बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या ने कर्नाटक सरकार की 600 करोड़ रुपये की अल्पसंख्यक कॉलोनी योजना की आलोचना की

चिरौरी न्यूज

नई दिल्ली: बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या ने कर्नाटक सरकार द्वारा “अल्पसंख्यक कॉलोनियों” के विकास के लिए 600 करोड़ रुपये आवंटित करने के फैसले पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने इस निर्णय की संवैधानिक वैधता और इसके व्यापक सामाजिक प्रभावों पर सवाल उठाए हैं।

तेजस्वी सूर्या ने कहा कि सार्वजनिक धन का आवंटन धार्मिक पहचान के आधार पर नहीं होना चाहिए। उन्होंने राज्य सरकार से पूछा कि आखिर किस संवैधानिक प्रावधान के तहत “अल्पसंख्यक कॉलोनियों” के लिए विशेष रूप से धन निर्धारित किया जा रहा है, जबकि विकास कार्यों का आधार आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों को होना चाहिए, न कि धर्म।

उन्होंने इस अवधारणा पर भी आपत्ति जताते हुए कहा कि व्यक्ति किसी धर्म से जुड़ा हो सकता है, लेकिन सड़क, नाली और मोहल्लों जैसी सार्वजनिक सुविधाओं को धार्मिक पहचान देना पूरी तरह अनुचित है। उनके अनुसार, इस तरह का वर्गीकरण न केवल तर्कहीन है बल्कि समाज में विभाजन को भी बढ़ावा दे सकता है।

बीजेपी सांसद ने यह भी सवाल उठाया कि सरकार किस आधार पर किसी क्षेत्र को “अल्पसंख्यक कॉलोनी” घोषित कर रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह की नीति सामाजिक समावेशन के बजाय अलगाव (गेट्टोकरण) को बढ़ावा दे सकती है।

तेजस्वी सूर्या ने अपने तर्कों को संवैधानिक दायरे में रखते हुए अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 15 का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि कानून के समक्ष समानता और भेदभाव-निषेध के सिद्धांतों के साथ धर्म-आधारित वित्तीय पैकेज कैसे मेल खाता है, यह स्पष्ट किया जाना चाहिए।

उन्होंने यह भी चिंता जताई कि यदि उद्देश्य केवल विकास है, तो फिर उन अन्य पिछड़े इलाकों को समान लाभ क्यों नहीं मिलेगा, जहां हिंदू, दलित, अनुसूचित जाति/जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अन्य समुदायों के लोग रहते हैं।

सूर्या ने कहा कि “अल्पसंख्यक” और “बहुसंख्यक” क्षेत्रों के बीच आधिकारिक विभाजन से संस्थागत अलगाव को बढ़ावा मिल सकता है। उन्होंने सवाल उठाया कि विकास के लिए धर्म को आधार बनाना क्यों जरूरी है और इसे अतीत की विभाजनकारी सोच, जैसे “दो-राष्ट्र सिद्धांत”, से जोड़कर देखा।

इस बीच, कर्नाटक कैबिनेट ने गुरुवार को 2026–2028 की अवधि के लिए इस 600 करोड़ रुपये के विशेष विकास पैकेज को मंजूरी दी है। यह योजना बेंगलुरु समेत 11 नगर निगम क्षेत्रों में लागू की जाएगी और मुख्यमंत्री के विशेष पैकेज के तहत चलाई जाएगी।

सरकारी अधिकारियों का कहना है कि इस योजना का उद्देश्य पिछड़े इलाकों में बुनियादी ढांचे और जीवन स्तर में सुधार करना है, हालांकि आलोचकों का कहना है कि चयन के मानदंड अब भी विवादित हैं।

इसके साथ ही राज्य सरकार ने अपनी आबकारी नीति में सुधार के लिए एक मसौदा भी पेश किया है, जिसमें सार्वजनिक स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान देने की बात कही गई है। प्रस्तावित नीति में शराब की कीमतों को उसके सामाजिक प्रभाव—जैसे दुर्घटनाएं, घरेलू हिंसा और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं—के आधार पर तय करने की बात शामिल है।

मुख्यमंत्री कार्यालय के अनुसार, जहां राज्य को शराब से सालाना लगभग 34,600 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होता है, वहीं इससे जुड़े सामाजिक खर्च का अनुमान करीब 51,000 करोड़ रुपये है। नई नीति में अल्कोहल की ताकत के आधार पर कर प्रणाली, सप्लाई चेन की क्यूआर कोड के जरिए निगरानी, डिजिटल लाइसेंसिंग को सरल बनाना और स्कूलों व अस्पतालों के पास शराब की दुकानों के लिए सख्त नियम जैसे प्रावधान शामिल किए गए हैं।

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