दादा की डोर से राजू के हाथों तक, कठपुतली अभी जिंदा है…

  • From Grandpa's strings to Raju's hands, the puppet is still alive...नागौर-मारवाड़ की मिट्टी से निकली कला, जयपुर में बसे परिवारों ने संभाली विरासत; पर्यटन के मंचों से दुनिया तक पहुंच रही लोककथा

सोनल जैन

जयपुर: राजस्थान की पहचान सिर्फ किलों और महलों से नहीं है। इसके गांवों, परिवारों और लोककलाओं में भी सदियों की कहानियां सांस लेती हैं। कठपुतली ऐसी ही एक लोककला है। मंच पर कुछ मिनट घूमती एक छोटी-सी पुतली के पीछे कई पीढ़ियों की मेहनत, स्मृतियां और जीवन जुड़ा है। इस डोर का एक सिरा नागौर और मारवाड़ की लोकभूमि से जुड़ा है और दूसरा आज जयपुर में बसे उन परिवारों के हाथों में है, जिन्होंने बदलते समय के बावजूद इस कला को छोड़ा नहीं। इन्हीं कलाकारों में राजू भाट भी हैं।

राजू के हाथ में कठपुतली आते ही लकड़ी की पुतली एक पात्र बन जाती है। सिर झुकता है, हाथ लहराते हैं और पोशाक घूमने लगती है। राजू बताते हैं कि उन्होंने यह कला किताब से नहीं सीखी। यह उन्हें घर से मिली। उनके पिता कन्हैयालाल भाट ने इसे संभाला और उनसे पहले उनके दादा भूरा भाट इस परंपरा से जुड़े थे। यानी राजू के लिए कठपुतली सिर्फ पेशा नहीं, परिवार की विरासत है।

नागौर से चली डोरः-

राजस्थान की कठपुतली परंपरा का संबंध नागौर और मारवाड़ से गहराई से जोड़ा जाता है। भाट समुदाय की कथावाचन और वंश-स्मृति की परंपराओं के साथ कठपुतली ने लोककथाओं को मंच और दृश्य रूप दिया। पीढ़ियों तक कलाकार गांव-गांव घूमते रहे। कहीं चौपाल, कहीं मेला, कहीं पारिवारिक आयोजन तो कहीं राजदरबार उनका मंच बना। समय बदला, दर्शक बदले और प्रसंग बदले, लेकिन कहानी कहने की परंपरा बनी रही। राजू के परिवार के लिए इस यात्रा की एक खास स्मृति भी है। परिवार के अनुसार, उनके दादा भूरा भाट ने पंडित जवाहरलाल नेहरू के सामने भी कठपुतली का प्रदर्शन किया था। यह प्रसंग आज भी परिवार के लिए गर्व का हिस्सा है।

दादा से पिता और पिता से राजूः-

भूरा भाट से कन्हैयालाल और फिर राजू तक पहुंची यह परंपरा सिर्फ कला की कहानी नहीं है, बल्कि रोजी-रोटी और जीवन से भी जुड़ी रही है। एक दौर में कठपुतली कई कलाकार परिवारों की आजीविका का बड़ा सहारा थी। कलाकार अपने पात्रों और साज-सामान के साथ निकलते और जहां दर्शक मिलते, वहीं मंच तैयार हो जाता। समय के साथ कई परिवार नागौर और मारवाड़ से निकलकर जयपुर जैसे शहरों में बसे। जगह बदली, जीवन बदला, लेकिन पहचान नहीं बदली। घरों में आज भी कठपुतलियां तैयार होती हैं, पोशाकें बनती हैं और बच्चे बड़ों को देखकर डोर संभालना सीखते हैं। राजू के परिवार की कहानी भी इसी बदलाव की कहानी है—जड़ें नागौर में, वर्तमान जयपुर में और नजर भविष्य पर।

मोबाइल के दौर में भी नहीं टूटा आकर्षणः-

आज मनोरंजन मोबाइल की स्क्रीन तक पहुंच चुका है। राजू मानते हैं कि समय बहुत बदल गया है, लेकिन कठपुतली का आकर्षण अब भी कायम है। जब मंच पर कठपुतली उतरती है तो बच्चे ही नहीं, बड़े भी रुककर देखते हैं। वजह साफ है मोबाइल पर कहानी देखी जाती है, लेकिन कठपुतली में कहानी आंखों के सामने पैदा होती है। कलाकार की उंगलियां डोर खींचती हैं और उसी पल पात्र जीवंत हो उठता है। यही उसका सबसे बड़ा आकर्षण है।

समाज बदला, पर रिश्ता नहीं टूटाः-

राजू के लिए कठपुतली अपनी परंपरा से जुड़ने का माध्यम भी है। उनका मानना है कि नई पीढ़ी को पढ़ना-लिखना चाहिए, रोजगार के नए रास्ते तलाशने चाहिए और बेहतर भविष्य बनाना चाहिए। लेकिन इसके साथ अपनी पुरानी पहचान को समझना भी जरूरी है।

नई पीढ़ी जब शिक्षा और आधुनिक जीवन के साथ अपनी कला को भी संभालती है, तो परंपरा बोझ नहीं, पहचान बन जाती है।

पर्यटन ने दिया नया मंचः-

कठपुतली की इस यात्रा में पर्यटन ने भी नई भूमिका निभाई है। राजस्थान आने वाला पर्यटक अब केवल किले-महल नहीं देखना चाहता। वह प्रदेश के लोकजीवन, संगीत, पहनावे और कहानियों को भी करीब से जानना चाहता है।

ऐसे में कठपुतली पर्यटक और राजस्थान की लोकसंस्कृति के बीच जीवंत कड़ी बनती है। राजस्थान पर्यटन के आयोजनों और विभिन्न पर्यटन मंचों पर लोक कलाकारों को मिलने वाले अवसरों ने इस कला को नए दर्शकों तक पहुंचाया है।

राजू जैसे कलाकारों के लिए यह सिर्फ प्रस्तुति का मंच नहीं है। यह दादा और पिता से मिली कला को नई पीढ़ी और नए दर्शकों तक पहुंचाने का रास्ता है। जब कोई विदेशी पर्यटक जयपुर में कठपुतली देखता है, तो वह सिर्फ एक पुतली का खेल नहीं देख रहा होता। उसके सामने नागौर और मारवाड़ से चली एक लोक परंपरा का छोटा-सा हिस्सा जीवंत होता है।

कठपुतली को जानिए

कठपुतली क्या है?

राजस्थान की पारंपरिक सूत्र-संचालित लोक कठपुतली कला। ‘काठ’ यानी लकड़ी और ‘पुतली’ यानी गुड़िया—इन्हीं शब्दों से ‘कठपुतली’ नाम पड़ा।

इतिहास कितना पुराना है?

कठपुतली की शुरुआत की कोई सर्वमान्य ऐतिहासिक तारीख उपलब्ध नहीं है। राजस्थान पर्यटन इसे करीब 1500 वर्ष पुरानी परंपरा के रूप में प्रस्तुत करता है और नागौर क्षेत्र को इसके संभावित उद्गम से जोड़ता है। इसलिए इसे निश्चित तारीख के बजाय पीढ़ियों से चली आ रही प्राचीन लोक रंगमंच परंपरा के रूप में देखना अधिक उचित है।

नागौर से संबंध क्यों?

राजस्थान पर्यटन और अन्य सांस्कृतिक स्रोत नागौर तथा आसपास के क्षेत्र को राजस्थान की कठपुतली परंपरा के विकास से जोड़ते हैं। इसका भाट समुदाय की कथावाचन और वंश-स्मृति की परंपराओं से भी संबंध रहा है।

कठपुतली कैसे बनती है?

परंपरागत कठपुतली का सिर लकड़ी से तराशा जाता है। चेहरे पर रंग-रूप दिया जाता है, जबकि शरीर कपड़े और भराव सामग्री से तैयार होता है। उसे पारंपरिक पोशाक पहनाई जाती है और डोरियों के जरिए संचालित किया जाता है।

कठपुतली कौन चलाता है?

कलाकार हाथ और उंगलियों से डोरियों को नियंत्रित करता है। साथ ही उसे संवाद, संगीत, कहानी और पात्रों की गति का तालमेल भी साधना पड़ता है।

भाट समुदाय का संबंधः-

भाट समुदाय की पारंपरिक पहचान कथावाचन, वंशावली और वंश-स्मृति से जुड़ी रही है। कठपुतली ने इन कथाओं और लोकगाथाओं को दृश्य और नाटकीय रूप देने का माध्यम दिया।

कौन-सी कथाएं प्रसिद्ध हैं?

राजस्थानी कठपुतली में लोकनायकों और ऐतिहासिक पात्रों की गाथाओं के साथ सामाजिक और मनोरंजक प्रसंग भी प्रस्तुत किए जाते रहे हैं। अमर सिंह राठौड़ की गाथा इसका प्रमुख उदाहरण है।

आज इसका महत्व क्या है?

कठपुतली आज सिर्फ लोक मनोरंजन नहीं, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान और पर्यटन अनुभव का भी हिस्सा है। पर्यटन मंच कलाकारों को नए दर्शक और आजीविका के अवसर देते हैं, जिससे यह परंपरा आगे बढ़ती है।

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