प्रख्यात शिल्पकार वी. के. मुनुसामी से वाराणसी के छात्रों ने टेराकोटा कला के गुर सीखे
चिरौरी न्यूज
वाराणसी/तमिलनाडु। काशी–तमिल संगमम 4.0 के अंतर्गत वाराणसी से आए विद्यार्थियों के एक समूह को तमिलनाडु की पारंपरिक टेराकोटा कला को निकट से जानने का विशेष अवसर मिला। इस दौरान छात्रों ने प्रख्यात शिल्पकार वी. के. मुनुसामी से मुलाकात की और उनसे टेराकोटा शिल्प की तकनीक, इतिहास और सांस्कृतिक महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त की।
इस संवादात्मक सत्र के दौरान मुनुसामी जी ने छात्रों को बताया कि टेराकोटा कला केवल मिट्टी को आकार देने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत, लोक विश्वास और सामाजिक जीवन का जीवंत प्रतिबिंब है। उन्होंने पारंपरिक विधियों, प्राकृतिक सामग्री के उपयोग और आधुनिक समय में इस कला के संरक्षण की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला।
तमिलनाडु के एक छोटे से गांव से निकले कलाकार वी. के. मुनुसामी ने अपनी मेहनत और हुनर से रचा दुनिया का सबसे बड़ा टेराकोटा घोड़ा। ये सिर्फ एक मूर्ति नहीं, बल्कि भारत की मिट्टी की शक्ति और सांस्कृतिक विरासत की बोलती तस्वीर है। मुनुसामी जी हमें ये दिखाते हैं कि लोककला सिर्फ बीते कल की नहीं, भारत के उज्ज्वल भविष्य की भी कहानी है। पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित यह कलाकार 40 वर्षों से अधिक समय से नाटकीय, जीवन-आकार की टेराकोटा मूर्तियाँ और 1.5 इंच जितनी छोटी लघु प्रतिमाएँ बनाने के लिए प्रसिद्ध हैं।
मुनुसामी 21वीं पीढ़ी के टेराकोटा कलाकार हैं, जिन्होंने वैश्विक ख्याति, छह राष्ट्रीय पुरस्कार, कई राज्य पुरस्कार अर्जित किए हैं और एक लुप्त होती कला शैली को संरक्षित करने की अनौपचारिक जिम्मेदारी भी संभाली है। कई कलाकारों के विपरीत, जिन्होंने बलुआ पत्थर या संगमरमर जैसे विकल्पों के कारण टेराकोटा का उत्पादन बंद कर दिया है, मुनुसामी ने स्वेच्छा से अपने परिवार की विरासत को आगे बढ़ाने का दायित्व संभाला है। उनका बेटा, जो वर्तमान में बेंगलुरु के चित्रकला परिषद से स्नातक की पढ़ाई कर रहा है, इस कला जगत में एक नए कलाकार के रूप में प्रवेश करेगा।
विद्यार्थियों के लिए यह मुलाकात किसी पाठ्यपुस्तक से आगे जाकर सीखने का अवसर बनी, जहाँ उन्होंने एक अनुभवी शिल्पगुरु से प्रत्यक्ष संवाद के माध्यम से कला की बारीकियाँ समझीं। छात्रों ने टेराकोटा मूर्तियों के निर्माण, डिज़ाइन और प्रतीकात्मक अर्थों को लेकर भी जिज्ञासाएँ साझा कीं। टेराकोटा कला (Terracotta Art) पकी हुई मिट्टी (मिट्टी को गर्म करके) से मूर्तियां, बर्तन और सजावटी वस्तुएं बनाने की एक प्राचीन और लोकप्रिय हस्तकला है, जो अपनी मजबूती और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जानी जाती है।
यह सार्थक संवाद काशी–तमिल संगमम 4.0 की यात्रा में एक महत्वपूर्ण कलात्मक आदान–प्रदान के रूप में जुड़ गया। इस अनुभव ने न केवल छात्रों की कला के प्रति समझ को गहरा किया, बल्कि उत्तर और दक्षिण भारत की साझा सांस्कृतिक परंपराओं को भी और मजबूती प्रदान की।
