वर्ल्ड स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट डे: क्रिकेट की गिरफ्त में खेल पत्रकारिता! भारत के नजरिये से सबसे बुरा दौर

राजेंद्र सजवान

‘वर्ल्ड स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट डे’ की शुरुआत के बारे में कहा जाता है कि जब किसी बड़े खेलोत्सव के दौरान बहुत से पत्रकार एक जगह पर इकट्ठे हुए तो उन्होंने अन्य प्रमुख दिनों की की तरह 2 जुलाई को वर्ल्ड स्पोर्ट जर्नलिस्ट डे के रूप में मनाने का फैसला किया। अंततः 1924 के पेरिस ओलंम्पिक खेलों में इस दिन की विधिवत घोषणा की गई। इस प्रकार दुनिया भर के खेल पत्रकारों को एकविश्व स्तरीय प्लेटफार्म मिल गया।

जहां तक भारतीय खेल पत्रकारिता की बात है तो भारत में खेल पत्रकारिता के विकास का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं हैं। सम्भवतया 1928 के ओलंम्पिक खेलों में हॉकी का खिताब जीतने पर दद्दा ध्यानचंद और उनकी भारतीय टीम को गुलाम देश के समाचार पत्र पत्रिकाओं ने समुचित स्थान दिया होगा। तत्पश्चात आज़ादी से पहले दो और ओलंम्पिक जीत कर भारतीय टीम ने सुर्खियां बटोरीं।

आज़ाद भारत के खिलाड़ियों ने हॉकी की शान को बनाए रखा और पांच और स्वर्ण जीत कर हॉकी की गौरव गाथा के माध्यम से खेल पत्रकारिता को नई ऊंचाइयां प्रदान कीं। तत्पश्चात भारतीय फुटबाल टीम और सरदार मिल्खा सिंह के प्रदर्शन को समुचित स्थान मिला।

1980 के मास्को ओलंम्पिक में हॉकी खिताब जीतने से काफी पहले क्रिकेट अपनी जड़ें जमा चुका था। लाला आमरनाथ, चंदू बोर्डे, वाडेकर, बेदी, चंद्रशेखर जैसे खिलाड़ियों ने भारतीय खेल पत्रकारों को क्रिकेट के बारे में सोचने को विवश किया तो सुनील मनोहर गावस्कर और कपिल देव के दौर ने क्रिकेट को पत्रकारों की पसंद का पहला खेल बना डाला।

1983 में क्रिकेट विश्व कप में मिली जीत ने देश में खेल पत्रकारिता को जैसे दो टुकड़ों में बांट दिया। इस जीत ने जहां एक ओर अन्य खेलों को क्रिकेट के सामने अदना साबित किया तो क्रिकेट ने मीडिया पर एकाधिकार स्थापित कर लिया। बेशक क्रिकेट ने फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा और ना ही भारतीय खेल पत्रकारों ने कभी यह जानने का प्रयास किया कि उनके क्रिकेटमय हो जाने से बाकी खेलों को क्या कीमत चुकानी पड़ रही है।

भारत में खेल पत्रकारिता का ज्वलंत उदाहरण सामने है। एक तरफ तो हम ओलंम्पिक खेलों की तैयारी में जुटे हैं तो दूसरी तरफ न्यूजीलैंड के हाथों हुई हार के मातम में डूबे हैं। क्रिकेट की हार से देश के तथाकथित क्रिकेट पंडित शोक सागर में डुबकी लगा रहे हैं लेकिन ओलंम्पिक से खाली हाथ या चंद झुंनझुनों के साथ लौटने पर उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। यह सही है कि क्रिकेट ने अपनी कड़ी मेहनत और दूरदर्शिता से बाकी खेलों पर श्रेष्ठता साबित की है लेकिन देश की खेल पत्रकारिता का क्रिकेट के प्रति खास रुझान भी गले उतरने वाला नहीं है।

यह सच है कि इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया के अधिकाधिक चलन में आने से खेल पत्रकार और उनकी पत्रकारिता का बैंड बज गया है। अखबारों में नब्बे फीसदी खबरें क्रिकेट की होती हैं। स्थानीय खेलों के लिए महानगरों के खेल पेज के दरवाजे कब के बंद हो चुके हैं।

ऐसी हालत में वर्ल्ड स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट डे मनाने का कोई औचित्य नहीं रह जाता, क्योंकि खेल पत्रकार और पत्रकारिता लगभव मरणासन पड़े हैं। कोरोना के चलते सबसे ज्यादा नुकसान खेल , खेल पत्रकारों और खेल शिक्षकों और खेल प्रशासकों का हुआ है। उनकी खबर लेने वाला कोई भी नहीं है। देश विदेश में खेल पत्रकारों द्वारा गठित संस्थाएं भी सिर्फ क्रिकेट का गुणगान करने के लिए बदनाम हैं।

(लेखक वरिष्ठ खेल पत्रकार हैं)

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