया कि राजस्थान उनके दिल-दिमाग में बस गया। वे ऋतिक रोशन और आलिया भट्ट की बड़ी प्रशंसक हैं, और मानती हैं कि सिनेमा ने ही उन्हें उस संस्कृति तक पहुँचाया, जिसे आज वे जी रही हैं।

साल 2009 में भारत की पहली यात्रा ने उनके जीवन की दिशा तय कर दी। लोकनृत्य सीखने की जिज्ञासा उन्हें राजस्थान के कलाकारों के बीच ले आई। यहीं उन्होंने कालबेलिया, घूमर और चरी जैसे नृत्यों की साधना शुरू की। मांगणियार धुनों की आत्मीयता और गुरुजनों की सीख ने उन्हें यह समझाया कि यह नृत्य केवल देह की गति नहीं, आत्मा की अभिव्यक्ति है।

वे स्वयं को आशा सपेरा की शिष्या मानती हैं और लोकगायन की बारीकियाँ उस्ताद अनवर खान मंगनियार से सीखने का सौभाग्य बताती हैं। जैसलमेर में बिताए दिनों ने उनके भीतर की ‘मायूमी’ को धीरे-धीरे ‘मधु’ में बदल दिया।

आज टोक्यो में वे एक ब्यूटी सैलून में का संचालन करती है लेकिन लेकिन शाम ढलते ही उनका संसार बदल जाता है। सप्ताह में तीन-चार दिन वे जापानी विद्यार्थियों को राजस्थानी नृत्य सिखाती हैं। रंगीन ओढ़नियाँ, पायल की झंकार और लोकधुनों की लय, टोक्यो के एक छोटे से स्टूडियो में राजस्थान सजीव हो उठता है।

मधु स्वीकार करती हैं कि जापान में राजस्थानी लोकनृत्य के लिए दर्शक जुटाना चुनौतीपूर्ण है। कई बार उन्हें बहुत कम लोगों के सामने भी प्रस्तुति देनी पड़ती है। फिर भी सोशल मीडिया पर उनके फॉलोअर्स और छात्र उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देते रहते हैं।

उनका राजस्थान से लगाव इतना गहरा है कि वे इसे अपना “दूसरा घर” कहती हैं। उनके इसी समर्पण को देखते हुए राजस्थान पर्यटन विभाग समय-समय पर उन्हें राज्य के मेलों और उत्सवों में आमंत्रित करता है, जहाँ वे विदेशी होते हुए भी स्थानीय रंग में पूरी तरह घुली दिखाई देती हैं।

‘मायूमी’ से ‘राजस्थानी मधु’ बनने की यह यात्रा केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि संस्कृति के प्रति समर्पण की कहानी है। यह बताती है कि जब लोकसंगीत हृदय को छू ले, तो सीमाएँ अर्थहीन हो जाती हैं और इंसान वहीं का हो जाता है, जहाँ उसकी आत्मा को घर मिल जाता है।

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