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क्या SC/ST कानून समाज को बाँट रहा है?

Is the SC/ST Act dividing society?रीना एन सिंह, आधिवक्ता सुप्रीम कोर्ट

  • “न्याय का वास्तविक उद्देश्य केवल पीड़ित को संरक्षण देना नहीं, बल्कि न्याय की प्रक्रिया में किसी निर्दोष के साथ अन्याय न होने देना भी है”

भारतीय संविधान का उद्देश्य  समानता, स्वतंत्रता, न्याय और मानवीय गरिमा को बरकरार रखना  है। संविधान ने सदियों से सामाजिक भेदभाव और जातिगत उत्पीड़न झेलने वाले अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति समुदायों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए विशेष प्रावधान किए हैं। इसी उद्देश्य से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 अस्तित्व में आया। इस कानून का मूल उद्देश्य जाति-आधारित अत्याचारों को रोकना, पीड़ितों को न्याय दिलाना और समाज में समानता स्थापित करना था। लेकिन किसी भी कानून की सफलता केवल उसकी कठोरता से नहीं, बल्कि उसके निष्पक्ष, पारदर्शी और प्रभावी ढंग से लागू करने से निर्धारित होती है।

इसलिए यह प्रश्न विचारणीय है कि सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने वाले कानून के पालन  में पीड़ितों के संरक्षण के साथ-साथ आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए। क्यूंकि कानून की कठोरता तभी सार्थक है, जब उसका प्रयोग न्याय के लिए हो, किसी के उत्पीड़न के लिए नहीं।वर्ष २०१८ मे माननीय  सर्वोच्च न्यायालय ने डॉ. सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में कुछ महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए, न्यायालय ने संबंधित परिस्थितियों में गिरफ्तारी से पहले सक्षम अधिकारी की अनुमति, शिकायत की प्रारंभिक जाँच तथा अग्रिम जमानत के संबंध में न्यायिक विचार की गुंजाइश पर चर्चा की।

इन निर्देशों का उद्देश्य निर्दोष की  अनुचित गिरफ्तारी और कानूनी प्रक्रिया के संभावित दुरुपयोग से बचाने के उपाय तलाशना था। हालाँकि, इस निर्णय के बाद व्यापक बहस हुई , केंद्र सरकार ने पुनर्विचार याचिका दायर की और माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष  2019 को संबंधित निर्देश वापस ले लिए। इससे पहले संसद ने 2018 में अधिनियम में धारा 18A जोड़कर स्पष्ट किया था कि इस कानून के अंतर्गत  प्राथमिकी दर्ज करने के लिए प्रारंभिक जाँच आवश्यक नहीं होगी और गिरफ्तारी के लिए किसी की पूर्व अनुमति अनिवार्य नहीं होगी। इसके बाद प्रथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ मामले में वर्ष 2020 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 के संशोधन की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा।

माननीय न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि जहाँ प्रथम दृष्टया अत्याचार का मामला नहीं बनता, वहाँ अदालतें उचित मामलों में कानूनी राहत पर विचार कर सकती हैं। इसलिए 2018 के दिशा-निर्देशों को आज लागू सामान्य नियम के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा। वर्तमान कानूनी स्थिति का आकलन अधिनियम के लागू प्रावधानों और बाद के न्यायिक निर्णयों के आधार पर ही किया जाना चाहिए। हालाँकि किसी भी आपराधिक कानून के अंतर्गत दुर्भावनापूर्ण शिकायत या झूठे आरोप की संभावना को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। SC/ST अधिनियम के संदर्भ में भी ऐसे आरोपों और न्यायिक टिप्पणियों पर चर्चा होती रही है। माननिये सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 के निर्णय में निर्दोष व्यक्तियों को झूठे आरोपों में फँसाए जाने की आशंका पर विचार किया था। साथ ही, न्यायालय ने अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के विरुद्ध जारी सामाजिक भेदभाव और अत्याचारों की वास्तविकता को भी रेखांकित किया।

वर्तमान मे स्वर्ण समाज के नागरिकों को SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम के कथित दुरुपयोग, झूठे आरोपों और अनावश्यक कानूनी उत्पीड़न से बचाने के लिए व्यापक कानूनी एवं विधायी सुधारों की आवश्यकता है, परन्तु दुर्भाग्यवश कोई नेता कोई सरकार इस विषय पर बात नहीं करती, जबकि केंद्र सरकार को कानून के निष्पक्ष क्रियान्वयन, साक्ष्य-आधारित जाँच, समयबद्ध न्यायिक प्रक्रिया तथा जानबूझकर झूठी शिकायत या गढ़े हुए साक्ष्य के मामलों में कानून के अनुसार जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कदम उठाने चाहिए।

जिन मामलों में प्रथमदृष्टया अपराध नहीं बनता, उनमें निर्दोष व्यक्तियों को तुरंत उचित न्यायिक राहत मिलनी चाहिए तथा गिरफ्तारी और जमानत संबंधी प्रावधानों का पालन संविधान एवं लागू कानून के अनुरूप  तेजी से होना  चाहिए, साथ ही, स्वर्ण समाज के गरीब जरूरतमंद परिवारों के लिए स्वर्ण आयोग और स्वर्ण कानूनी सहायता मंच स्थापित किए जाएँ तथा  सरकार के समक्ष ठोस प्रमाणों पर आधारित संशोधन प्रस्ताव रखे जाएँ, ताकि वास्तविक पीड़ितों को संरक्षण मिले, निर्दोष नागरिकों का उत्पीड़न रुके और सामाजिक न्याय के साथ संवैधानिक समानता एवं निष्पक्ष न्याय भी सुनिश्चित हो।

कानून के संभावित दुरुपयोग पर चर्चा आँकड़ों, जाँच के परिणामों और न्यायालयों के निर्णयों के आधार पर होनी चाहिए, न कि किसी पूरे समुदाय या सभी शिकायतकर्ताओं के बारे में सामान्य निष्कर्ष निकालकर। समाज में अनेक बार पड़ोस, संपत्ति, व्यापार, कार्यस्थल, पारिवारिक विवाद अथवा व्यक्तिगत मतभेदों को लेकर कहासुनी होती है, यदि ऐसे विवाद में अनुसूचित जाति या जनजाति से संबंधित व्यक्ति शामिल हो, तो यह देखना आवश्यक है कि क्या शिकायत में अधिनियम के अंतर्गत किसी विशिष्ट अपराध के आवश्यक कानूनी तत्व मौजूद हैं।हर विवाद अपने आप जातिगत अत्याचार नहीं बन जाता; उसी प्रकार, हर शिकायत को सामान्य विवाद बताकर खारिज भी नहीं किया जा सकता।

आरोपों की प्रकृति, कथित कृत्य, आवश्यक कानूनी शर्तों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष निर्णय होना चाहिए।कानून का उद्देश्य जातिगत उत्पीड़न को रोकना है, न कि किसी वास्तविक अपराध को केवल व्यक्तिगत विवाद का नाम देकर उससे बच निकलने का अवसर देना। दूसरी ओर, किसी व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर सामाजिक रूप से दोषी ठहरा देना भी न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।

अब आवश्यकता ऐसी व्यवस्था की है जिसमें पीड़ित को न्याय पाने के लिए संघर्ष न करना पड़े, निर्दोष व्यक्ति को अनावश्यक कानूनी उत्पीड़न का सामना न करना पड़े और कानून का प्रत्येक प्रयोग जवाबदेही तथा निष्पक्षता की कसौटी पर खरा उतरे ताकि समाज बंटे नहीं बल्कि एकजुट रहे।

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