तमिलनाडु की दो-भाषा नीति पर अड़ियल रुख, नवोदय स्कूलों को जमीन देने से इनकार
चिरौरी न्यूज
चेन्नई: तमिलनाडु ने अपनी दो-भाषा नीति पर अपना रुख कायम रखते हुए जवाहर नवोदय विद्यालयों की स्थापना के लिए जमीन उपलब्ध कराने से इनकार कर दिया है। यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की उन मौखिक टिप्पणियों के एक दिन बाद आया है, जिसमें अदालत ने राज्य से हिंदी को लेकर अपना “नजरिया बदलने” को कहा था और कहा था कि तमिलनाडु यह रुख नहीं अपना सकता कि उसकी धरती पर हिंदी नहीं पढ़ाई जाएगी।
राज्य के स्कूल शिक्षा मंत्री और टीवीके नेता राजमोहन अरुमुगम ने कहा कि सरकार तमिलनाडु की दो-भाषा नीति पर कायम रहेगी और नवोदय विद्यालयों के लिए जमीन उपलब्ध नहीं कराएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार हिंदी या किसी अन्य भाषा के खिलाफ नहीं है, बल्कि तमिल भाषा और राज्य की भाषाई पहचान की रक्षा करना चाहती है।
मंत्री ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां सुनवाई के दौरान की गई मौखिक टिप्पणियां थीं, अंतिम फैसला नहीं। उनका कहना है कि मामले में राज्य की नीति और उसके अधिकारों से जुड़े व्यापक सवाल अभी भी विचाराधीन हैं।
नवोदय विद्यालय क्यों बना विवाद का केंद्र?
जवाहर नवोदय विद्यालय केंद्र सरकार द्वारा वित्तपोषित आवासीय विद्यालय हैं, जिनका संचालन नवोदय विद्यालय समिति करती है। इन स्कूलों का उद्देश्य विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है।
नवोदय विद्यालयों की भाषा व्यवस्था तीन-भाषा फॉर्मूले पर आधारित है, जिसमें हिंदी की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसी बिंदु को लेकर तमिलनाडु में लंबे समय से विरोध रहा है। राज्य का कहना है कि वह अपनी शिक्षा और भाषा नीति के तहत दो-भाषा व्यवस्था का पालन करता है और उसे ऐसी केंद्रीय योजना को लागू करने में सहयोग करने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए, जिसकी भाषा व्यवस्था उसकी नीति से अलग है।
इस विवाद का तत्काल मुद्दा सिर्फ भाषा नहीं, बल्कि जमीन उपलब्ध कराने का सवाल भी है। केंद्र ने तमिलनाडु से प्रत्येक जिले में उपयुक्त जमीन उपलब्ध कराने को कहा है, जबकि स्कूलों की स्थापना का खर्च केंद्र द्वारा उठाया जाना है।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान तमिलनाडु के नवोदय विद्यालयों के विरोध और हिंदी को लेकर उसके रुख पर सवाल उठाए गए। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने राज्य से अपना “माइंडसेट बदलने” की बात कही और यह टिप्पणी की कि तमिलनाडु यह नहीं कह सकता कि उसकी धरती पर हिंदी नहीं पढ़ाई जाएगी।
अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि राज्य अतिरिक्त स्कूलों की स्थापना का विरोध क्यों कर रहा है, जबकि नवोदय विद्यालय छात्रों को शिक्षा का एक और अवसर दे सकते हैं। अदालत ने यह संकेत भी दिया कि इन स्कूलों की स्थापना से राज्य के मौजूदा स्कूलों को बंद या उनकी व्यवस्था को बदलने की आवश्यकता नहीं होगी।
हालांकि, सुनवाई के दौरान की गई इन टिप्पणियों को अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। अदालत ने केंद्र और तमिलनाडु को आपसी बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने और सहकारी संघवाद की भावना से आगे बढ़ने की सलाह भी दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु को पहले दिए गए निर्देशों का पालन करने के लिए तीन महीने का अतिरिक्त समय दिया है। इस दौरान राज्य को प्रत्येक जिले में उपयुक्त जमीन की पहचान करने के मुद्दे पर आगे कदम उठाना है।
यूं बनी राजनीतिक एकजुटता
नवोदय विद्यालय और दो-भाषा नीति के मुद्दे पर तमिलनाडु की राजनीति में एक असामान्य स्थिति देखने को मिली है। सत्तारूढ़ टीवीके और विपक्षी डीएमके के बीच कई मुद्दों पर तीखी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता रही है, लेकिन इस मामले में दोनों पक्ष राज्य की दो-भाषा नीति के समर्थन में दिखाई दे रहे हैं।
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन ने सरकार के रुख का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु को नवोदय विद्यालयों की जरूरत नहीं है, क्योंकि राज्य पहले से ही मॉडल और आवासीय स्कूलों के जरिए वंचित वर्गों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध करा रहा है।
उदयनिधि ने सरकार से सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष मजबूती से रखने की अपील की है। उन्होंने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर तमिलनाडु विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर केंद्रीय प्रायोजित नवोदय विद्यालयों की स्थापना के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया जा सकता है।
हिंदी का विरोध या थोपे जाने का विरोध?
उदयनिधि स्टालिन ने भी यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि तमिलनाडु किसी भाषा, जिसमें हिंदी भी शामिल है, का विरोध नहीं करता। उनका जोर इस बात पर है कि राज्य अपनी भाषाई विशिष्टता और दो-भाषा नीति को बनाए रखना चाहता है।
इस तरह विवाद का केंद्र केवल हिंदी नहीं, बल्कि यह व्यापक सवाल बन गया है कि केंद्र की शिक्षा योजनाओं और राज्य की अपनी भाषा एवं शिक्षा नीति के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद गेंद तमिलनाडु सरकार के पाले में है। आने वाले तीन महीने में राज्य को जमीन उपलब्ध कराने के निर्देश पर अपना अगला कदम तय करना होगा। वहीं, इस मामले ने एक बार फिर तमिलनाडु की दो-भाषा नीति, हिंदी के सवाल और केंद्र-राज्य संबंधों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।
