जनगणना 2027 में जाति गणना पर घमासान, खुले सवाल पर कांग्रेस ने उठाए सवाल

चिरौरी न्यूज
नई दिल्ली: भारत में दशकों बाद राष्ट्रीय स्तर पर जाति की गणना होने जा रही है। लेकिन जनगणना 2027 में जातियों की गिनती किस तरीके से की जाएगी, इसे लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस ने जाति दर्ज करने के लिए खुले सवाल (Open-ended Question) रखने के फैसले पर सवाल उठाते हुए आशंका जताई है कि इससे अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की आबादी के आंकड़े प्रभावित हो सकते हैं।
कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने केंद्र सरकार की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए 2021 में सुप्रीम कोर्ट में केंद्र की ओर से दाखिल हलफनामे का हवाला दिया है। उनका कहना है कि उस समय सरकार ने खुद माना था कि जातियों की एक पूर्व-निर्धारित सूची और ड्रॉप-डाउन मेन्यू होने से आंकड़े अधिक सुसंगत और भरोसेमंद हो सकते हैं। ऐसे में सवाल है कि जनगणना 2027 में इसी व्यवस्था को क्यों नहीं अपनाया गया।
क्या है विवाद?
14 अगस्त को केंद्र सरकार ने जनगणना 2027 के दूसरे चरण यानी Population Enumeration के लिए 40 सवालों को अधिसूचित किया। इनमें 10वां सवाल “अनुसूचित जाति (SC)/अनुसूचित जनजाति (ST)/जाति” से संबंधित है।
इसमें गणनाकर्मी से कहा जाएगा कि वह व्यक्ति द्वारा बताई गई जाति या उपजाति को दर्ज करे। यानी जाति के लिए पहले से तैयार विकल्पों की सूची उपलब्ध कराने के बजाय उत्तरदाता द्वारा बताई गई जाति को दर्ज किया जाएगा।
कांग्रेस का कहना है कि भारत में हजारों जातियां और उपजातियां हैं। अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में एक ही समुदाय के नाम, स्थानीय पहचान और वर्तनी अलग हो सकती है। ऐसे में बिना किसी मानकीकृत सूची और कोड के आंकड़ों में दोहराव और गड़बड़ी की आशंका बनी रह सकती है।
कांग्रेस ने 2021 के हलफनामे को बनाया आधार
जयराम रमेश ने केंद्र के 21 सितंबर 2021 के सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे का हवाला देते हुए सवाल उठाया है। उस समय सरकार ने SECC 2011 के जातिगत आंकड़ों की तकनीकी खामियों का उल्लेख किया था।
सरकार ने कहा था कि 2011 में जातियों की कोई पूर्व-तैयार रजिस्ट्री नहीं थी और जातियों की एक रजिस्ट्री के साथ ड्रॉप-डाउन मेन्यू उपलब्ध कराया जाता तो आंकड़ों में अधिक एकरूपता लाई जा सकती थी।
अब जयराम रमेश का सवाल है कि यदि केंद्र सरकार ने खुद इस व्यवस्था को बेहतर माना था, तो जनगणना 2027 में जातियों की पूर्व-निर्धारित सूची और ड्रॉप-डाउन प्रणाली क्यों नहीं अपनाई गई?
बिहार और तेलंगाना का भी दिया उदाहरण
कांग्रेस ने बिहार और तेलंगाना में हुए जाति सर्वेक्षणों का भी हवाला दिया है। इन राज्यों में पूर्व-निर्धारित जाति सूचियों और कोड का इस्तेमाल किया गया था। कांग्रेस का तर्क है कि ऐसी व्यवस्था से अलग-अलग नामों, स्थानीय वर्तनी और समान जातियों की पहचान को एक मानकीकृत प्रणाली में लाना आसान हो सकता है।
हालांकि, खुले कॉलम को लेकर चिंता सिर्फ कांग्रेस की ओर से नहीं उठाई गई है। ऑल इंडिया OBC स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AIOBCSA) ने भी इस व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। वहीं मंडल आर्मी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनिरुद्ध सिंह विद्रोही ने राष्ट्रीय स्तर पर Caste Master Registry, मानक कोड और अलग-अलग स्थानीय नामों एवं वर्तनी को एक ही जाति से जोड़ने वाली व्यवस्था की मांग की है।
सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव भी पहले SECC 2011 जैसी व्यवस्था दोहराए जाने को लेकर चिंता जता चुके हैं।
OBC कॉलम को लेकर भी राजनीतिक आरोप
कांग्रेस ने यह आरोप भी लगाया है कि जनगणना 2027 के प्रश्नावली में OBC के लिए अलग श्रेणी नहीं रखी गई है। पार्टी ने इसे लेकर केंद्र पर गंभीर आरोप लगाए और कहा कि इससे OBC समुदाय की वास्तविक आबादी का आधिकारिक आंकड़ा सामने आने में दिक्कत हो सकती है।
यह मुद्दा ऐसे समय सामने आया है जब देश में जाति, आरक्षण और सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज है। आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भी जातिगत समीकरणों का महत्व बढ़ गया है।
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी सरकार बनने पर तीन महीने के भीतर जातिगत जनगणना कराने का वादा किया है। 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने मिलकर 43 सीटें जीती थीं।
असली चुनौती आंकड़ों को विश्वसनीय बनाने की
जनगणना 2027 में पहली बार स्वतंत्र भारत में SC और ST के अलावा अन्य जातियों की राष्ट्रीय स्तर पर गणना होने जा रही है। इसलिए सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ जातियों की संख्या दर्ज करना नहीं, बल्कि एक ही जाति के अलग-अलग नाम, उपजाति, स्थानीय पहचान और वर्तनी को सही तरीके से वर्गीकृत करना होगी।
यही वजह है कि जाति गणना की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही उसकी पद्धति को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि सरकार खुले सवाल के जरिए जुटाए गए आंकड़ों को किस तरह कोड, वर्गीकृत और सत्यापित करती है और क्या इससे देश में जातियों की वास्तविक सामाजिक संरचना का भरोसेमंद आंकड़ा सामने आ पाता है।
