NEET आंदोलन के बाद अब आरक्षण पर नई बहस, सोशल मीडिया पर तेज हुआ ‘Reservation Hatao’ अभियान
चिरौरी न्यूज
नई दिल्ली: NEET-UG पेपर लीक को लेकर हुए देशव्यापी छात्र आंदोलन के शांत पड़ने के बाद अब सोशल मीडिया पर आरक्षण व्यवस्था को लेकर नई बहस तेज हो गई है। एक ओर जहां शिक्षा व्यवस्था में सुधार और परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता की मांग उठ रही थी, वहीं अब जाति आधारित आरक्षण को समाप्त करने या उसमें बड़े बदलाव की मांग करने वाले अभियान ने जोर पकड़ लिया है।
सोशल मीडिया पर ‘Reservation Hatao Andolan (RHA)’ नाम से चल रहा अभियान तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। इस अभियान से जुड़े इंस्टाग्राम पेज ने कुछ ही दिनों में लाखों फॉलोअर्स जुटा लिए हैं। अभियान से जुड़े लोग जाति आधारित आरक्षण की जगह आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करने, सरकारी दस्तावेजों से जातीय पहचान हटाने और “वन नेशन, वन आइडेंटिटी” जैसी व्यवस्था की मांग कर रहे हैं।
NEET आंदोलन के दौरान तेज हुई बहस
NEET पेपर लीक के विरोध में छात्रों का आंदोलन मुख्य रूप से परीक्षा में कथित गड़बड़ियों और पेपर लीक के खिलाफ था। लेकिन आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया पर आरक्षण व्यवस्था को लेकर भी तीखी बहस शुरू हो गई।
कुछ लोगों का दावा था कि पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले अधिकांश छात्र सामान्य वर्ग से थे और प्रतियोगी परीक्षाओं में आरक्षण के कारण सामान्य वर्ग के छात्रों पर अधिक दबाव पड़ता है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
NEET आंदोलन के दौरान कई दक्षिणपंथी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने सामान्य वर्ग के छात्रों से आरक्षण के मुद्दे को प्रमुखता से उठाने की अपील की। उनका तर्क था कि कम कटऑफ और आरक्षित सीटों के कारण सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए प्रतियोगिता और कठिन हो जाती है।
वहीं, कुछ सोशल मीडिया हैंडल्स ने आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करने की मांग तेज कर दी। कई पोस्ट और वीडियो वायरल हुए, जिनमें जाति आधारित आरक्षण की समीक्षा की मांग की गई।
आनंद रंगनाथन ने दिया नया सुझाव
लेखक आनंद रंगनाथन ने आरक्षण पूरी तरह खत्म करने के बजाय उसमें सुधार की बात कही। उन्होंने कहा कि आरक्षण का लाभ एक ही परिवार को केवल एक पीढ़ी तक मिलना चाहिए।
उनका तर्क था कि यदि एक ही परिवार लगातार कई पीढ़ियों तक आरक्षण का लाभ लेता रहेगा, तो उसी समुदाय के आर्थिक रूप से कमजोर अन्य परिवारों तक इसका लाभ नहीं पहुंच पाएगा।
आरक्षण का मुद्दा टेलीविजन बहसों में भी प्रमुखता से उठा। एक निजी चैनल की बहस में NEET अभ्यर्थी हर्ष दुबे ने सामान्य वर्ग के छात्रों की कठिनाइयों का मुद्दा उठाते हुए कटऑफ, राज्य कोटा और विभिन्न श्रेणियों के लिए अलग-अलग प्रवेश मानकों पर सवाल खड़े किए। उनका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ और आरक्षण बनाम मेरिट की बहस फिर से चर्चा में आ गई।
समर्थकों का पक्ष भी मजबूत
दूसरी ओर, आरक्षण के समर्थकों ने इन मांगों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि आरक्षण गरीबी उन्मूलन की योजना नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही जातिगत भेदभाव और सामाजिक वंचना को दूर करने का संवैधानिक उपाय है।
सामाजिक न्याय से जुड़े संगठनों, दलित संगठनों और कई शिक्षाविदों का कहना है कि केवल आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करने से ऐतिहासिक सामाजिक असमानताओं का समाधान नहीं होगा। उनका यह भी कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय कई बार आरक्षण को सामाजिक समानता स्थापित करने का संवैधानिक माध्यम मान चुका है।
चुनाव से पहले बढ़ सकती है सियासी हलचल
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश और पंजाब समेत कई राज्यों में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील बन सकता है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में जातीय समीकरण चुनावी राजनीति का अहम हिस्सा हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि NEET आंदोलन ने यह दिखा दिया कि सोशल मीडिया के जरिए बड़े स्तर पर जनसमर्थन जुटाया जा सकता है। अब ‘Reservation Hatao Andolan’ भी उसी डिजिटल रणनीति को अपनाता दिखाई दे रहा है। हालांकि, अभी तक इस अभियान की ओर से किसी बड़े सड़क आंदोलन की घोषणा नहीं की गई है। फिलहाल यह साफ है कि NEET पेपर लीक से शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब आरक्षण की बहस तक पहुंच चुका है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा सामाजिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर देश में नई चर्चा को जन्म दे सकता है।
