समय की आवश्यकता है शास्त्रार्थ; मीडिया को विवाद नहीं, संवाद का मार्ग अपनाना चाहिए: डॉ. के.जी. सुरेश

Intellectual discourse is the need of the hour; the media should adopt the path of dialogue rather than controversy: Dr. K.G. Suresh.चिरौरी न्यूज

नई दिल्ली: शास्त्रार्थ आज के समय की आवश्यकता है और संचार के क्षेत्र में एक मध्य मार्ग होना चाहिए, जिसका अनुसरण समकालीन मीडिया को करना चाहिए। यह विचार इंडिया हैबिटेट सेंटर (आईएचसी) के निदेशक डॉ. के.जी. सुरेश ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में शास्त्रार्थ की उपयोगिता अत्यंत महत्वपूर्ण है तथा मीडिया में तर्क-वितर्क के स्थान पर संवाद को केंद्रीय स्थान मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि शास्त्रार्थ हमें दूसरों को समझने का अवसर प्रदान करता है और इसे आम जनमानस की विचार प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

डॉ. सुरेश आज इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “वर्तमान समय में शास्त्रार्थ का अनुप्रयोग” के समापन अवसर पर संबोधित कर रहे थे। इस संगोष्ठी का संयुक्त आयोजन भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद (आईसीपीआर), शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार तथा भारत बोध केंद्र, हैबिटेट लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर (एचएलआरसी), आईएचसी द्वारा किया गया।

इस अवसर पर संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान प्रो रमेश कुमार पाण्डेय, पूर्व कुलपति , श्री लाल बहादुर शाश्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय ने कहा कि शास्त्रार्थ भारतीय दर्शन की वह पद्धति है जिसमें व्यक्ति ज्ञान की वास्तविक अनुभूति करता है | यह किसी भी प्रकार के भेद-भाव से मुक्त ज्ञान-मंथन का मार्ग प्रशस्त करती है | अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए आईसीपीआर के सदस्य सचिव प्रो. सच्चिदानंद मिश्र ने कहा कि इस आयोजन से शास्त्रार्थ जैसे महत्वपूर्ण विषय को विमर्श में स्थान मिलेगा, एवं आने वाले समय में यह प्राचीन पद्धति भारतीय समाज को एक नई दिशा देगी | ऐसे आयोजन का उद्देश्य एक ऐसे बीजारोपण की आवश्यकता है जो भारतीय दर्शन को पुनः स्थापित कर सके।

दो दिनों तक चली इस संगोष्ठी में सात तकनीकी सत्र आयोजित किए गए, जिनमें अनेक विशेषज्ञ व्याख्यान एवं शोधपत्र प्रस्तुतियाँ हुईं। विचार-विमर्श के दौरान दर्शन, भारतीय ज्ञान परंपरा, विधि, राजनीति विज्ञान, मीडिया अध्ययन, शिक्षा एवं मनोविज्ञान, इतिहास एवं समाजशास्त्र, सांस्कृतिक अध्ययन, शोध पद्धति तथा साहित्यिक विमर्श जैसे विविध क्षेत्रों में शास्त्रार्थ की समकालीन प्रासंगिकता और उपयोगिता पर चर्चा की गई।

वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि शास्त्रार्थ एक संवादात्मक और प्रमाण-आधारित ज्ञान परंपरा है, जो वर्तमान बौद्धिक, सामाजिक, शैक्षिक तथा सार्वजनिक नीति संबंधी चुनौतियों के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

संगोष्ठी में श्री सिद्धेश्वर शुक्ल द्वारा लिखित पुस्तक “शास्त्रार्थ इन इंडिया: मेथडोलॉजी एंड एप्लीकेशन्स” की विशेष सराहना की गई। वक्ताओं ने शास्त्रार्थ को भारतीय परंपरा की ऐसी समृद्ध विरासत बताया, जो संवाद, जिज्ञासा, तर्क, प्रमाण और परस्पर सम्मान पर आधारित ज्ञान-निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाती है। उन्होंने वैदिक साहित्य, दार्शनिक परंपराओं और शास्त्रीय व्याख्या पद्धतियों में शास्त्रार्थ की उपस्थिति पर प्रकाश डालते हुए पूर्वपक्ष, उत्तरपक्ष और संरचित विमर्श की भूमिका को सत्य की खोज का महत्वपूर्ण साधन बताया।

Intellectual discourse is the need of the hour; the media should adopt the path of dialogue rather than controversy: Dr. K.G. Suresh.वक्ताओं ने इस बात पर भी बल दिया कि प्रश्न पूछना, आलोचनात्मक चिंतन करना तथा विभिन्न दृष्टिकोणों के प्रति खुलापन भारतीय ज्ञान परंपरा की मूल विशेषताएँ रही हैं। उन्होंने बताया कि यही सिद्धांत आज भी विधिक चिंतन, संवैधानिक प्रक्रियाओं, लोकनीति निर्माण और लोकतांत्रिक निर्णय-प्रक्रिया को समृद्ध बना सकते हैं। संगोष्ठी में यह भी रेखांकित किया गया कि दुष्प्रचार, ध्रुवीकरण, डीपफेक तथा एकपक्षीय बहसों जैसी समकालीन चुनौतियों के बीच प्रमाण-आधारित संवाद की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। तर्क, प्रमाण और संवाद को आलोचनात्मक चिंतन, सक्रिय श्रवण, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सार्थक जनसहभागिता के लिए आवश्यक उपकरणों के रूप में प्रस्तुत किया गया। वक्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि शास्त्रार्थ सत्य की खोज, बौद्धिक उदारता और जागरूक नागरिकता को प्रोत्साहित करने वाला एक सशक्त ढाँचा प्रदान करता है।

दो दिवसीय संगोष्ठी में प्रमुख वक्ताओं एवं प्रस्तुतकर्ताओं में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति प्रो. गिरीश्वर मिश्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रो. रामनाथ झा, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. ओमनाथ बिमली, जेएनयू के प्रो. संतोष कुमार शुक्ल तथा श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रो. महानंद झा एवं प्रो. बिष्णुपद महापात्र, आईसीपीआर के प्रोजेक्ट निदेशक डॉ० अमित यादव, बेनेट विश्वविद्यालय के टाइम्स स्कूल ऑफ मीडिया के डीन डॉ. सुमित नरूला, आईएमएस के प्रो. अनिल निगम, भारतीय जनसंचार संस्थान की डॉ. रचना शर्मा, जे.सी. बोस विश्वविद्यालय, फरीदाबाद के प्रो. पवन सिंह मलिक, एमिटी विश्वविद्यालय की प्रो. पूजा राणा, वीआईपीएस के प्रो. सुनील कुमार मिश्रा एवं डॉ. अतुल उपाध्याय तथा क्राइस्ट विश्वविद्यालय के डॉ. निशांत कुमार भारद्वाज शामिल रहे। समापन सत्र का संचालन डॉ० उमेश पाठक ने किया |

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