रिश्तों में बढ़ती दूरियों को कैसे रोकें… जानें

शिवानी रज़वारिया

रिश्ता चाहे कोई भी हो उसमें प्यार और विश्वास के साथ टकराव का तड़का जरूर होता है। कहा तो यह भी जाता है कि जहां टकराव जादा होता है वहां प्यार उससे भी जादा होता है। पर कभी-कभी ये प्यारी नोक-झोंक कब छोटी-छोटी बहसों में बदल जाती हैं पता भी नहीं चलता और यहीं छोटी-छोटी बहसें बड़ी-बड़ी बहसों में तब्दील हो जाती है और रिश्तों के बीच का प्यार, विश्वास कहीं छिप-सा जाता है। आपको ख़ुद पता नहीं चलता कि हो क्या रहा है। सही-गलत की उलझन में ये बहसें आपकी लाइफ का हिस्सा बनने लगती हैं। एक टाइम तक ये सुलझती भी रहती है पर जब उलझती है तो फ़िर आपके रिश्ते के अस्तित्व तक को हिलाने की हिम्मत रखती हैं। ऐसा क्यों होता है? दरसअल जितनी स्पीड से हमारा मस्तिष्क पॉजिटिविटी को अपनाता है उससे कहीं तेज़ी से नेगेटिविटी की ओर आकर्षित होता  हैं। पर इन बहसों से बचना उतना भी मुश्किल नहीं जितना हमें लगता है। ऐसी परिस्थितियों से आसानी से निकला या बचा जा सकता हैं। आईएं जानते है कैसे?

हर किसी का अपना एक तरीका होता है वो चाहता है वो उसी स्टाइल से अपनी लाइफ जिए। पर ये बात जितनी सच है कि।।हम अकेले आते है और अकेले ही जाते है। तो इस बात में भी उतनी ही सच्चाई है कि हम आते अकेले है पर हम रहते अकेले नहीं है हमारे साथ बहुत से रिश्ते होते हैं जो ऊपर वाला हमारे साथ जोड़कर हमें उपहार में देकर भेजता हैं। और इन उपहारों को संभाल कर रखना हमारी जिम्मेदारी होती है।

जब हम अपने परिवार के साथ होते है तब ऐसी दिक्कतें ज़रूर आती हैं। पैरेंट्स से आपकी सोच ना मिलना,कभी-कभी उम्र का गैप भी इन स्थितियों का कारण बनता है, भाई-बहन के साथ विचार ना मिलना बहुत सी चीजें जो ऐसा माहौल बना देती हैं। ऐसे में हम छोटी-छोटी बातों पर अपना संयम खो देते है जिन बातों का कोई मतलब नहीं नहीं होता हो और बहस बिना मतलब बढ़ती है और बाद में पछतावा भी होता है।

इसका सबसे बड़ा कारण है।। बात ना करना! हमनें आपस में बात करना बंद कर दिया है जिसके कारण हमारे मन की बात हमारे अंदर ही रह जाती है और वो मन के अंदर से बाहर नहीं निकलती और जब निकलती है तो शब्द लावा बन जाते है और धीरे धीरे वो आपके नेचर में समाने लगते है। और यही नहीं करना है मन में बात को रख कर उसे शब्दलावा में तब्दील नहीं होने देना है।

सबसे पहले खुद से पूछें आप क्या चाहते हैं। जैसे आप अपने आसपास कैसा माहौल चाहते हैं। अगर आपको खुशनुमा माहौल देखना पसंद है तो सबसे पहले आपको ख़ुद को ख़ुश मिजाज़ बनाना होगा, तभी आप हर चीज़ में खुशी देख सकेंगे। जब हम खुद से संतुष्ट महसूस करते हैं तो अपनी बात को आसानी से,बिना किसी दबाव के रख पाते है।

अपनी कमियों से भागने की कोशिश ना करें उनको स्वीकार करें। अपनी लाइफ का हिस्सा बनाएं। उसे अपनी कमजोरी नहीं ताक़त बनाएं क्योंकि ज्यादातर हम अपनी कमियों को दूसरों की अच्छाई के साथ तोलते रहते है जिसके कारण और भी ज्यादा अपने लिए नकारात्मक सोच बनती है और जो हम सोचते है वहीं बोलते भी हैं।तो अच्छा सोचें अच्छा बोलें ।

अपनी गलतियों को मानकर उन्हें दुरुस्त करना सबसे बड़ी चुनौती है। यही पर हमारी ईगो अटक जाती है। पर अगर आप चाहते है तो अपनी गलतियों पर पर्दा डालने की जगह उन्हें मानकर आगे के लिए मजबूत बनें। गलती मानने से आपकी काबिलियत पर सवाल नहीं खड़े होते बल्कि आप अपनी नज़रों में उठ जाते है वो सुकून आपको मिलता है जिसकी तलाश में झूठे घूमते है।और यही बात आपको भीड़ से अलग करती है।

सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण बात है आपको अपने पर काम करना बहुत जरूरी है। होता क्या है हम हमेशा दूसरों की कमियां ढूंढते  रहते हैं उन्हें अपने तरीके से बदलना चाहते हैं यही से दिक्कतें आती हैं। अपने आप को बदलने का मतलब है खुद को मजबूत बनाना ताकि आप खराब से खराब स्थिति में भी मजबूती से खड़े रहें, आपा खोकर उसे और ना बिगड़ने दें।

जो भी समस्याएं हैं उन पर बात करना शुरू करें। बात करने से आधी समस्या खुद ही सॉल्व हो जाती है क्योंकि हमारे सामने तो परिस्थितियां होती है समस्या तो हम दिमाग में ख़ुद बनाते है। बात करने की आदत बनाएं,बात को मुद्दा ना बनने दें।

रिश्ते बहुत नाज़ुक होते हैं उन्हें संभाल कर रखना जितना मुश्किल है उतना आसान भी, थोड़ा धैर्य बरतने की आवश्यकता है। फिलहाल इतना ही !

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