धर्मेंद्र प्रधान की विदाई: क्यों बीजेपी ने आखिरकार किया रणनीतिक समझौता?
चिरौरी न्यूज
नई दिल्ली: राजनीति में कई बार फैसले भावनाओं से नहीं, बल्कि भविष्य की रणनीति को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भी ऐसे ही एक राजनीतिक निर्णय के रूप में देखा जा रहा है। लंबे समय तक सरकार ने उनका बचाव किया, लेकिन आखिरकार बढ़ते जनदबाव और संसद के मानसून सत्र के बीच उन्हें पद छोड़ना पड़ा।
शिक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल
बीते कुछ महीनों में NEET-UG पेपर लीक और CBSE की ऑनलाइन मूल्यांकन (मार्किंग) प्रणाली में गड़बड़ियों ने देश की शिक्षा व्यवस्था की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। लाखों छात्र और अभिभावक सड़कों पर उतर आए, लेकिन शुरुआती दौर में सरकार और सत्तारूढ़ बीजेपी की ओर से न तो कोई ठोस कार्रवाई दिखाई दी और न ही प्रभावी संवाद। इस चुप्पी ने छात्रों के गुस्से को और बढ़ा दिया।
जंतर-मंतर से राष्ट्रीय आंदोलन तक
शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन धीरे-धीरे राष्ट्रीय आंदोलन का रूप लेने लगा। सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के आमरण अनशन ने आंदोलन को नई ऊर्जा दी। हालांकि शुरुआती दौर में यह आंदोलन सीमित दिखाई दे रहा था, लेकिन प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई और बल प्रयोग ने इसे देशव्यापी बहस का विषय बना दिया।
हजारों छात्रों और युवाओं की मौजूदगी में हुई कार्रवाई ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया और विपक्ष को बड़ा राजनीतिक मुद्दा मिल गया।
मानसून सत्र शुरू होते ही विपक्ष ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी सहित कई नेताओं ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर संसद से लेकर सड़कों तक विरोध प्रदर्शन किया। संसद का पहला सप्ताह लगभग पूरी तरह हंगामे की भेंट चढ़ गया।
सरकार समझ चुकी थी कि जब तक यह विवाद खत्म नहीं होगा, तब तक उसका विधायी एजेंडा आगे नहीं बढ़ पाएगा।
क्यों बचाती रही बीजेपी?
बीजेपी शुरुआत में धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इसलिए नहीं चाहती थी क्योंकि इससे भविष्य में किसी भी जनदबाव के आगे मंत्री हटाने की परंपरा बन सकती थी। पार्टी नेतृत्व यह संदेश नहीं देना चाहता था कि विरोध प्रदर्शन के दबाव में सरकार झुक जाती है।
लेकिन समय बीतने के साथ हालात बदलते गए। जितनी देर सरकार ने फैसला टाला, उतनी ही उसकी छवि एक कठोर और असंवेदनशील सरकार के रूप में बनने लगी।
सूत्रों के अनुसार, सरकार की प्राथमिकता केवल एक मंत्री को बचाना नहीं थी, बल्कि संसद में अपने बड़े राजनीतिक और विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाना था। माना जा रहा है कि आगामी दिनों में सरकार परिसीमन (Delimitation) विधेयक सहित कई महत्वपूर्ण विधेयकों को आगे बढ़ाने की तैयारी में है।
ऐसे में लगातार जारी छात्र आंदोलन और विपक्ष के हमलों के बीच सरकार के लिए संसद चलाना मुश्किल हो रहा था। इसलिए राजनीतिक नुकसान को सीमित करने के लिए धर्मेंद्र प्रधान की विदाई को रणनीतिक कदम माना जा रहा है।
राजनीतिक गणित भी बदला
हाल के महीनों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की संसदीय ताकत बढ़ी है। विभिन्न दलों के नेताओं के समर्थन और राजनीतिक पुनर्संरचना के बाद सरकार को महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने की नई उम्मीद मिली है। ऐसे में सरकार किसी भी ऐसे विवाद से बचना चाहती थी जो उसके बड़े एजेंडे में बाधा बने।
बीजेपी पहले भी बड़े आंदोलनों के दौरान रणनीतिक रूप से पीछे हट चुकी है। तीन कृषि कानूनों की वापसी इसका प्रमुख उदाहरण है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भी उसी तरह का एक सामरिक निर्णय है, जिसमें सरकार ने तत्काल राजनीतिक नुकसान स्वीकार कर भविष्य के बड़े लक्ष्य सुरक्षित रखने की कोशिश की है।
सबसे बड़ा सवाल
पूरे घटनाक्रम के बाद सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि यदि अंततः धर्मेंद्र प्रधान को हटाना ही था, तो सरकार ने यह फैसला पहले क्यों नहीं लिया? क्या शुरुआती स्तर पर कार्रवाई से आंदोलन को इतना बड़ा बनने से रोका जा सकता था?
राजनीति में समय पर लिया गया निर्णय कई बार सबसे बड़ी जीत साबित होता है। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर दिखाया कि सत्ता में केवल दृढ़ता ही नहीं, बल्कि सही समय पर लचीलापन दिखाना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।
