संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे को पत्र लिखा, सभी से सहयोग की अपील की
चिरौरी न्यूज
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने परिसीमन से जुड़े महिला आरक्षण विधेयक को पारित कराने के लिए कांग्रेस की सर्वदलीय बैठक की मांग पर सवाल उठाया। सरकार ने कहा कि उसने हमेशा विपक्ष के साथ बातचीत करने की कोशिश की है और सभी दलों से “रचनात्मक सहयोग” की अपील की है।
कांग्रेस की सर्वदलीय बैठक की मांग का जवाब देते हुए, संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सोमवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को एक पत्र लिखा। उन्होंने कहा कि सरकार राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर चर्चा में सभी राजनीतिक दलों की भागीदारी को महत्व देती है। रिजिजू ने कांग्रेस से यह भी आग्रह किया कि वह विधायी प्रक्रिया में रचनात्मक भूमिका निभाए और भविष्य में आने वाले महत्वपूर्ण कानूनों के रास्ते में रुकावट न डाले।
रिजिजू की यह प्रतिक्रिया खड़गे द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे गए उस पत्र के जवाब में आई है, जिसमें उन्होंने संसद में संविधान संशोधन विधेयक पर विचार करने से पहले एक सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की थी।
उन्होंने कहा, “मैं आपको कुछ बातें स्पष्ट करने और इस विषय पर विपक्ष के साथ बातचीत करने के लिए सरकार द्वारा किए गए प्रयासों का रिकॉर्ड रखने के लिए लिख रहा हूँ। सबसे पहले, आपकी इस टिप्पणी के संबंध में कि 13 अगस्त 2026 को सदन के अनिश्चितकाल के लिए स्थगित (adjourned sine die) होने के 64 दिन बाद भी इसे सत्रावसान (prorogued) नहीं किया गया है, मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि संविधान में ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है जो यह तय करे कि अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के बाद सदन का सत्रावसान कितने समय के भीतर किया जाना चाहिए।”
रिजिजू ने कहा कि केवल इस आधार पर कि इस दौरान सदन का सत्रावसान नहीं किया गया, इसे कोई संवैधानिक या प्रक्रियात्मक अनियमितता नहीं माना जा सकता। उन्होंने बताया कि अतीत में ऐसे कई उदाहरण हैं जब सदन का सत्रावसान लंबे समय तक नहीं किया गया, और यह अवधि 87 दिनों तक भी रही है।
साल 2008 में, लोकसभा विश्वास प्रस्ताव (confidence motion) पर चर्चा के लिए 21 और 22 जुलाई को, यानी दो दिनों के लिए बैठी थी। उस समय सदन को सत्रावसान (prorogue) नहीं किया गया था, बल्कि 17 अक्टूबर 2008 को फिर से बुलाया गया और 24 अक्टूबर को स्थगित कर दिया गया, ताकि यह 10 दिसंबर को दोबारा मिल सके।
रिजिजू ने बताया कि ऐसे कई अन्य उदाहरण भी हैं: 1987 (76 दिन), 1989 (54 दिन), 2006 (49 दिन), 2013 (49 दिन) और 1963 (41 दिन)।
उन्होंने कहा, “दूसरी बात, सरकार ने ‘परिसीमन संशोधन विधेयक’ (Delimitation Amendment Bill) पर विचार करने और उसे पारित कराने के लिए लगातार विपक्ष से समर्थन और सहयोग मांगा है। सरकार ने मुख्य विपक्षी दल होने के नाते कांग्रेस पार्टी से कई मौकों पर संपर्क किया है।”
मंत्री ने बताया कि उन्होंने इस साल 16 मार्च, 26 मार्च और 12 अप्रैल को खड़गे को पत्र लिखा था। साथ ही, उन्होंने इस विषय पर खड़गे से व्यक्तिगत रूप से चर्चा भी की थी और उनसे समर्थन व सहयोग मांगा था।
रिजिजू ने बताया कि मानसून सत्र के दौरान, उन्होंने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से भी व्यक्तिगत रूप से मुलाकात की थी और इस विषय पर उनका सहयोग मांगा था।
“हालांकि, बार-बार अनुरोध करने के बावजूद कांग्रेस पार्टी ने चर्चा के लिए कोई तारीख नहीं दी, जिसके बाद सरकार ने अन्य राजनीतिक दलों से संपर्क किया।”
उन्होंने कहा, “प्रस्तावित कानून के समर्थन में बातचीत को आगे बढ़ाने और व्यापक सहमति बनाने के उद्देश्य से DMK, SP, YSRCP, NCP, शिवसेना (UBT), AIMIM और BJD सहित कई दलों के प्रतिनिधियों के साथ परामर्श किया गया।”
मंत्री ने कहा कि ऐसी स्थिति में यह समझ नहीं आता कि बार-बार परामर्श की मांग क्यों की जा रही है, जबकि सरकार पहले ही बातचीत के लिए लगातार प्रयास कर चुकी है।
मंत्री ने कहा कि अब जरूरत इस बात की है कि विपक्षी दल रचनात्मक सहयोग दें, न कि पहले हो चुके परामर्शों को नजरअंदाज करते हुए बार-बार वही मांग दोहराते रहें।
“ये प्रयास दर्शाते हैं कि सरकार परामर्श करने और संसद में रचनात्मक रूप से जुड़ने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।” उन्होंने पत्र में कहा, “मैं फिर दोहराता हूँ कि सरकार संसदीय लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध है और संसद के प्रभावी कामकाज के ज़रिए सार्थक बातचीत को बढ़ावा देने के लिए भी वचनबद्ध है।”
