25 साल तक लटका अपहरण केस, इलाहाबाद हाई कोर्ट बोला; न्याय व्यवस्था सिर्फ ‘तारीख़ पर तारीख़’ नहीं

चिरौरी न्यूज
नई दिल्ली: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने करीब 25 साल से लंबित एक अपहरण मामले की सुनवाई के दौरान आपराधिक न्याय प्रणाली में होने वाली अत्यधिक देरी पर कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि न्याय व्यवस्था को केवल “तारीख़ पर तारीख़” तक सीमित नहीं किया जा सकता और किसी आपराधिक मुकदमे को दो दशक से अधिक समय तक लंबित रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक नागरिक को प्राप्त त्वरित और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन है।
यह मामला वर्ष 2001 में बहराइच के पयागपुर थाने में दर्ज एक कथित अपहरण केस से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि कथित पीड़िता अपनी इच्छा से मुख्य आरोपी अजय कुमार उर्फ़ चिंगी के साथ गई थी। बाद में दोनों ने विवाह कर लिया और वर्तमान में पति-पत्नी के रूप में साथ रह रहे हैं। उनके तीन बच्चे भी हैं। अदालत ने यह भी नोट किया कि राज्य सरकार इन तथ्यों का प्रभावी ढंग से खंडन नहीं कर सकी।
लखनऊ पीठ के न्यायमूर्ति राजीव भारती ने अजय कुमार उर्फ़ चिंगी और राम चंद्र की अग्रिम ज़मानत याचिका स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि वर्षों तक मामले में कोई सार्थक प्रगति नहीं हुई और पूरी आपराधिक कार्यवाही महज़ एक औपचारिकता बनकर रह गई। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्याय को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता।
अपने आदेश में हाई कोर्ट ने सनी देओल की चर्चित फ़िल्म दामिनी के मशहूर संवाद “तारीख़ पे तारीख़” का उल्लेख करते हुए कहा कि बार-बार सुनवाई टालना भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली की पहचान नहीं बन सकता। अदालत ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य समयबद्ध और प्रभावी न्याय सुनिश्चित करना है, न कि मुकदमों को वर्षों तक अधर में लटकाए रखना।
हाई कोर्ट ने दोनों आरोपियों को निर्देश दिया कि वे दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करें। इसके बाद उन्हें निर्धारित शर्तों के साथ अग्रिम ज़मानत पर रिहा किया जाएगा। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ज़मानत आदेश में की गई टिप्पणियाँ केवल इस याचिका के निस्तारण तक सीमित हैं और ट्रायल कोर्ट मामले के गुण-दोष के आधार पर स्वतंत्र रूप से अंतिम निर्णय लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र रहेगा।
