बिहार विधानसभा चुनाव में आरजेडी की नज़र भूमिहार वोटों पर

शिवानी शर्मा

बिहार में विधान सभा चुनाव की सुगबुगाहट शुरू होते ही सभी राजनीतिक दलों ने अपने अपने तरीके से चुनाव जीतने के लिए जुगत लगाना शुरू कर दिया है. आजादी के बाद से ही बिहार में समसामयिक मुद्दों के आलावा जातीय समीकरण का महत्त्व हर एक चुनाव में सामने आता है जब सभी पार्टियाँ अपने उम्मीदवारों की योग्यता तय करते समय उनकी जाति का वोट कितना है, ये देखते हैं. बिहार में विधान सभा चुनाव इस साल होने वाले हैं और सत्तारूढ़ जेडीयू और भारतीय जनता पार्टी सहित मुख्य विपक्षी दल आरजेडी अपना दम-ख़म लगा रही है. इसके आलावा छोटी पार्टियाँ, जिनका एक खास वर्ग में पैठ है और जो मौके की तलाश में हैं, अपना प्रभाव दिखाने के लिए सभी दलों के नेताओं से मिलने जुलने का कार्यक्रम शुरू कर दिया है.

आरजेडी का एक परंपरागत वोट बैंक है, जिसके कारण उसे सत्ता मिली, लेकिन अब मुख्यमंत्री नितीश कुमार के सोशल इंजीनियरिंग के कुशल प्रयोग के बाद उसके वोट बैंक में थोड़ी सी दरार आती हुई दिख रही है. इधर आरजेडी ने भी अपने परंपरागत वोट से इतर नए समीकरण तलाशने शुरू कर दिए है. इसके लिए पार्टी के नेताओं ने विभिन्न जाति के प्रमुख लोगों से मेलजोल बढ़ने का काम शुरू कर दिया है.

भूमिहार वोट को अपनी तरफ करने के लिए आरजेडी ने इस बार राज्यसभा के टिकट के लिए भूमिहार समाज से अमरेंदरधारी सिंह को चुनावी मैदान में उतारा है. आर डी सिंह का भूमिहार होना आरजेडी के परंपरागत वोट बैंक में फिट नहीं बैठता है.

बिहार में आरजेडी अपने यादव-मुस्लमान वोट बैंक पर चली है लेकिन इस बार आरजेडी ने अपना रुख मोड़ा है. सवर्णों के खिलाफ बोलनेवाले लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी ने इस बार चुनाव लड़ने के लिए सवर्ण का हाथ थामते हुए दिख रही है.

आरजेडी का ये कदम एनडीए के लिए चिंता का सबब बन गया है.

आरजेडी ने अपने इस कदम से यह साफ़ कर दिया है कि वो आने वाले विधान सभा चुनाव पुराने पैंतरे को बदल कर लड़ेगी. यहाँ ये देखना दिलचस्प होगा कि आरजेडी के इस कदम से उसके पुराने वोट बैंक पर क्या असर पड़ता है, और आने वाले चुनाव में सवर्ण समाज, खासकर भूमिहार समाज उसे कितना सपोर्ट करता है.

 

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