कोरोना की रामबाण औषधि बनाने की चुनौती स्वीकार करें बाबा रामदेव

कृष्णमोहन झा

योग गुरु बाबा रामदेव ने अपने पतंजलि संस्थान में तैयार की गई जिस कोरोनिल दवा के बारे में यह दावा किया था कि वह कोरोना वायरस से संक्रमित किसी भी व्यक्ति को मात्र सात दिनों में पूरी तरह स्वस्थ कर सकती है उसके प्रचार एवं उपयोग पर केंद्रीय आयुष मंत्रालय ने फिलहाल रोक लगा दी है|यही फैसला महाराष्ट्र, उत्तराखंड एवं राजस्थान की सरकारों ने भी किया है | यह भी हो सकता है कि कुछ और राज्यों की सरकारें भी आगे चलकर यह यह फैसला करने में संकोच न करे कि उनके राज्य में भी आगामी आदेश तक कोरोना संक्रमितों के इलाज में कोरोनिल दवा का प्रयोग नहीं किया जा सकेगा | यह निसंदेह खेदजनक है कि पतंजलि संस्थान में निर्मित उक्त दवा की रोगनिवारक क्षमताओं के बारे में बाबा राम देव और पतंजलि संस्थान के मुखिया आचार्य बालकृष्ण ने जो दावे किए थे उन पर प्रारंभ अप्रिय विवाद में रोज नए पहलू जुडते जा रहे हैं और इस विवाद को शांत करने के लिए बाबा रामदेव और पतंजलि संस्थान के स्पष्टीकरण भी नाकाफी साबित हुए हैं |गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी हाल में यह कहा है कि कोविड -19 बीमारी की कोई कारगर दवा अभी तक विश्व में नहीं खोजी जा सकी है इसलिए कोरोना के संक्रमण से खुद को सुरक्षित रखने के लिए हमें स्वयं ही सावधानी बरतना होगी | प्रधानमंत्री के कथन से तो यही प्रतिध्वनित होता है कि केंद्र सरकार बाबा राम देव के दावे से सहमत नहीं है |इसमें कोई संदेह नहीं है कि दवा लांच होने के कुछ ही घंटों के अंदर आयुष मंत्रालय द्वारा उसके प्रचार प्रसार पर रोक लगाने का जो फैसला किया गया उससे पतंजलि संस्थान की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता को भी धक्का पहुंचा है और ऐसा प्रतीत होता है कि केंद्रीय आयुष मंत्रालय इस पूरे मामले में जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लेना चाहता | पतंजलि संस्थान में निर्मित कोरोनिल दवा को बाकायदा एक कार्यक्रम में लांच करते समय जब बाबा राम देव ने यह दावा किया था कि इस दवा में शत प्रतिशत कोरोना पीडितों को मात्र सात दिनों में पूरी तरह स्वस्थ कर देने की क्षमता है तब उन्हें यह उम्मीद रही होगी कि देश के अंदर उनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और ख्याति इस दवा की विश्वसनीयता पर कोई सवाल नहीं उठने देगी और कोरोना संक्रमण के इलाज में यह दवा जब रामबाण साबित होगी तब न केवल सारे सवाल अपने आप शांत हो जाएंगे बल्कि पतंजलि संस्थान की ख्याति में भी चार चांद लग जाएंगे | शायद बाबा राम देव ने सरकार के साथ अपने मधुर संबंधों के इतिहास को ध्यान में रख कर यह मान लिया था कि इस दवा के प्रचार प्रसार के लिए सरकार से विधिवत् अनुमति हेतु आवश्यक खानापूरी बाद में पूरा करने की छूट सरकार से अवश्य मिल जाएगी और तब तक यह दावा अपनीअद्भुत’ रोग निवारक क्षमता के बल पर देश भर में धूम मचा रही होगी परंतु बाबा राम देव की उम्मीद और अनुमान गलत साबित हो गए |पतंजलि संस्थान की उक्त दवा के उपयोग एवं प्रचार पर केंद्रीय आयुष मंत्रालय तथा कुछ राज्य सरकारों ने न केवल रोक लगा दी बल्कि राजस्थान सरकार ने तो संस्थान के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने के भी संकेत दे दिए | दवा के चिकित्सकीय परीक्षण के बारे में जो जानकारी पतंजलि संस्थान ने दवा लांच होने के बाद आयुष मंत्रालय को सौंपी वह अगर दवा लांच होने के पहले ही सौंप दी गई होती यह अप्रिय विवाद शायद पैदा ही नहीं होता |नई परिस्थितियों में यह कहना मुश्किल है कि सरकार उनके द्वारा दी गई जानकारी से संतुष्ट हो चुकी है | अगर ऐसा होता तो यह पूरा मामला अब तक सुलझ गया होता | केंद्रीय आयुष मंत्री श्रीपद नाइक का कहना है कि यह अच्छी बात है कि पतंजलि आयुर्वेद ने कोरोना की दवा इजाद की नियमानुसार दवा को लांच करने से पहले उसके बारे में आयुष मंत्रालय को पूरी जानकारी देना जरूरी है | सरकार को उन्होंने जो जानकारी अब सौंपी है उस का पूरा परीक्षण करने के बाद ही मंजूरी दी जा सकेगी |चूंकि इस दवा के द्वारा लोगों को एक ऐसी बीमारी से पूरी तरह स्वस्थ कर देने का दावा किया गया है जो सारी दुनिया में महामारी का रूप ले चुकी है इसलिए आयुष मंत्रालय किसगी भी दवा के उपयोग की अनुमति देने के पूर्व इस पहलू पर अवश्य गौर करना चाहता है कि वह कोरोना संक्रमण के उपचार में प्रभावकारी है अथवा नहीं | उधर कई एलोपैथिक चिकित्सा विशेषग्यों ने यह आशंका जताई है कि इन नुस्खों के प्रयोग से अगर मरीज को कोई लाभ नहीं हुआ तो मरीज का इलाज देरी से शुरू हो पाएगा | लेकिन बाबा राम देव और पतंजलि संस्थान के मुखिया का कहना है कि इस दवा के क्लीनिकल ट्रायल के पश्चात ही उसे लांच किया गया है |
इस पूरे मामले में धीरे धीरे नई नई बातें सामने आ रही हैं | बताया जाता है कि जिस कोरोनिल दवा से मात्र सात दिनों में शत प्रतिशत कोरोना मरीजों के पूरी तरह स्वस्थ हो जाने का दावा किया गया है उनका क्लीनिकल ट्रायल केवल उन कोरोना संक्रमितों पर किया गया जिनके शरीर में या तो संक्रमण के लक्षण ही नहीं थे या ये बहुत ही मामूली लक्षण थे |कोरोना के गंभीर मरीजों और 60 वर्ष से अधिक आयु के मरीज़ों पर इस दवा का क्लीनिकल ट्रायल नहीं किया गया | यह बात राजस्थान के जयपुर शहर में स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट आफ मेडीकल साइंसेज ने भी स्वीकार की है | अब इस संस्थान के द्वारा यह बताया जा रहा है कि मरीजों पर कोरोनिल दवा का प्रयोग नहीं किया गया बल्कि उन्हें कुछ सप्लीमेंट दिए गए थे | ट्रायल के लिए चुने गए 100 मरीजों में से एक तिहाई जल्दी स्वस्थ हो गए और दो तिहाई मरीजों को स्वस्थ होने में थोडा समय लगा परंतु उनमें से कोई भी कोरोना का गंभीर रोगी नहीं था परंतु इस इंस्टीट्यूट के चेयरमैन ने यह दावा अवश्य किया है कि क्लीनिकल ट्रायल में प्रोटोकाल का पूरी तरह पालन किया गया |इसके लिए इंडियन कौंसिल आफ मेडिकल रिसर्च की सी टी आर आई शाखा से पूर्वानुमति भी प्राप्त की गई थी |उधर राजस्थान सरकार का कहना है कि राज्य की राजधानी में स्थित होने के बावजूद नेशनल इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंसेज ने दवा के क्लीनिकल ट्रायल के बारे में सरकार को पहले कोई जानकारी नहीं दी |
इस पूरे मामले में यह बात भी सामने आई है कि पतंजलि आयुर्वेद ने उत्तराखंड सरकार से जिस दवा का लायसेंस प्राप्त करने के लिए उसे आवेदन दिया था उस दवा में कोरोना वायरस का उल्लेख नहीं था बल्कि वह सामान्य सर्दी खांसी बुखार से सुरक्षा हेतु शरीर में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली दवा बनाने का लायसेंस था |उत्तराखंड और राजस्थान सरकारों ने पतंजलि संस्थान को नोटिस जारी कर पतंजलि संस्थान की मुश्किलें बढा दी हैं | अब यह भी पता चला है कि पतंजलि संस्थान ने आयुष मंत्रालय के उस नियम का लाभ उठाकर कोरोना की दवा बना लेने का दावा किया जिसके अंतर्गत यह प्रावधान है कि आयुर्वेदिक दवा तैयार कर उसे सारे देश में बेचने के लिए किसी एक राज्य सरकार की अनुमति पर्याप्त है परंतु उत्तराखंड सरकार ने साफ कहा है कि पतंजलि संस्थान ने उससे कोरोनिल नामक दवा बनाने की अनुमति नहीं मांगी थी | ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तराखंड सरकार के आयुर्वेद विभाग अथवा पतंजलि संस्थान को केंद्र सरकार के आयुष मंत्रालय की उस अधिसूचना की जानकारी नहीं थी जो देश में लाक डाउन के दौरान 21 अप्रैल को जारी की गई थी | इस अधिसूचना में यह प्रावधान है कि कोई भी संस्थान केंद्र सरकार की स्वीकृति के बिना अपनी दवा से किसी बीमारी का दावा नहीं कर सकता | अब यह तो विस्तृत जांच से ही पता चलेगा कि पतंजलि संस्थान को संबंधित नियम कायदों की जानकारी ही नहीं थी या यह सोचकर उसने दवा लांच कर दी कि देश में कोरोना संकट की विकरालता को देखते हुए उसकी दवा को हाथों हाथ लिया जावेगा|बाबा राम देव के पतंजलि आयुर्वेद संस्थान द्वारा कोरोना संक्रमण की दवा का अनुसंधान कर लेने के दावे पर जो सवाल उठ रहे हैं उन पर सारी वस्तुस्थिति स्पष्ट करने की सबसे बडी जिम्मेदारी अब संस्थान की है |दुनिया के अनेक देशों में कोरोना वायरस का वैक्सीन तैयार करने के लिए व्यापक स्तर पर शोध जारी है| कोरोना संक्रमितों को निरोग बनाने के लिए भी ऐसी दवाओं की खोज में वैज्ञानिक जुटे हैं जिनसे कोविड -19 का सफल उपचार किया जा सके | वर्तमान में चिकित्सक एकाधिक दवाओं से कोरोना का इलाज कर रहे हैं किंतु एक निश्चित दवा अभी तक नहीं खोजी जा सकी है |बाबा राम देव के पतंजलि संस्थान ने भी इसी दिशा में एक प्रयास किया था जिस पर एक अप्रिय विवाद ने जन्म ले लिया | संस्थान का उद्देश्य पवित्र था और विशेष गौर करने लायक बात यह है कि संस्थान द्वारा विकसित यह दवा इतनी महंगी भी नहीं थी कि किसी को भी इसके पीछे किसी व्यावसायिक लाभ की लालसा नजर आने लगे | कोरोना वायरस के संक्रमण के खतरे से जब तक हम पूरी तरह उबर नहीं जाते तब तक उन कोरोना संक्रमितों के लिए ऐसी दवा की नितांत आवश्यकता तो बनी ही रहेगी जो नामी प्राइवेट चिकित्सा संस्थानो में जाकर महंगा इलाज कराने में सक्षम नहीं हैं और सरकारी अस्पतालों की अपनी सीमाओं अथवा उनमें व्याप्त बदइंतजामी के कारण समुचित उपचार से वंचित रह जाते हैं | बाबा राम देव का आयुर्वेद संस्थान अगर ऐसे लोगों की मदद के लिए कोई कारगर दवा तैयार करने में सफल हो जाए तो निश्चित रूप से वह भूरि भूरि प्रशंसा का अधिकारी बन जाएगा लेकिन अभी तो बाबा राम देव के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह सिद्ध करने की है कि कोरोनिल किट को जारी करने के पूर्व उनके संस्थान ने सरकार से हर स्तर पर विधिवत अनुमति प्राप्त कर ली थी | अब यह उत्सुकता का विषय है कि पतंजलि संस्थान और बाबा राम देव इस परीक्षा में कितने सफल होते हैं वैसे यह भीउल्लेखनीय है कि राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार केआयुष मंत्रालय ने कोरोना संक्रमण से बचाव हेतु आयुर्वेदिक पद्धति से बनाए गए काढे को विशेष लाभकारी बताया है | यह शरीर में प्रतिरोधक क्षमता को बढाता है | कुछ राज्य सरकारों ने जनता के बीच इसका वितरण भी करवाया है इसका तात्पर्य यही है कि आयुर्वेद के माध्यम से शरीर में कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव की प्रतिरोधक क्षमता अर्जित की जा सकती है | कोरोना संक्रमण के खतरे से लोगों को बचाने के लिए अगर पतंजलि आयुर्वेद संस्थान को कोई कारगर दवा का अनुसंधान करने में दिलचस्पी दिखाता है तो सरकार को उसमें सहयोग देना चाहिए |

(लेखक वरिष्ठ राजनीतिक-सामाजिक विश्लेषक हैं।)

Leave a Reply

Your email address will not be published.