सार्वजनिक ज़मीन पर नमाज़ पढ़ना अधिकार नहीं: इलाहाबाद उच्च न्यायालय

चिरौरी न्यूज
नई दिल्ली: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक ज़मीन का उपयोग नमाज़ पढ़ने या बड़े पैमाने पर धार्मिक सभाएँ आयोजित करने के लिए मौलिक अधिकार के रूप में नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता का संवैधानिक अधिकार पूर्ण नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और अन्य नागरिकों के अधिकारों के अधीन रहता है।
यह टिप्पणी अदालत ने उत्तर प्रदेश के संभल ज़िले के इकोना गाँव में स्थित एक ज़मीन पर नमाज़ पढ़ने की अनुमति से जुड़ी याचिका को खारिज करते हुए की। जस्टिस गरिमा प्रसाद और जस्टिस सरल श्रीवास्तव की डिवीज़न बेंच ने असीन नामक व्यक्ति द्वारा दायर याचिका को निरस्त कर दिया।
याचिकाकर्ता असीन का दावा था कि संबंधित ज़मीन उसकी निजी संपत्ति है, जिसे उसने 16 जून 2023 की एक पंजीकृत ‘गिफ्ट डीड’ (दान पत्र) के माध्यम से प्राप्त किया है। उसका कहना था कि इसके बावजूद उसे नमाज़ पढ़ने से अवैध रूप से रोका जा रहा है और यह उसके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। उसने यह भी तर्क दिया कि निजी संपत्ति पर नमाज़ पढ़ने के लिए पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं होती।
वहीं, उत्तर प्रदेश सरकार ने इस दावे का विरोध करते हुए अदालत को बताया कि राजस्व अभिलेखों में यह भूमि “आबादी ज़मीन” के रूप में दर्ज है, जो सार्वजनिक उपयोग के लिए होती है। सरकार के अनुसार, याचिकाकर्ता अपने स्वामित्व का ठोस प्रमाण प्रस्तुत करने में विफल रहा। साथ ही, प्रस्तुत ‘गिफ्ट डीड’ में ज़मीन की स्पष्ट पहचान और सीमाओं से जुड़ी आवश्यक जानकारी का अभाव था, जिससे उसका दावा कमजोर पड़ता है।
राज्य सरकार ने यह भी बताया कि उस स्थान पर पारंपरिक रूप से केवल ईद के अवसर पर ही नमाज़ अदा की जाती रही है और इस पर कभी कोई रोक नहीं लगाई गई। हालांकि, सरकार का आरोप था कि याचिकाकर्ता नियमित रूप से बड़ी संख्या में लोगों को एकत्र कर सामूहिक नमाज़ शुरू करने का प्रयास कर रहा था, जिससे स्थानीय सामाजिक संतुलन और शांति प्रभावित हो सकती थी।
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि यद्यपि संविधान नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है, लेकिन यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता के अधीन है। बेंच ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक ज़मीन का उद्देश्य आम लोगों के उपयोग के लिए होता है और इसे बार-बार होने वाली ऐसी धार्मिक गतिविधियों के लिए प्रयोग नहीं किया जा सकता, जिनसे आवागमन या नागरिक व्यवस्था बाधित हो।
साथ ही, अदालत ने निजी पूजा और संगठित धार्मिक आयोजनों के बीच अंतर को भी रेखांकित किया। अदालत के अनुसार, घर या सीमित निजी स्थान पर की जाने वाली पूजा संरक्षित होती है, लेकिन जब यही गतिविधि बड़े स्तर पर आयोजित की जाती है और उसमें अधिक लोग शामिल होते हैं, तो उसका स्वरूप सार्वजनिक हो जाता है। ऐसी स्थिति में राज्य को उसे विनियमित करने का अधिकार प्राप्त है।
बेंच ने यह भी कहा कि प्रशासन को किसी वास्तविक अशांति का इंतज़ार करने की आवश्यकता नहीं है। यदि किसी गतिविधि से सार्वजनिक व्यवस्था या सांप्रदायिक सौहार्द प्रभावित होने की आशंका हो, तो अधिकारी निवारक कार्रवाई कर सकते हैं।
चूंकि याचिकाकर्ता संबंधित भूमि पर अपना वैध स्वामित्व सिद्ध नहीं कर सका और वह भूमि रिकॉर्ड में सार्वजनिक श्रेणी में ही बनी रही, इसलिए अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया।
