सिर्फ क्लब नहीं, संस्था है गढ़वाल हीरोज

राजेंद्र सजवान

कोरोना से निपटने में समय लग सकता है लेकिन जब भी खेल गतिविधियां मैदान पर लौटेंगी, हर तरफ नया जोश और उत्साह जरूर नज़र आएगा। ऐसे ही  मौके की तलाश में है दिल्ली का गढ़वाल हीरोज फुटबाल क्लब, जिसने आई लीग फुटबाल में ऊंची छलांग का लक्ष्य निर्धारित किया है। यदि  गढ़वाल हीरोज आई लीग तक का सफर तय कर लेता है तो दिल्ली की फुटबाल के लिए ऐतिहासिक अवसर होगा।  आई लीग  क्वालिफाइंग मुकाबलों में गढ़वाल हीरोज ने ग्रुप मुकाबलों में अपनी स्थिति खासी मजबूत बना ली थी लेकिन कोरोना के चलते अब गढ़वाल हीरोज का इंतजार बढ़ गया है।

पिछले साल दिल्ली लीग में एक और ख़िताबी जीत के साथ गढ़वाल हीरोज ने  बुलन्द आवाज़ मे अपनी उपस्थिति का  अहसास कराया था। एक साल पहले जिस भारतीय वायुसेना से हार कर दूसरे स्थान से संतोष करना पड़ा था उसे हरा कर गढ़वाल एफसी ने दिखा दिया कि राजधानी की फुटबॉल मे वह बड़ी ताक़त बनी हुई है।

फाइनल की खास बात यह रही कि वर्षों बाद गढ़वाल के पूर्व खिलाड़ी और अधिकारी.बड़ी मात्रा मे एतिहासिक अंबेडकर स्टेडियम मे मौजूद थे। क्लब अधिकारियों ने अपने उत्तराखंडी समाज को फाइनल मैच में उपस्थित रहने का आग्रह किया और  यह प्रयोग शानदार और जानदार रहा। हालाँकि पहले भी इस प्रकार के निमंत्रण भेजे जाते रहे किंतु जो उत्साह और उमंग 2019 में देखने को मिला, उसकी कल्पना शायद गढ़वाल हीरोज के अधिकारियों को भी नहीं रही होगी। अपने पारंपरिक वाद्य यंत्रों-ढोल, दमों और मुस्काबाजू की धुनों पर नाच कर सैकड़ों प्रशंसकों और पूर्व खिलाड़ियों ने जीत का जश्न मनाया। महामारी से निपटने के बाद गढ़वाल हीरोज फिर वही रफ्तार पकड़ना चाहेगा।

यह कटु सत्य है कि ना सिर्फ़ गढ़वाल हीरोज अपितु दिल्ली की फुटबॉल की बुनियाद उतराखंड के विस्थापितों पर टिकी है। गढ़वाली और कुमाऊंनी खिलाड़ियों के योगदान से दिल्ली की फुटबॉल पिछले पचास-साठ सालों से खूब फलीफूली है। सिर्फ़ गढ़वाल हीरोज ही नहीं, शिमला यंग्ज़, नई दिल्ली हीरोज, यंगमैन, मून लाइट, बीबी स्टार्स, मुगल्स, नेशनल्स, मून लाइट जैसे क्लबों के स्टार खिलाड़ी उतराखंडी ही रहे है।

गढ़वाल हीरोज के नक्शे कदम पर गढ़वाल डायमंड, उत्तरांचल हीरोज और उत्तराखंड क्लब भी धीमे धीमे आगे बढ़ रहे हैं और उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले सालों में उत्तराखंडी मूल के क्लब और खिलाड़ियों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा देखने को मिलेगी और शायद आने वाले सालों में पहाड़ी खिलाड़ी देश की राजधानी की फुटबाल को अपने इशारे पर नचाएंगे।

गढ़वाल हीरोज, गढ़वाल दायमंड, उत्तरांचल और उत्तराखंड क्लबों के साथ यह विडंबना है कि उनकी भूमिका सिर्फ़ अच्छे खिलाड़ी तैयार करने तक सीमित रही है। यहाँ से निकलकर कई खिलाड़ी राज्य और देश के लिए खेले, जिनकी संख्या सैकड़ों मे है लेकिन जिस सम्मान के हकदार थे बहुत कम को मिल पाया।

डूरंड, डीसीएम और देश के कई बड़े आयोजनों मे भाग लेकर क्लब और उसके खिलाड़ियों ने खूब नाम कमाया है । लेकिन अब वक्त आ गया है कि इन  खिलाड़ियों को नार्थ ईस्ट के प्रदेशों की तर्ज पर फुटबॉल को अपनाना होगा।  सरकार और राज्य सरकार हर प्रकार से समर्थन देने के लिए तैयार हैं। ऐसे मे एकजुटता और संयुक्त प्रयासों से दुनियाँ के सबसे लोकप्रिय खेल मे उत्तराखंडी मूल के खिलाड़ी भी  अपनी अलग पहचान बना सकते हैं।

 

गढ़वाल हीरोज के कुछ शीर्ष  खिलाड़ी:

कांता प्रसाद, सुखपाल बिष्ट, ओम प्रकाश नवानी, गुमान सिंह रावत, जगदीश रावत, कन्ह्या रावत, जीव आनंद उपाध्याय, राजा राम, विजय राम ध्यानी, केएस रावत, त्रिलोक अधिकारी,एब्बे और मीना(नाइजीरिया), कुलदीप रावत, भीमभंडारी, वाइ एस असवाल, वीरेंद्र रावत, हरेन्द्र नेगी, रघुबीर बिष्ट, रवीन्द्र रावत, कमल  जदली(गुड्डू), राधा बल्लभ सुन्दरियाल, राजेंद्र सजवान, किशन, स्व. भोपाल रावत(गोपी), वीरेंद्र मालकोटि, स्व. दिलावर नेगी, राजेंद्र अधिकारी, सेमसन मेसी, सुब्रामन्यम, स्व रूबिन सतीश,रवि राणा, सजीव भल्ला,  दिगंबर बिष्ट,  चंदन रावत, राजेंद्र अधिकारी,इंदर राणा, दिनेश रावत, पुष्पेंद्र तोमर, कबीर सोम, विपिन भट्ट, भरत  नेगी, एच एसबिष्ट(बल्ली), दीवान सिंह, स्व.माधवा नंद, लक्ष्मण बिष्ट, रवि भाकुनी, प्रेम जमनाल, धर्मेन्द्र खरोला, भूपेंद्र रावत, भूपेंद्र ठाकुर, कामेई, पारितोष, मनोज गोसाईं, सुनील पटवाल, दीपक, आशीष पांडे और कई अन्य खिलाड़ियों ने गढ़वाल हीरोज को राजधानी का चैम्पियन क्लब बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।

पदाधिकारी:

केसर सिंह नेगी, रंजीत रावत, एचएसभंडारी, मगन पटवाल, त्रिभुवन रावत, बी एस नेगी, अनिलनेगी,दयाल परमार, रतन रावत।

गढ़वाल हीरोज के खिलाड़ियों की खास बात यह रही कि उनमें से ज़्यादातर ने कभी किसी कोच से ट्रेनिंग नहीं ली। अधिकांश पैदायशी फुटबॉलर थे और राउज एवेन्यू, सेवा नगर, अलीगंज, किदवई नगर, लोधी कालोनी, पंचकुया रोड, आरके पुरम और मोतीबाग के पार्कों और पथरीले मैदानों में खेल कर बड़े हुए। चाय- मट्ठी  उनकी रेफ्रेशमेंट रही। स्कूल स्तर पर नामी कोच रमेश चंद्र देवरानी से गुर सीखने वाले अनेक खिलाड़ी देश के लिए खेलने में सफल रहे।

कुछ ऐसे  खिलाड़ियों का ज़िक्र किया जा सकता है, जो ना सिर्फ़ शानदार और जानदार थे अपितु उन्हें कई बड़े क्लबों से आफर आए लेकिन परिवारिक कारणों से आगे नहीं बढ़ पाए।रक्षापंक्ति के खिलाड़ियों में कांता प्रसाद और सुखपाल बिष्ट अपने खेल कौशल के दम पर क्रमश: ईएमई और सीमा बल के कप्तान बने तो गुमान सिंह रावत और भीम सिंह भंडारी अभूतपूर्व थे। उन्हें  बंगाल और पंजाब के  नामी क्लबों ने अपने बेड़े में शामिल करने का निमंत्रण दिया। जगदीश रावत , एच एस नेगी, कमल, रवीन्द्र रावत, लक्ष्मण बिष्ट, माधवा नंद, रवि राणा और कई अन्य खिलाड़ियों ने अपनी अलग पहचान भी बनाई। खिलाड़ी के बाद कोच का डायत्व निभाने में सुखपाल बिष्ट और रवि राणा का योगदान सर्वोपरि रहा है। ख़ासकर, रवि राणा ने खिलाड़ी और कोच के रूप में लंबा योगदान दिया।

 

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