वैदेहीः परंपरा, आधुनिकता और आत्मचिंतन का सजीव संगम, 25 अप्रैल से शुरू हो रहा है आयोजन

Vaidehi: A Vibrant Confluence of Tradition, Modernity, and Introspection—The Event Begins on April 25thचिरौरी न्यूज

नई दिल्ली: भारतीय सांस्कृतिक चेतना और आधुनिक सोच के बीच संवाद स्थापित करने का एक अनूठा प्रयास बन चुका “वैदेही” कार्यक्रम बीते वर्षों से एक जीवंत सांस्कृतिक प्रयोग के रूप में उभरकर सामने आया है। यह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक विचारधारा है, एक ऐसी जीवित परिकल्पना, जो यह समझने की कोशिश करती है कि आधुनिकता ने भारतीय आदर्शों को किस हद तक प्रभावित, परिवर्तित या चुनौती दी है।

मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल और सीएसटीएस के सौजन्य से आयोजित इस आयोजन में 14 राज्यों और 7 देशों की भागीदारी रही है। आयोजक डॉ सविता झा ने बताया कि जानकी नवमी के दिन 25 अप्रैल से इस वर्ष इसकी शुरुआत हो रही है।

एक सवाल के जवाब में वैदेही के बारे में विस्तार से बात करती हुई डॉ सविता झा ने कहा कि वैदेही यानी सीता का संघर्ष और सरोकार भौगोलिक सीमाओं से परे है। हर नारी के लिए वो एक सशक्त आदर्श हैं। संभवतः यही कारण है कि अब तक वैदेही उत्सव में कई राज्यों और अन्य देशों की सहभागिता रही है। उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग आयोजन में आ रहे हैं, उनके लिए मिथिला पेंटिग्स से इतर भी वैदेही दिखाई देंगी। अन्य भारतीयंचित्रकला के कलाकारों द्वारा वैदेही से संबंधित पेटिंग्स का प्रदर्शन किया जा रहा है। यह नया प्रयोग है।

“वैदेही” एक ऐसा मंच है जहां ‘सीता’ केवल एक पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि एक जीवंत विचार बनकर उभरती हैं और यह आयोजन उस विचार का उत्सव है।

दरअसल, वैदेही की अवधारणा उस समय की गई थी जब समाज कोविड-19 महामारी के सामूहिक आघात से उबरने की कोशिश कर रहा था। ऐसे कठिन समय में इसे एक मरहम के रूप में देखा गयाकृजहाँ कला, आत्ममंथन और साझा सांस्कृतिक स्मृतियों के माध्यम से लोगों को भावनात्मक संबल मिल सके।

दिलचस्प बात यह है कि अपने सातवें संस्करण तक पहुँचने के बाद भी “वैदेही” की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है। इसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी सहजता और जुड़ाव है। यह कार्यक्रम लोगों के भीतर चल रहे भावनात्मक द्वंद्व को अभिव्यक्ति देने का एक माध्यम बन गया हैकृएक प्रकार की ‘कैथार्सिस’ प्रक्रिया, जहां व्यक्ति अपने भीतर के भावों को समझता और व्यक्त करता है।
इस आयोजन का केंद्रबिंदु ‘सीता’ हैं, एक ऐसा आदर्श, जो समय के साथ बदलता जरूर है, लेकिन समाप्त नहीं होता। आज की युवा महिला यह चाहे कि वह सीता जैसी बने या नहीं, यह महत्वपूर्ण नहीं है; महत्वपूर्ण यह है कि वह सीता के अनुभवों, संघर्षों और भावनाओं से जुड़ाव महसूस करती है।

कार्यक्रम में भाग लेने वाले कलाकारकृचाहे वे महिलाएँ हों या पुरुषकृसीता के चरित्र से गहरे स्तर पर जुड़ते हैं। उनके भीतर की संवेदनाएँ, आकांक्षाएँ और अभिव्यक्ति की तीव्र इच्छा यह दर्शाती है कि आदर्श कभी समाप्त नहीं होते, वे केवल समय के साथ नए रूप धारण करते हैं।
आयोजकों ने सभी कला प्रेमियों और आम नागरिकों से इस विशेष आयोजन में भाग लेने की अपील की है। यह कार्यक्रम न केवल भारतीय दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करता है, बल्कि एक सामूहिक सांस्कृतिक स्वामित्व की भावना को भी सुदृढ़ करता है।

 

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