किसी भी सम्मान से बड़ी है दद्दा की शख्सियत

कुलदीप पंवार
दद्दा, हॉकी के जादूगर, चुंबकीय हॉकी स्टिक वाले, हॉकी के ग्रेट शोमैन। ये सब नाम हैं उस शख्सियत के, जिसे निधन के साढे़ तीन दशक बाद भी दुनिया का हर हॉकी खिलाड़ी याद करता है। जिसके सम्मान में दुनिया में वर्ल्ड वॉर करा देने वाला हिटलर जैसा शख्स भी झुक जाता था। ऐसे थे देश ही नहीं दुनिया के सबसे महान हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद।

29 अगस्त पर जिनके जन्म दिन को देश हर साल राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाकर उन्हें याद करता है और देश का नाम रोशन करने वाली खेल प्रतिभाओं को सर्वोच्च खेल सम्मानों से नवाजता है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तकरीबन हर साल उनके जन्मदिन से पहले रेडियो पर मन की बात जनता से करते हुए उनके योगदान को याद करते हैं। आज भी उन्होंने यह काम किया।

लेकिन एक सवाल है, जो शायद हर खेल प्रेमी को झटका ही देता है। यह सवाल है कि इतनी सम्मानित हस्ती होने के बावजूद मेजर ध्यानचंद जैसी शख्सियत कभी देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से क्यों नहीं नवाजी गई।

हालांकि केंद्र सरकार ने देश के सर्वोच्च खेल सम्मान यानी “खेल रत्न” का नाम संशोधित कर इसे दद्दा के नाम पर कर दिया है, लेकिन आम खेल प्रेमी को यह कदम दद्दा की उपलब्धि को सलाम से ज्यादा उनकी पैतृकभूमि उत्तर प्रदेश में चुनावी साल का असर ज्यादा महसूस हो रहा है।

ऐसे में एक बार फिर दद्दा ध्यानचंद को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित कराए जाने के लिए मुहिम शुरू हो गई है। इससे सोशल मीडिया पर भी फिर से दद्दा को सम्मान नहीं देने पर बहस ने जन्म ले लिया है। लेकिन शायद हॉकी से जुड़े लोग भी यह बात जरूर मानेंगे कि दद्दा का देश का सम्मान बढ़ाने के लिए किया गया योगदान शायद किसी भी तरह के सम्मान से भी बड़ा है।

(लेखक paprika.com के खेल संपादक रह चुके हैं. ये लेख onlysportsweb.wordpress.com से साभार लिया गया है.  )

 

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